Wednesday, 8 November 2017

सच बोलेगा तो सिर चढ़कर बोलेगा

वरिष्ठ साहित्यकार और पत्रकारिता पर कई पुस्तकें लिखने वाले जगदीश्वर चतुर्वेदी ने कहा कि हम सच को थोड़ी देर छिपा सकते हैं पर सत्य कभी पराजित नहीं हो सकता। पर सच जब भी बोलेगा सिर चढ़ कर बोलेगा।ये विचार मंगलवार 7 नवंबर को दिल्ली विश्वविद्यालय के दौलतराम कालेज में आयोजित सेमिनार में रखे। सेमिनार का आयोजन  वरिष्ठ पत्रकार डॉक्टर रामजीलाल जांगिड के मार्गदर्शन में भारतीय जनसंचार संघ और दौलत राम कालेज के संस्कृत विभाग की ओर से किया गया था।
राष्ट्रीय सेमिनार – मीडिया के समक्ष चुनौतियां

प्रोफेसर चतुर्वेदी ने मोनिका लेविंस्की-बिल क्लिंटन प्रकरण और विकिलिक्स का उदाहरण दिया। पर हमें पत्रकारिता की सीमा को समझना पड़ेगा। उन्होंने कहा कि इंटरनेट बुरा नहीं है। इसने कई तरह के खुलासों को मंच प्रदान किया है।  
टीवी के वरिष्ठ पत्रकार शेष नारायण सिंह ने कहा कि पत्रकारिता के सामने चुनौतियां हर कालखंड में रही हैं। हमें पत्रकारों से बहुत उम्मीद पालने से पहले उनके कामकाज की सीमाओं को भी समझना पड़ेगा। जो लोग मीडिया की कार्यशैली को नहीं जानते हैं उनके लिए मीडिया पर उंगली उठा देना, सवाल खड़े करना आसान होता है। प्रोफेसर चतुर्वेदी ने कहा कि वे खास तौर पर इस संगोष्ठी में हिस्सा लेने और डाक्टर जांगिड से मिलने दिल्ली आया हूं।  

मीडिया से क्रांति की उम्मीद क्यों रखते हैं – सुधांशु रंजन
आखिर हम मीडिया से क्रांति कर देने की उम्मीद क्यों रखते हैं। मीडिया का मूल का काम खबरें देना है। अगर क्रांति होगी तो मीडिया इसकी भी खबर देगा। हालांकि कई बड़े मामलों में मीडिया की पहले से ही तेजी से न्याय मिला है। प्रियदर्शनी मट्टू जैसे कई उदाहरण दिए जा सकते हैं। पर पुलिस, अदालत या एक सरकारी अधिकारी की तरह एक मीडियाकर्मी के पास कोई ताकत नहीं होती। ये विचार टीवी के वरिष्ठ पत्रकार सुधांशु रंजन ने व्यक्त किए। 
रंजन ने कहा कि 1789 के बाद एंडमंड बर्क ने मीडिया को फोर्थ एस्टेट कहा था पर उसका तात्पर्य संसद की गैलरी में बैठे पत्रकार दीर्घा से था जिससे मुखातिब होकर नेता लोग अपनी बात रखते थे। पर वास्तव में एक मीडिया कर्मी के पास कोई संवैधानिक ताकत नहीं होती।

दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के अध्यक्ष रह चुके प्रोफेसर हरिमोहन शर्मा ने मीडिया संस्थानों में पत्रकारिता शिक्षण पर अपने विचार रखते हुए कहा कि जरूरी है कि पत्रकारिता की शिक्षा देने के लिए पत्रकारों की सेवाएं ही ली जाएं। साथ ही उन्होंने पत्रकारिता वर्ग में जरूरी उपकरणों की उपलब्धता की बात रखी।
इंद्रप्रस्थ विश्वविद्यालय में पत्रकारिता के प्रोफेसर चंद्रकांत प्रसाद सिंह ने कहा कि अच्छा शिक्षक वही है जो छात्रों को विचारधारा के दायरे से उपर उठकर शिक्षा दे। उन्हें ज्ञान के साथ प्रेरणा भी दे। उन्होंने एक शिक्षक के तौर पर डाक्टर जांगिड के अपने छात्रों को अभिप्रेरित करने के तरीके को अनूठे ढंग से याद किया।
डॉक्टर जांगिड का अनूठा जन्म दिन - यह संयोग है कि सात नवंबर कई दशकों तक हिंदी पत्रकारिता के शिक्षक रहे डाक्टर रामजीलाल जांगिड का 78वां जन्मदिन था। इस मौके पर उन्होंने आयोजित सेमिनार में अपने कई पूर्व छात्रों को सम्मानित किया। संगोष्ठी को डॉक्टर देवेश किशोर, वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप माथुर, पूर्व आईएएस और गांधीवादी समाजसेवक डॉक्टर कमल टावरी ने भी संबोधित किया।
हमें अपनी भाषा पर गर्व हो - डॉक्टर जांगिड
इस मौके पर डॉक्टर जांगिड ने कहा कि 1947 में अंग्रेजों के भारत से जाते ही अंग्रेजी को अलविदा कह देना चाहिए था। हिंदी समेत भारत की दूसरी भाषाओं से गहरा लगाव है। कई भाषाओं के छात्रों को पढ़ा चुका हूं, पाठ्यक्रम तैयार किए हैं, पर चाहता हूं को हम आप सब अपनी भाषा पर न सिर्फ गर्व करें उसमें ज्यादा से ज्यादा काम भी करें। हमें हिंदी की ताकत पर गर्व करना चाहिए। यह सच है कि भारत में हिंदी नहीं जानने वाला देश का प्रधानमंत्री नहीं बन सकता। 

सेमिनार में वरिष्ठ पत्रकार अरविंद मोहन, इग्नू के ओम प्रकाश देवल, शत्रुघ्न सैनी,  दौलतराम कालेज की प्राचार्य डॉक्टर सविता राय, प्रो. राम बख्श, जामिया मीलिया इस्लामिया के संस्कृत विभाग के अध्यक्ष प्रो. गिरिश पंत, साध्वी प्रज्ञा भारती, वरिष्ठ पत्रकार अपर्णा द्विवेदी, वरिष्ठ पत्रकार रविंद्र साधू  भी मौजूद रहे। दौलतराम कालेज के संस्कृत विभाग की छात्राओं ने सेमिनार के बेहतरीन आयोजन में स्वयंसेविका के रूप में बड़े ही अनुशासन से दिन भर सक्रियता निभाई।
संगोष्ठी में मीडिया और उसके समक्ष चुनौतियों पर कई शोध पत्र पढ़े गए। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय के प्रो. लाल बहादुर ओझा ने टीवी मीडिया के सामने चुनौतियों पर अपने विचार रखे। 
अतिथियों को उपहार में औषधीय पौधे
दौलतराम कालेज में 7 नवंबर को आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी में आए सभी मेहमानों को उपहार में छोटे छोटे गमलों में औषधीय पौधे प्रदान किए गए। इन गमलों में इलायची, कचनार, मनीप्लांट समेत कई किस्म के पौधे थे। कालेज ने चीनीमिट्टी के गमलों का निर्माण कराया है जिस पर कालेज का लोगो बना है। इस उपहार योजना के पीछे कालेज की प्रिंसिपल डाक्टर सविता राय की दृष्टि है। यह पर्यारण संरक्षण के क्षेत्र में किया गया ऐसा कार्य है जिससे दूसरे आयोजकों को भी प्रेरणा लेने की जरूरत है।  
- विद्युत प्रकाश मौर्य  - vidyutp@gmail.com


 The following personalities were also honoured by Dr. Ramjeelal Jangid  for making valuable contribution in various fields. Prof. (Dr) Devesh Kishore- ‘Life time Achievements Award’ for 45 years of teaching and research in journalism and mass communication, Prof. (Dr.) Hari Mohan Sharma- ‘Samarpit Hindi Sevi Sammaan for working as Co-ordinator (2007-13) of PG Hindi Journalism Diploma Course in the South Campus of Delhi University, Prof. (Dr.) Prem Chand Patanjali- ‘Hindi Sevi Sammaan’ for starting the first and the only three years Degree Course in Hindi Journalism in Delhi University’s Bhim Rao Ambedkar College designed by me in 1994. It is now available in four College of D.U. Prof (Dr.) Jagdeeshwar Chaturvedi of Calcutta University- ‘Samarpit Hindi Sevi Sammaan’ for making Hindi rich by writing several Hindi books on journalism. Prof. (Dr.) Manju Gupta (C.C.S. University, Meerut)- ‘Sankalpvaan Shikshikaa Sammaan’ for spreading the message of ‘Innovation in Education’ in Asia. Prof. (Dr.) Savita Roy- ‘Sankalpvaan Shikshikaa Sammaan’ for making Daulat Ram College as an important centre for women education.
Prof. (Dr.) Aparna Dwivedi- ‘Urjaavaan Yuvaa Pratibhaa Sammaan’ for her valuable contribution in the field of TV Reporting and communication training. Shri Rampal Sharma- ‘Urjaavaan Vyaktitva Sammaan’ for opening two public schools in two backward areas of East Delhi.
Sadhvi Pragya Bharti (Divya Jyoti Jagriti Sansthan) for awakening, inspiring and transforming young minds all over India- ‘Sankalpvaan Naari Sammaan’.
Dr. Jyoti Sachdeva- Founder, ‘DENTO HUB’, GG Block, Vikaspuri, New Delhi- ‘Best Dental Clinic’ devoted to the dental treatment of the less privileged section of the society and Shri Jasmer Singh, Rohtak (Haryana)- ‘Paryavaran Hitaishee Sammaan’
-----

Wednesday, 25 October 2017

नहीं रहीं ठुमरी की रानी

गिरिजा देवी का ठुमरी गायन को परिष्कृत करने और इसे लोकप्रिय बनाने में बड़ा योगदान रहा।  उन्हें 'ठुमरी की रानी' कहा जाता था।  वे पूरब अंग की ठुमरियों की विशेषज्ञ थींउनकी खनकती आवाज उन्हें विशिष्ट बनाती थीं, वहीँ उनकी ठुमरी, कजरी और चैती में बनारस का ख़ास लहजा और विशुद्धता का पुट हुआ करता था।
ठुमरी और पारम्परिक लोक संगीत के अलावा उन्हें होरी, चैती, कजरी, झूला, दादरा और भजन के अनूठे प्रदर्शनों के लिए याद किया जाएगा। गिरिजा देवी ने ठुमरी के साहित्य का गहन अध्ययन और अनुसंधान भी किया। भारतीय शास्त्रीय संगीत के क्षेत्र में ऐसी गायिका रहीं जिन्हें पूरब अंग की गायकी के लिए विश्वव्यापी प्रतिष्ठा दिलाई।

गिरिजा देवी – 8 मई 1929 (वाराणसी)  - 24 अक्तूबर 2017 (कोलकाता)

संगीत शिक्षा
पिता रामदेव राय हारमोनियम बजाया करते थे। न्होंने गिरिजा देवी जी को प्रारंभ में संगीत सिखाया। कालांतर में उन्होंने गायक और सारंगी वादक सरजू प्रसाद मिश्रा से ख्याल  और टप्पा गायन की शिक्षा लेना शुरू की। 

1944 में 15 साल की उम्र में कारोबारी मधुसूदन जैन से विवाह हुआ। पति ने संगीत साधना में काफी सहयोग दिया।

1949 में गिरिजा देवी ने गायन की सार्वजनिक शुरुआत,ऑल इंडिया रेडियो इलाहाबाद से की।
1951 में बिहार के आरा में उन्होंने अपना पहला सार्वजनिक संगीत कार्यक्रम दिया।
1975 में पति का निधन होने से जीवन में बड़ा खालीपन आया, क्योंकि पति उनके संगीत साधना में काफी सहयोग करते थे।
1980 के दशक में कोलकाता में आईटीसी संगीत रिसर्च एकेडमी में काम किया
1990 के दशक के दौरान बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के संगीत संकाय के एक सदस्य के रूप में काम किया।


पुरस्कार और सम्मान
1972 में पद्मश्री
1977 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार
1989 पद्म भूषण
2010 में संगीत नाटक अकादमी फेलोशिप
2016 – पद्मविभूषण


Friday, 15 September 2017

क्या वाकई हमें बुलेट ट्रेन चाहिए...

जैसा की भाजपा के चुनावी वादे में था बुलेट ट्रेन लाएंगे तो सरकार के तीन साल पूरे होने के बाद 14 सितंबर 2017 को अहमदाबाद से मुंबई के बीच बुलेट ट्रेन परियोजना का शिलान्यास हो चुका है। इसे मोदी सरकार की बहुत बड़ी परियोजना के तौर पर देखा जा रहा है। बड़ा सवाल की क्या हमें बुलेट ट्रेन की जरूरत है। क्या इसका सफर मध्यम वर्गीय भारत के लोगों के जेब के अनुकूल होगा।  

जेब के अनुकूल नहीं सफर -  मुंबई से अहमदाबाद के बीच की दूरी 500 किलोमीटर है। फिलहाल अगर ये सफर एसी 2 से किया जाए तो किराया बनता है 1205 रुपये।  शताब्दी एक्सप्रेस का किराया 960 रुपये है। एसी डबलडेकर ट्रेन का किराया 650 रुपये है। सुपरफास्ट रेलगाड़ियां आमतौर 5 से 6 घंटे में सफर कराती हैं।

अब बुलेट ट्रेन का किराया आज के महंगाई दर के हिसाब से देखा जाए तो कम से कम 3000 रुपये होगा। ट्रेन के पटरी पर आने के बाद यह बढ़ भी सकता है। मुंबई से अहमदाबाद का सफर पूरा होगा सवा दो से ढाई घंटे में। अब इसकी तुलना हवाई सफर से करें। अहमदाबाद से मुबंई का हवाई सफर 40 मिनट का है। किराया रहता है आमतौर पर 1600 से 1800 रुपये के बीच। रोज 10 से ज्यादा उड़ानों के विकल्प भी मौजूद हैं। अब भला आप बताइए कि जो ज्यादा किराया खर्च कर चलने में सक्षम लोग हैं वे हवाई जहाज से दुगुने से ज्यादा किराया और दुगुना समय खर्च कर बुलेट ट्रेन से क्यों आना जाना पसंद करेंगे। यह भी कहा जा रहा है कि रोज प्रयाप्त फेरे नहीं हुए तो बुलेट ट्रेन का खर्च निकालना भी मुश्किल होगा।

बात रेलवे की करें तो रेलवे हर नई ट्रेन चलाने या फिर नए मार्ग बिछाने से पहले फिजिबलिटी सर्वे करता है। इसमें यह देखा जाता है कि यह मार्ग लाभकारी होगा कि नहीं। बुलेट ट्रेन को लेकर 2005 में बड़े जोर शोर से प्रस्ताव बना था। पर मामला ठंडे बस्ते में चला गया।

जिन मार्गों पर रेलवे की सड़क मार्ग से प्रतिस्पर्धा है वहां भी रेलवे नई परियोजनाओं पर हाथ नहीं डालता। अहमदाबाद मुंबई के बीच बेहतरीन सड़क नेटवर्क है। आप सड़क मार्ग से भी 5 घंटे में मुंबई पहुंच सकते हैं। तो वहां बुलेट ट्रेन की सफलता संदिग्ध है।

कई परियोजनाएं असफल हुईं - याद किजिए ममता बनर्जी रेल मंत्री थीं तो उन्होंने दुरंतो एक्सप्रेस नामक ट्रेन की श्रंखला चलाई। यह राजधानी एक्सप्रेस का ही बदला हुआ रुप था। पर इसके ठहराव बीच में नहीं थे। लिहाजा ज्यादातर दूरंतो फेल हो गईं। खाली जा रही थीं तो उनके ठहराव बनाए गए।  कुछ  को तो गरीब रथ और जनशताब्दी में बदला गया। तो देश के कई मार्गों पर रेल में भी महंगा किराया देकर सफर करने वाले लोग अभी देश में नहीं हैं। हमें इस सच को स्वीकारना पड़ेगा कि हम ऐसी अर्थव्यस्था वाले देश में रहते हैं, जहां 90 फीसदी आबादी गरीब या मध्यमवर्गीय है। वह पैसे भी बचाना चाहती है। जापान की आर्थिक स्थिति से हमारी तुलना नहीं हो सकती। चीन में भी बुलेट ट्रेन के कुछ मार्ग असफल हो चुके हैं।

भारतीय रेल बनाम बुलेट ट्रेन बुलेट ट्रेन की स्पीड 350 किलोमीटर प्रति घंटा के आसपास रहती है। भारतीय रेल में राजधानी 130 किलोमीटर प्रतिघंटे की गति से चलती है। पर अगर हम भारतीय रेलवे के इन्ही पटरियों को यात्री ट्रेन के लिए डेडिकेटेड बनाएं और बिना ठहराव वाली द्रूत गति की ट्रेन चलाएं तो अपनी स्वदेशी तकनीक से ही 160 किलोमीटर की गति प्राप्त कर सकते हैं। हमारे एलएचबी कोच और आधुनिक लोकोमोटिव इसमें सक्षम हैं। यानी इस पैमाने पर हम स्वदेशी तकनीक से अहमदाबाद से मुंबई साढे तीन घंटे में कोलकाता से दिल्ली या दिल्ली से मुंबई 9 से 10 घंटे में पहुंच सकते हैं।

भले ही ब्याज दर कम हो पर यह भी याद रखिए कि बुलेट ट्रेन हमारे ऊपर एक लाख करोड़ का कर्ज लेकर आ रही है जिसे हमें अगले  54 सालों में चुकाना होगा। तो आइए फिलहाल तो स्वागत करें गोली रेल का...

-    विद्युत प्रकाश मौर्य 

 ( BULLET TRAIN, INDIA, JAPAN ) 

Saturday, 26 August 2017

राजधर्म निभाने में असफल रहे मनोहर लाल

25 अगस्त 2017 के दिन पंचकूला शहर रक्तरंजित हो गया। इस पूरे प्रकरण में सरकारी मशीनरी पूरी तरफ फेल रही। मुख्यमंत्री मनोहर लाल अपना राजधर्म निभाने में बुरी तरह असफल रहे।

 30 से ज्यादा लोगों की मौत हो गई। हरियाणा पंजाब, यूपी, दिल्ली के कई इलाकों में हिंसा हुई। पर इन सबके लिए जिम्मेवार कौन है। पंचकूला में कई दिन पहले से गुरमीत राम रहीम के समर्थक जुटने लगे थे। मीडिया में खबरें आ रही थीं कि वे लोग ईंट, पत्थर, लाठी पेट्रोल आदि जुटा रहे हैं। उनका लक्ष्य साफ था कि अगर उनके गुरु के खिलाफ फैसला आयातो हिंसा फैलाएंगे। तमाम समर्थक ये बातें मीडिया से कह भी रहे थे। तब सरकार ने इससे निपटने की तैयारी नहीं की। अच्छा होता कि पंचकूला शहर की कई दिन पहले नाकेबंदी कर दी गई होती। पंचकूला आने वाले सारे रास्तों को बंद कर दिया गया होता तो हालात इतने बुरे नहीं होते।

पर ये सरकार के खुफिया विभाग की असफलता भर नहीं है। राज्य सरकार की राजनीतिक तौर पर भी असफलता है। राज्य सरकार के एक मंत्री का ये कहना कि लोग एक एक करके आ रहे हैं तो हम उन्हें कैसे रोक सकते हैं। बड़ा गैर जिम्मेवाराना बयान था। इतना ही नहीं वे ही मंत्री राम रहीम के डेरे में कभी चंदा देने भी गए थे। इसे वे अपना निजी मामला मानते हैं। रिपोर्ट के मुताबिक डेढ लाख डेरा समर्थक पंचकूला पहुंच गए थे। उनके खाने पीने आदि का इंतजार कहां से कैसे हो रहा था पर इस राज्य प्रशासन की नजर नहीं थी क्या..


 इसी राम रहीम ने 2015 के विधान सभा चुनाव में अपने समर्थकों से भाजपा को वोट देने की अपील की थी। पर ये सारे लोग जानते हैं कि इस धर्मगुरू पर कई गंभीर मुकदमे चल रहे हैं। बलात्कार, हत्या और लोगों को नपुंसक बनाने जैसे संगीन मामले चल रहे हैं। एक टीवी चैनल पर उच्च न्यायालय के अवकाश प्राप्त न्यायधीश कह रहे थे कि ये कैसा धर्म गुरू है जो अपने भक्तों शांति बनाए रखने की अपील गंभीरता से नहीं कर रहा है। 25 अगस्त के फैसले के बाद हुई हिंसा में जान गंवाने वाले लोगों की मौत के लिए जिम्मेवार कौन है। निश्चय ही राज्य सरकार को इस असफलता के लिए जिम्मेवार ठहराया जाना चाहिए। जाट आरक्षण आंदोलन के बाद यह राज्य सरकार की दूसरी बड़ी प्रशासनिक विफलता है। 
केंद्र सरकार को तुरंत राज्य में नेतृत्व परिवर्तन के बारे में गंभीरता से विचार करना चाहिए। अगर केंद्र सरकार इन सबके बावजूद मनोहर लाल को क्लीन चीट देती है तो पार्टी के हित में काफी हानिकारक होगा। पहले जाट आंदोलन फिर रामपाल की गिरफ्तारी का मामला हो या फिर अब राम रहीम प्रकरण मनोहर लाल अपनी विश्वनीयता खो चुके हैं। 
ताकि सनद रहे - राम रहीम के आश्रम में रामविलास शर्मा । 


शर्म की बात है कि उनके मंत्रिमंडल में रामविलाश शर्मा जैसे शिक्षा मंत्री हैं जो इसी 16 अगस्त को राम रामहीम के आश्रम में जाकर 51 लाख का दान देकर आए थे और चरणों में लोट कर दंडवत प्रणाम किया था।


गुरमीत राम रहीम डेरा के प्रवक्ता आदित्य इंसा ने 24 तारीख टीवी पर कहा था कि 5 से 7 लाख संगतें पंचकूला पहुंच चुकी है। वहीं हरियाणा सरकार के शिक्षा मंत्री रामविलास शर्मा ने कहा था कि पंचकूला में डेरा के लोग हमारे नागरिक हैं उन्हें खानापीना उपलब्ध कराना हमारी जिम्मेवारी है।
अब जरा इस लिंक पर जाकर उस पीड़िता का पत्र भी पढ़ लिजिए जिसकी बिनाह पर मामला आगे बढ़ा और राम रहीम यौन शोषण के मामले में दोषीकरार दिए गए।  मुझे वेश्या बना दिया गया।    ये महिला विषयों पर केंद्रित स्त्रीकाल वेबसाइट का लिंक है। 
-    विद्युत प्रकाश मौर्य


Thursday, 17 August 2017

ओ कान्हा इस देस में मत आना...

इस बार श्रीकृष्ण जन्माष्टमी अगस्त में आया। और अगस्त में ही गोरखपुर में सैकड़ो नौनिहाल इनसेफेलाइटिस यानी जापानी बुखार से मर गए। रोजाना बच्चों की मौत का सिलसिला जारी है। सारा देश नटवर नागर कान्हा के जन्म की तैयारियां में जुटा था और उधर अस्पताल में एक एक कर नौनिहाल मर रहे थे। भला वह मां कैसे जन्माष्टमी मनाएगी जिसका लाल ठीक से दुनिया भी नहीं देख पाया। हम कान्हा के लिए दूध, मलाई मिश्री और माखन का इंतजाम करते हैं पर ये मां के लाडले तो महज ऑक्सीजन की कमी से मरे जा रहे हैं।

सरकार के पास तो हवा देने के लिए पैसे नहीं हैं तो माखन मिश्री मलाई कहां से आएगी... हम कान्हा के इंतजार में बड़े दिल से स्वागत गान गाते हैं... बड़ी देर भई नंदलाला तेरी राह तके बृजबाला...पर इस बार हम कान्हा कैसे बुलाएं... जो पहले से आ चुके हैं उनके लिए सांस लेने का भी इंतजाम नहीं है हमारे पास। ऊपर से मंत्री जी कहते हैं कि अगस्त में तो हर साल बच्चे मरते ही हैं। तो इस जन्माष्टमी में यह कहने की इच्छा हुई ओ कान्हा इस देस में मत आना। फिर सुनने में आया कि जन्माष्टमी के बाद भी दो दिन में 34 नौनिहालों ने गोरखपुर के इस अस्पताल में दम तोड़ दिया।

कान्हा तुम पांच हजार साल पहले आए थे, अब दुबारा भले मत आयो और इन नौनिहालों की सांसे तो बचाने का कुछ जुगत लगाओ। इस योगी से कोई उम्मीद नहीं बची अब पर तुम्हे लोग महायोगी कहते हैं। तो अब तुमसे ही उम्मीद बंधी हैं। तुम्ही सच्चे भारत के रखवाले हो तो सारी माताएं तुम्हारी राह ताक रही हैं। कान्हा कुछ करो. चमत्कार करो कुछ, सुदर्शन चक्र चलाओ, उन दुश्मनों का नाश करो जो इन माताओं की लगातार गोद सूनी किए जा रहे हैं। अब कोई भारत का रखवाला नहीं है। कहां हो मुरली वाले...हमारी सुन भी रहे हो या नहीं...
- विद्युत प्रकाश मौर्य


Saturday, 12 August 2017

गोरखपुर के मासूमों का हत्यारा कौन...

यूपी का शहर गोरखपुर। यहां के बीआरडी मेडिकल कालेज हास्पीटल में 32 बच्चों की आक्सीजन की कमी से एक दिन में ही मौत हो गई। आक्सीजन की कमी से 5 दिन में 63 बच्चे दम तोड़ चुके हैं। यूपी में भाजपा की सरकार बनने के छह महीने के अंदर की सबसे बड़ी हृदयविदारक घटना है। इसी पूरी घटना में सरकारी मिशनरी की पूरी लापरवाही नजर आती है। 11 अगस्त को बड़ी संख्या में बच्चों की मौत होती है, वहीं 9 अगस्त को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इस अस्पताल का दौरा किया था। लेकिन उन्हें अस्पताल में अव्यवस्थाओं की जानकारी नहीं मिली।

अब ये साफ हो चुका है कि 69 लाख का बिल बकाया होने के कारण अस्पताल को आक्सीजन सप्लाई करने वाली कंपनी ने सिलेंडरों की सप्लाई बंद कर दी थी। इस संबंध में 30 जुलाई को ही समाचार पत्रों में खबर छपी थी- बीआरडी में ठप हो सकती है लिक्विड आक्सीजन की सप्लाई... तो इसके बाद भी प्रशासन नहीं चेता था। तो ये बहुत बड़ी लापरवाही का मामला है। 


नियम के अनुसार किसी सरकारी सप्लायर का बकाया 10 लाख रुपये से ज्यादा हो जाए तो वह सप्लाई रोक सकता है। भाजपा सरकार जो बेहतर गवर्ननेंस की बात करती है उसके राज में ये और भी शर्मनाक है। अगर किसी कंपनी का 69 लाख रुपये का बिल रोका गया तो इसमें भ्रष्टाचार, रिश्वत और कमिशनखोरी की भी गंध आती है। भला कंपनी के रुपये क्यों रोके गए। इस पर सरकार को जवाब देना होगा।

अब सरकार की लीपापोती का नमूना देखिए। सरकार ने क्राइसिस मैनेजमैंट की जगह दम तोड़ रहे बच्चों की खबर के बीच यह मैनेज करने की कोशिश में लग गई कि बच्चों की मौत आक्सीजन सिलेंडर की कमी से नहीं हुई है। 

यूपी सरकार के अधिकृत ट्विटर खाते से ट्वीट किया गया - गोरखपुर के बीआरडी मेडिकल कॉलेज में ऑक्सीजन की कमी से किसी रोगी की मृत्यु नहीं हुई है।

इतना ही नहीं आगे लिखा गया - कुछ चैनलों पर चलाई गई ऑक्सीजन की कमी से पिछले कुछ घंटों में अस्पताल में भर्ती कई रोगियों की मृत्यु की खबर भ्रामक है।
वहीं मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के आधिकारिक ट्विटर खाते - @myogiadityanath से बच्चों की मौत पर कोई ट्वीट नहीं किया गया। कोई शोक नहीं जताया गया। बल्कि वे अपने खाते पर अमितशाह को बधाई देते हुए फोटो पोस्ट करने में व्यस्त रहे।

हाल में एनडीए के परिवार में शामिल हुए हैं बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार। वही नीतीश कुमार हैं जो केंद्र में रेल मंत्री रहते हुए 2 अगस्त 1999 में बंगाल के उत्तर दिनाजपुर जिले के गैसाल रेलवे स्टेशन ( बिहार के किशनगंज से 17 किलोमीटर आगे) पर हुए हादसे में अपनी नैतिक जिम्मेवारी लेते हुए रेल मंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया था। क्या गवर्ननेंस के मामले में यूपी के सीएम योगी बिहार के सीएम नीतीश से कुछ प्रेरणा लेंगे।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य

Tuesday, 18 July 2017

क्या मायावती दीए की बुझती हुई लौ हैं....

राज्यसभा में मंगलवार 18 जुलाई को बहुजन समाज पार्टी की सुप्रीमो मायावती ने इस्तीफा देने की धमकी दी। उनका आरोप है कि उन्हें यूपी के सहारनपुर में हुए दलितों पर अत्याचार के मुददे पर बोलने नहीं दिया जा रहा है। वहीं राज्यसभा के सभापति का कहना था कि उनका जितना समय तय था उतना समय मिला है। वास्तव में बहनजी को पता है कि अगली बार जीत कर उच्च सदन में तो आ नहीं सकती, इसलिए जाते जाते शहादत का ड्रामा कर लो. अब तो मायावती जी का दलित जनाधार भी दरक चुका है इसलिए बहन जी. चंद्रशेखर आजाद रावण जैसों को रास्ता दें।
यहां यह बात भी गौर फरमाने की है कि मायावती जी का राज्यसभा में कार्यकाल अगले आठ महीने बाद ही खत्म होने वाला है। यूपी में 2017 के विधानसभा चुनाव में बुरी तरह हार के बाद उनके पास इतना भी संख्याबल नहीं है कि वे अगली बार उच्च सदन में प्रवेश कर सकें। इसलिए सदस्यता का कार्यकाल पूरा होने से थोड़ा पहले कोई मुद्दा गर्म करके इस्तीफा दे देने से वे अपने दलित समाज के भाई बहनों में कोई मजबूत संदेश देने में वे सफल हो जाएंगी। पर अब ऐसा मुश्किल लगता है। देश के कई दलित नेतृत्व एक एक कर हासिए पर जा रहे हैं। बिहार के दलित नेता रामविलास पासवान भाजपा के गोद में जाकर बैठ चुके हैं। अब वे दलित मुद्दों पर कोई बयान भी देते। वहीं एक और दलित नेता उदित राज तो अपनी पार्टी का विलय भाजपा में करके दिल्ली के रास्ते से संसद में भी पहुंच चुके हैं। वहीं आरपीआई का रामदास अठावले भी भाजपा के साथ आकर मंत्रीपद की मलाई खा रहे हैं। ऐसे में इस खालीपन को भरने के लिए नए चेहरे आ रहे हैं। सहारनपुर आंदोलन के साथ चंद्रशेखर आजाद रावण जैसे तेजतर्रार युवा चेहरा उभर कर सामने आ चुका है। गुजरात में जिग्नेश मेवानी जैसे नेता आए हैं जिनके अंदर काफी आग है।
हालांकि हमारे कुछ साथियों को लगता है कि अभी मायावती का दौर खत्म नहीं हुआ है। पत्रकार अभय मेहता लिखते हैं - मेरे ख्याल से राजनीति में किसी को इतनी जल्दी ख़ारिज नहीं किया जा सकता। हो सकता है उनका जनाधार दरक रहा हो। पर कोई गठबंधन जैसी सूरत में वो दमदार वापसी कर सकती हैं। आप इस इस्तीफे की तात्कालिकता को देख रहे हैं। मायावती का वोट बैंक (कोई 15 फीसदी ) बद से बदतर हालात में उनके साथ रहेगा। हालांकि वोटबैंक किसी गणितीय सिद्धांत पर हमेशा साथ नहीं रहता। उत्तरप्रदेश के कई दलित पिछड़े और मुस्लिम नेता उनका साथ छोड़ चुके हैं। वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप भटनागर लिखते हैं – माया का खेल खत्म। क्या सचमुच मायावती दीये की बुझती हुई लौ हैं... आगे खेल कौन खेलेगा ये अभी कहना भले मुश्किल हो लेकिन देश को बेहतर दलित नेतृत्व की जरूरत है।
-    विद्युत प्रकाश मौर्य



Friday, 16 June 2017

कैसे बचें साइबर धोखाधड़ी से


तकनीक ने कई काम आसन किए हैं तो ठगे जाने की संभावनाएं भी बढ़ी है। कई बारे आपके भोलेपन का लाभ उठाकर साइबर ठग आपका खाता खाली कर सकते हैं।

अपना एटीएम पिन किसी को न बताएं
-  किसी को कभी अपने बैंक के एटीएम पिन नहीं बताएं
याद रखें कभी किसी बैंक का अधिकारी या स्टाफ फोन पर आपका पिन नहीं पूछता है।
अपना आधार नंबर किसी को भी फोन पर पूछने पर नहीं बताएं
हमेशा सुरक्षित यानी  https:/ से शुरू होने वाले वेब साइट पर ही भरोसा करें।
अपने बारे में बड़ी जानकारियां किसी वेबसाइट पर सेव न करें
कंप्यूटर पर कभी भी डाटा ऑटो फिल न करें
इंटरनेट की बैंकिंग और बैंकिंग लेन-देन का इस्तेमाल कभी भी सार्वजनिक स्थान साइबर कैफेऑफिस से न करें।
बैंकिंग लेन-देन के लिए आप अपने पर्सनल कम्प्यूटर या लैपटॉप का ही इस्तेमाल करें.

पासवर्ड को लेकर सावधान रहें

अपने पासवर्ड या बाकी जानकारी सेव करने का विकल्प क्लिक न करें।
पासवर्ड टाइप करने के बाद कंप्यूटर द्वारा पूछे जा रहे विकल्प रिमेब्बर पासवर्ड या कीप लॉगिन में क्लिक नहीं करें।
हमेशा बहुत सही मजबूत पासवर्ड का प्रयोग करेंजिससे आसानी से किसी को पता न चले।
आपका पासवर्ड कम से कम आठ कैरेक्टर का होना चाहिए जो कि लोअर केस लेटर्स,  अपर केस लेटर्स,  नंबर्स और स्पेशल कैरेक्टर्स का मिश्रण होना चाहिए।

ऑनलाइन दोस्ती में सावधानी बरतें
ग्लोबल (इंटरनेशनल) सिम से कोई व्यक्ति व्हाट्स एप पर संपर्क करता है तो बचकर रहें।
चैटिंग भले ही करते रहेंमगर चैटिंग के दौरान निजी सूचनाओं का आदान-प्रदान न करें।
चैटिंग के दौरान सामने वाले द्वारा दिए गए प्रलोभन के झांसे में न आएं।
अगर कोई आपको किसी बैंक खाते में कोई धनराशि जमा करने को कहता है तो इस प्रलोभन में न आएं कि वह आपको कोई लाभ कराएगा।

शुरुआत में कभी भी फेसबुक मैसेंजर पर आने वाले एड्रेस पर संपर्क न करें।


- vidyutp@gmail.com 

Monday, 5 June 2017

1972 में हुआ था पहला पर्यावरण सम्मेलन

1. पर्यावरण प्रदूषण की समस्या पर 1972 में संयुक्त राष्ट्र संघ ने स्टाकहोम (स्वीडन) में विश्व भर के देशों का पहला पर्यावरण सम्मेलन आयोजित किया। इसमें 119 देशों ने भाग लिया। 

2
संयुक्त राष्ट्र द्वारा घोषित विश्व पर्यावरण दिवस वैश्विक स्तर पर राजनीतिक और सामाजिक जागृति लाने के लिए मनाया जाता है। इसकी शुरुआत 5 जून 1973 से हुई।

3
भारत में 19 नवंबर 1986 से पर्यावरण संरक्षण अधिनियम लागू हुआ। जल, वायु, भूमि। इन तीनों से संबंधित कारक तथा मानव, पौधों, सूक्ष्म जीव अन्य जीवित पदार्थ आदि पर्यावरण के अंतर्गत आते हैं।


4 भारत में 50 करोड़ से भी अधिक जानवर हैं जिनमें से पांच करोड़ प्रति वर्ष मर जाते हैं वन्य प्रणियों की घटती संख्या पर्यावरण के लिए घातक है।

5
गिद्ध की प्रजाति वन्य जीवन के लिए वरदान है पर अब 90 प्रतिशत गिद्ध मर चुके हैं इसीलिए देश के विभिन्न भागों में सड़े हुए जानवरों को खाने वाले नहीं रहे। 

6
हमारी धरती का तीन चौथाई हिस्सा जल है फिर भी करीब 0.3 फीसदी जल ही पीने लायक है। डब्लूएचओ के अनुसार पेयजल का पीएच मानक 7 से 8.5 के बीच होना चाहिए। 

7
धरती पर उपलब्ध पीने योग्य 0.3 फीसदी जल का 70 फीसदी हिस्सा भी इतना प्रदूषित हो गया है कि वह पीने लायक नहीं रहा। 

8
भारत सरकार के पर्यावरण एवं वन मंत्रालय द्वारा एक-एक लाख रुपये का इंदिरा गांधी पर्यावरण पुरस्कार प्रति वर्ष 19 नवंबर को प्रदान किया जाता है।

9
जब वायु में कार्बनडाई ऑक्साइड, नाइट्रोजन के ऑक्साइडों की वृद्धि हो जाती है, तो ऐसी वायु को प्रदूषित वायु त्और इस प्रकार के प्रदूषण को वायु प्रदूषण कहते हैं।

10
 विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक दुनिया भर में वायु प्रदूषण की वजह से साल 2012 में 70 लाख लोगों की मौतें हुई। 

11
दुनिया भर में हर साल होने वाली आठ मौतों में से एक वायु प्रदूषण के कारण होती है। 

12
देश की कुल ऊर्जा का आधा भाग केवल रसोई घरों में खर्च होता है। देश के कुल प्रदूषण का बड़ा हिस्सा केवल रसोई घरों से उत्पन्न होता है।

13
एक मोटरगाड़ी एक मिनट में इतनी अधिक मात्रा में ऑक्सीजन खर्च करती है जितनी कि 1135 व्यक्ति सांस लेने में खर्च करते हैं।

14
1952 में पांच दिन तक लंदन शहर रासायनिक धुएं से घिरा रहा, जिससे 4000 लोग मौत के शिकार हो गए एवं करोड़ों लोग हृदय रोग और ब्रोंकाइटिस के शिकार हो गए थे।

15 
भारत में वाहनों से प्रतिदिन 60 टन सूक्ष्म कण, 630 टन सल्फर डाई ऑक्साइड, 270 टन नाइट्रोजन आक्साइड और 2040 टन कार्बन डाईआक्साइड उत्सर्जित होता है। 

16 
दुनिया के 20 सबसे ज्यादा प्रदूषित शहरों में 13 भारतीय शहर शमिल हैं। दिल्ली दुनिया के सबसे ज्यादा प्रदूषित शहरों में शामिल है। 

17
वायु प्रदूषण से दमा, ब्रोंकाइटिस, सिरदर्द, फेफड़े का कैंसर, खांसी, आंखों में जलन, गले का दर्द, निमोनिया, हृदय रोग, उल्टी और जुकाम आदि रोग होते हैं।

18
पानी की कमी के कारण प्रति हेक्टेयर पैदावार घट रही है, हिमनदियों का सिकुड़ना, बीमारियों में वृद्धि और अनेक प्रजातियों के विलुप्त होने का खतरा लगातार बढ़ रहा है।

19 
धरती पर सन 1800 के बाद ग्लेशियर पिघलने लगे हैं। अनुमान है कि यदि ग्रीनलैंड की सारी बर्फ पिघल गई तो समुद्र के स्तर में लगभग सात मीटर की बढ़ोतरी होगी।

20 
आईपीसीसी के अनुसार पिछले 250 सालों में धरती के वातावरण में कार्बन डाईआक्साइड गैस की मात्रा 280 पीपीएम से बढ़कर 379 पीपीएम हो गई है। 

21 
हर घर की छत पर वर्षा जल का भंडारण करने के लिए एक या दो टंकी बनाई जाए और इन्हें मजबूत जाली या फिल्टर कपड़े से ढक दिया जाए तो काफी जल संरक्षण किया जा सकेगा।

22
पर्यावरण बचाने के लिए इंटेग्रेल प्लान ऑफ क्लाइमेट चेंज बनाया गया है जिसमें दुनिया भर के 2000 पर्यावरण वैज्ञानिक शामिल हैं। 

23 
1988 में भारत सरकार ने राष्ट्रीय वन नीति और 2006 में राष्ट्रीय पर्यावरण नीति बनाई जिसके तहत वन संरक्षण और प्रदूषण नियंत्रण के उपाय किए जाते हैं।

24 
नदियों के संरक्षण के लिए राष्ट्रीय नदी परिरक्षण निदेशालय और राष्ट्रीय गंगा नदी घाटी प्राधिकरण का गठन पर्यावरण और वन मंत्रालय के तहत किया गया है।
 
25 
हर रोज 1200 करोड़ लीटर गंदा पानी देश की सबसे बड़ी नदी गंगा में डाला जाता है। गंगा का जल स्नान करने लायक भी नहीं बचा।

26 
पर्यावरण से संबंधित कानूनी मामलों सहित, पर्यावरण संरक्षण एवं वनों और अन्य प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के निपटारे के लिए 2010 को राष्ट्रीय हरित अधिकरण की स्थापना की गई।
 
27 
ई-कचरा से भी पर्यावरण को बड़ा खतरा है। 2004 में देश में ई-कचरे की मात्रा 1.46 लाख टन थी जो 2012 में आठ लाख टन तक पहुंच गई। 

28 
बेंगलुरु में 1700 आईटी कंपनियां काम कर रही हैं। उनसे हर साल 6000 हजार से 8000 टन इलेक्ट्रॉनिक कचरा निकलता है। 

29 
जल प्रदूषण के नियंत्रण और रोकथाम और देश में पानी की स्वास्थ्य-प्रदता बनाए रखने के लिए भारत सरकार ने 1974 में अधिनियम बनाया। 

30 
अप्रैल 2010 के बाद भारत में बनने वाले सभी वाहनों को बीएस-4 मानकों के तहत लाया गया जिससे कम से कम प्रदूषण हो।

Friday, 12 May 2017

खतरनाक होगा चारधाम को रेल नेटवर्क से जोड़ना

उत्तराखंड में बद्रीनाथ, गंगोत्री तक रेल मार्ग बनाने की योजना निहायत बेवकूफी भरी है। 327 किलोमीटर के इस रेल परियोजना पर 40 हजार करोड़ खर्च होंगे। सर्वे में 21 नए स्टेशन, 61 सुरंगे और 59 पुल बनाने की सिफारिश की गई है। 

हकीकत यह है कि अभी उत्तराखंड के चार धाम के लिए ऑल वेदर रोड भी नहीं है। लैंड स्लाइडिंग के कारण कभी भी सड़क मार्ग तक बंद हो जाता है। ऐसे क्षेत्र में रेल लाइन बनाना अक्लमंदी नहीं होगी। 40 हजार करोड के खर्च के बाद इस मार्ग पर कितने लोग सफर करेंगे। वहां रेल पहुंचना पहाड़ों की प्राकृतिक संपदा के साथ भारी छेड़छाड़ को बढ़ावा देगा। साथ ही हिमालय के पर्यावरण को भी भारी नुकसान पहुंचाएगा। 

अगर हम पहाड़ों पर रेल की बात करें तो ब्रिटिश काल में कालका शिमला नैरो गेज और पठानकोट-जोगिंदरनगर नैरोगेज और सिलिगुड़ी दार्जिलिंग जैसी रेलवे लाइनें बिछाई गईं। ये सभी लाइनें नैरोगेज थीं। इनके लिए ज्यादा जमीन की जरूरत नहीं है। नैरोगेज रेल से पहाड़ों के पर्यावरण को नुकसान नहीं पहुंचता। नैरोगेज रेल तीखे मोड़ पर मुड़ भी जाती है। सौ साल से ज्यादा समय से सफलतापूर्वक दौड़ रहीं कालका शिमला और दार्जिलिंग हिमालयन रेलवे विश्व विरासत का हिस्सा भी हैं। पर खेद की बात है कि आजादी के बाद किसी भी पहाड़ को नैरोगेज रेल से नहीं जोड़ा गया। 

हिमालय की उत्तराखंड की पर्वतमाला की चट्टाने कोमल हैं। यहां अक्सर लैंडस्लाइडिंग का खतरा रहता है। वहीं भूकंप के लिहाज से भी संवेदनशील है। ऐसे क्षेत्र में ब्राडगेज रेलवे का निर्माण एक खतरनाक कदम होगा। हिमालय के पारिस्थिक तंत्र से भारी छेड़छाड़ होगा। सरकार को ये मूर्खतापूर्ण परियोजना जितनी जल्दी हो बंद कर देनी चाहिए। इसकी जगह चाहे तो नैरो गेज रेलवे के संचालन के बारे में विचार किया जा सकता है। हालांकि साल के छह महीने की कनेक्टिविटी के लिए उसकी भी जरूरत नहीं है। इसकी जगह रेलवे को मैदानी इलाके में विस्तार पर ध्यान देने की ज्यादा जरूरत है। खासकर उन जिला मुख्यालय और लाखों की आबादी वाले शहरों को तक रेल पहुंचाने की जरूरत हैं जहां अभी तक रेल की सिटी नहीं बजी है।

शंकराचार्य भी पक्ष में नहीं - शंकराचार्य वासुदेवानन्द सरस्वती ने कहा कि चार धामों को रेल लाइन से जोड़ा जाना ठीक नहीं है। कहा कि प्रथम राष्ट्रपति राजेन्द्र प्रसाद जब श्रीनगर गढ़वाल आए थे तो लोगों ने उनसे बदरीनाथ तक रेल लाइन की मांग की थी, लेकिन राजेन्द्र प्रसाद ने इसे धार्मिक मान्यता एवं परंपरा के विपरीत बताते हुए अस्वीकार किया था। कहा कि सरकार को प्रदेश की आर्थिकी बढ़ाने के लिए पर्यटन स्थलों का विकास करना होगा। लेकिन धार्मिक एवं तीर्थ स्थलों को पर्यटन स्थल की तरह विकसित करना धर्म संगत नहीं है। 

रेल लाइन बिछने से जहां पहाड़ कमजोर होंगे वहीं भूस्खलन जैसी प्राकृतिक आपदा का भी भय रहेगा। रेल लाइन बिछाने के लिए कई सुरंगें बनानी होंगी जिससे पहाड़ खोखले होंगे। कहा कि रेल लाइन से बेहतर है कि सरकार चारों धामों तक फोर लेन सड़क विकसित करें।
- vidyutp@gmail.com