Monday, 23 April 2018

पूर्वोत्तर के तीन राज्यों से हट चुका है विवादित अफ्स्पा कानून

पूर्वोत्तर के सात राज्यों में से तीन राज्यों में विवादित अफ्स्पा कानून को हटाया जा चुका है। मेघालय से पहले यह कानून त्रिपुरा और मिजोरम में भी अप्रभावी हो चुका हैवहीं अरुणाचल प्रदेश में यह आंशिक रूप से ही लागू है। पूर्वोत्तर के बाहर यह जम्मू कश्मीर में भी 90 के दशक से ही लागू है। हालांकि वहां भी बार-बार इसे हटाने मांग उठती रही है।

जम्मू कश्मीर में भी लागू
अफ्स्पा कानून 28 साल से जम्मू कश्मीर में भी लागू है। 1990 में अशांत कश्मीर में इसे लागू किया गया। फरवरी 2018 में जम्मू-कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने हालात का हवाला देते हुए कश्मीर में विवादित अफ्सपा को हटाने से इनकार किया।

60 साल पुराना कानून
1958 में  एक सितंबर को 07 राज्यों में ‘अफ्स्पा’ लागू किया गया।(असममणिपुरत्रिपुरामेघालयअरुणाचल प्रदेशमिजोरम और नगालैंड )
1986 में मिजो समझौता के बाद मिजोरम में अफ्स्पा निष्क्रिय हो गया।
2015 के मई महीने में त्रिपुरा में कानून व्यवस्था की स्थिति की संपूर्ण समीक्षा के बाद अफ्स्पा हटा लिया गया।
2018 में 31 मार्च को मेघालय से भी अफ्स्पा कानून को हटाया गया।

सेना को विशेष अधिकार देता है ‘अफ्स्पा
भारतीय संसद ने 1958 में ‘अफ्स्पा’ यानी ‘आर्म्ड फोर्स स्पेशल पावर एक्टको लागू किया। यह एक फौजी कानून हैजिसे उन राज्यों में लागू किया गया जहां कानून व्यवस्था के हालात ज्यादा खराब थे। यह कानून सुरक्षा बलों और सेना को कई विशेष अधिकार देता है।

बिना वारंट के गिरफ्तारी
1. यदि कोई व्यक्ति कानून तोड़ता है और अशांति फैलाता हैतो सेना बल का प्रयोग कर सकती है।
2. अफसर किसी आश्रय स्थल या ढांचे को तबाह कर सकता हैजहां से हथियार बंद हमले का अंदेशा हो।
3. सशस्त्र बल किसी भी असंदिग्ध व्यक्ति को बिना किसी वारंट के गिरफ्तार कर सकते हैं।
4 . सेना किसी परिवार में बिना वारंट के घर के अंदर जा कर तलाशी ले सकता है।
6. वाहन को रोक कर या गैर-कानूनी ढंग से हथियार ले जाने पर उसकी तलाशी ली जा सकती है।
7. सेना के अधिकारियों को उनके वैध कार्यों के लिए कानूनी प्रतिरक्षा दी जाती है।

नगालैंड में अभी भी लागू
2015 में 3 अगस्त को नगा विद्रोही समूह एनएससीएन (आईएम)महासचिव टी मुइवा और सरकार की ओर से वार्ताकार आरएन रवि के बीच प्रधानमंत्री की मौजूदगी में मसौदा समझौते पर हस्ताक्षर होने के बावजूद नगालैंड में यह कानून लागू है।

इन्होंने किया था विरोध -

इरोम शर्मिला ने 16 साल संघर्ष किया
2000 में 4 नवंबर को अफ्स्पा कानून के विरोध में मणिपुर की मानवाधिकार कार्यकर्ता इरोम शर्मिला ने उपवास शुरू किया। उनका उपवास16 साल तक चला। उनके विरोध की शुरुआत सुरक्षा बलों की कार्यवाही में कुछ निर्दोष लोगों के मारे जाने की घटना से हुई।
औपनिवेशिक कानून बताया था
2009 में संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार आयोग के कमिश्नर नवीनतम पिल्लई ने इस कानून के खिलाफ जबरदस्त आवाज उठाई थी। उन्होंने इस कानून को देश के सभी हिस्सों से पूरी तरह से हटाने की मांग की थी। पिल्लई ने  इसे औपनिवेशिक कानून की संज्ञा दी थी।-
vidyutp@gmail.com
(AFSPA, NORT EAST, J &K , 1958 LAW ) 

Monday, 9 April 2018

कर्नाटक : लिंगायतों का मुद्दा गरमाया


19 मार्च 2018 को कर्नाटक में विधानसभा चुनाव से ठीक पहले कांग्रेस ने बड़ा दांव खेला। सिद्धारमैया सरकार ने लिंगायत समुदाय को अलग धर्म का दर्जा देने की सिफारिश मंजूर कर ली है। लिंगायत समुदाय वर्षों से हिंदू धर्म से अलग होने की मांग करता रहा है।
नागमोहन दास समिति
समुदाय की मांगों पर विचार के लिए नागमोहन दास समिति गठित की गई थी। राज्य कैबिनेट ने समिति की सिफारिशों को स्वीकार कर लिया है। कर्नाटक ने इस प्रस्ताव को अंतिम स्वीकृति के लिए केंद्र के पास भेजा है। राज्य की कांग्रेस सरकार ने लिंगायत समुदाय को अलग धर्म का दर्जा देने का फैसला ऐसे समय किया हैजब अप्रैल-मई में विधानसभा के चुनाव होने हैं।

वीरशैव लिंगायत फैसले के खिलाफ
कर्नाटक सरकार के इस फैसले का वीरशैव लिंगायत समुदाय ने विरोध किया है। उनका कहना है कि वीरशैव लिंगायत को लिंगायत से अलग धर्म घोषित किया जाए।

पुराना मुद्दा
लिंगायत समुदाय दशकों से भाजपा का समर्थन करता रहा है। हिंदू से अलग धर्म का दर्जा देने पर पर राज्य में भाजपा का मजबूत वोट बैंक खिसक सकता है। लिंगायत को कर्नाटक में फिलहाल ओबीसी का दर्जा मिला हुआ है।
18 फीसदी लिंगायत
कर्नाटक में इस समुदाय की आबादी 18 फीसदी है। लिंगायत का विधानसभा की तकरीबन 100 सीटों पर प्रभाव माना जाता है। कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री और भाजपा के वरिष्ठ नेता बीएस येदियुरप्पा इसी समुदाय से आते हैं।
भाजपा करती रही है विरोध
भाजपा लिंगायत को हिंदू धर्म से अलग करने की मांग का विरोध करती रही है। येदियुरप्पा कांग्रेस पर लिंगायत को अलग धर्म का दर्जा देकर समुदाय में फूट डालने की कोशिश करने का आरोप लगाते रहे हैं।
केंद्र के पास अंतिम अधिकार
अलग धर्म का दर्जा देने का अंतिम अधिकार केंद्र सरकार के पास है। राज्य सरकारें इसको लेकर सिर्फ अनुशंसा कर सकती हैं। लिंगायत को अलग धर्म का दर्जा मिलने पर समुदाय को मौलिक अधिकारों (अनुच्छेद 25-28) के तहत अल्पसंख्यक का दर्जा भी मिल सकता है। इसके बाद लिंगायत समुदाय अपना शिक्षण संस्थान भी खोल सकता है। फिलहाल मुस्लिमसिखईसाईबौद्धपारसी और जैन को अल्पसंख्यक का दर्जा हासिल है।
मोइली का समर्थन
कांग्रेस नेता और कन्नड़ साहित्य के लेखक वीरपप्पा मोइली ने कहा कि बीजेपी के पास लिंगायत मुद्दे पर कोई नरेटिव नहीं है। यह कोई नई बात नहीं है कि लिंगायत को हिंदू धर्म से अलग देखा जाए। जैसे बुद्ध और महावीर को अलग से मान्यता है और किसी धर्म के साथ नहीं बांधा गया है। उसी तरह लिंगायत को अल्पसंख्यक दर्जा देना उचित है।


लिंगायत और वीर शैव

लिंगायत और वीरशैव कर्नाटक के दो बड़े समुदाय हैं। इन दोनों समुदायों का जन्म 12वीं शताब्दी के समाज सुधार आंदोलन के स्वरूप हुआ। इस आंदोलन का नेतृत्व समाज सुधारक बसवन्ना ने किया था। बसवन्ना खुद ब्राह्मण परिवार में जन्मे थे। उन्होंने ब्राह्मणों के वर्चस्ववादी व्यवस्था का विरोध किया। वे जन्म आधारित व्यवस्था की जगह  कर्म आधारित व्यवस्था  में विश्वास करते थे। लिंगायत समाज पहले हिन्दू वैदिक धर्म का ही पालन करता था लेकिन इसकी कुरीतियों को दूर करने के लिए इस नए सम्प्रदाय की स्थापना की गई।

बासवन्ना ने जाति व्यवस्था में भेदभाव के खिलाफ आंदोलन छेड़ा था। वेदों और मूर्ति पूजा को नहीं माना। लिंगायत अपने शरीर पर गेंद की तरह एक इष्टलिंग बांधते हैं। उनका मानना है कि इससे मन की चेतना जागती है। लिंगायत खुद को वीरशैव से अलग बताते हैं। उनका कहना है कि वीरशेव बासवन्ना से भी पहले से हैं। वे शिव को मानते हैंजबकि लिंगायत शिव को नहीं मानते।
राजनीति में लिंगायत

224 सदस्यों वाली राज्य की विधानसभा में 52 विधायक लिंगायत हैं।

18 फीसदी है कर्नाटक में इस समुदाय की आबादी।

1980 के बाद लिंगायत वोट कर्नाटक में सरकार बनाने में अहम भूमिका निभाते हैं।

 - प्रस्तुति - विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com
(LINGAYAT, KARNATKA) 


Wednesday, 14 March 2018

ब्रह्मांड के रहस्यों से पर्दा उठाने वाला वैज्ञानिक

1965 में शादी के वक्त ( फोटो - द विंटाज न्यूज)
स्टीफन हॉकिंग को आधुनिक युग के बड़े वैज्ञानिक थे। उन्हें खासतौर पर ब्रह्मांड के रहस्यों पर से पर्दा उठाने के लिए जाना जाता है। हॉकिंग ने अपनी थ्योरी ऑफ एवरीथिंग में बताया था कि ब्रह्मांड का निर्माण स्पष्ट रूप से परिभाषित सिद्धांतों के आधार पर हुआ है। उन्होने ईश्वर के अस्तित्व को साफ तौर पर नकारा था। बिग बैंग थ्योरी और ब्लैसक होल पर उनके खोज ने सबको चकित कर दिया था। मशहूर भौतिक विज्ञानी और कॉस्मोलॉजिस्ट ने अपना जीवन ब्रह्मांड के रहस्यों  का पता लगाने के लिए समर्पित कर दिया था। स्टी फेंस ने विज्ञान को ही अपनी नियति माना और वैज्ञानिक सोच पर आधारित कई ऐसी बातें सामने रखीं, जिनसे ब्रह्मांड की समझ में बदलाव लाने वाला क्रांतिकारी मोड़ आए।

स्टीफन तार्किक दिमाग वाले व्यक्तियों थे और उन्हों ने सृष्टि  की रचना में कभी भगवान की मौजूदगी को नहीं माना। वह अपने दिमाग को भी एक कंप्यूटर ही मानते थे। उनका कहना था कि जिस दिन इसके पुर्जे खराब हो जाएंगे, उस दिन मैं भी नहीं रहूंगा। वह पुर्नजन्म में भी कोई सच्चाई नहीं मानते थे।

मजेदार बात है कि स्टीफन कॉलेज में गणित पढ़ना चाहते थे। उनके पिता ने उन्हें मेडिकल की पढ़ाई करने की सलाह दी थी। कॉलेज में गणित विषय उपलब्ध नहीं था, ऐसे में उन्होंने भौतिकी को चुना। तीन साल बाद उन्हें नेचुरल साइंस में फर्स्ट क्लास ऑनर्स डिग्री मिली। वह 1973 का साल था जब 21 साल के स्टीकफन हॉकिंग ऑक्सफोर्ड से भौतिकी में प्रथम श्रेणी से डिग्री लेने के बाद कॉस्मोलॉजी में पोस्टग्रेजुएट रिसर्च करने के लिए कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय चले गए। उसके बाद कैंब्रिज उनका स्थायी ठिकाना बन गया।

ब्लैक होल के बारे में
हॉकिंग ने बताया था कि ब्लैक होल का आकार सिर्फ बढ़ सकता है, ये कभी भी घटता नहीं है। ब्लैक होल के पास जाने वाली कोई भी चीज उससे बच नहीं सकती और उसमें समा जाती है और इससे ब्लैक होल का भार बढ़ता ही जाएगा। ब्लैक होल का भार ही उसका आकार निर्धारित करता है जिसे उसके केंद्र की त्रिज्या से नापा जाता है। ये केंद्र (घटना क्षितिज) ही वह बिंदू होता है जिससे कुछ भी नहीं बच सकता। इसकी सीमा किसी फूलते हुए गुब्बारे की तरह बढ़ती रहती है। हॉकिंग ने आगे बढ़कर बताया था कि ब्लैक होल को छोटे ब्लैक होल में विभाजित नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा था कि दो ब्लैक होल के टकराने पर भी ऐसा नहीं होगा। हॉकिंग ने ही मिनी ब्लैक होल का सिद्धांत भी दिया था।

खुद को नास्तिक बताया
स्टीफन हॉकिंग ने कहा था कि भगवान का अस्तित्व नहीं है और मैं 'नास्तिक' हूं। साल 2014 में स्टीफन ने एक साक्षात्कार में कहा था कि सेंट अल्बंस स्कूल में एक स्कूल के लड़के के रूप में उन्होंने ईसाई धर्म के बारे में अपने सहपाठियों के साथ तर्क किया और कॉलेज के दिनों में भी वह एक प्रसिद्ध नास्तिक थे। उनकी पहली पत्नी जेन ईसाई धर्म पर पक्का विश्वास करने वाली महिला थी।मगर, उन दोनों के बीच भी कभी धार्मिक मामलों को लेकर एक मत नहीं रहे थे। दुनिया के महान वैज्ञानिकों में शुमार स्टीफन हॉकिंग ने संसार के सृजन में ईश्वंर की भूमिका को लेकर भी एक अलग तरह का सिद्धांत दिया।

दुनिया को बनाने वाला कोई भगवान नहीं ( हॉकिंग की जुबानी ) 
मेरा मानना है कि कोई भगवान नहीं है। किसी ने भी हमारे ब्रह्मांड नहीं बनाया है और कोई भी हमारे भाग्य को निर्देशन नहीं करता है। यह दुनिया भौतिकी के नियमों के मुताबिक अस्तित्व में आई है। ब्रह्मांड की रचना को एक स्वतः स्फूर्त घटना है। जिस बड़े धमाके यानी बिग बैंग के बाद धरती और अन्य ग्रहों का जन्म हुआ वह वैज्ञानिक दृष्टि से अवश्यंभावी था। ब्रह्मांड एक भव्य डिजाइन है, लेकिन इसका भगवान से कोई लेना देना नहीं है।

अगर हमारे सौर मंडल जैसे दूसरे सौर मंडल मौजूद हैं तो यह तर्क गले नहीं उतरता कि ईश्वर ने मनुष्य के रहने के लिए पृथ्वी और उसके सौर मंडल की रचना की होगी। ब्रह्मांड में गुरुत्वाकर्षण जैसी शक्ति है इसलिए वह नई रचनाएं कर सकता है उसके लिए उसे ईश्वर जैसी किसी शक्ति की सहायता की आवश्यकता नहीं है। हम एक बहुत ही औसत तारे के एक छोटे ग्रह पर बसे बंदरों की उन्नत नस्ल हैं। मगर, हम ब्रह्मांड को समझ सकते हैं। यह बात हमें बहुत खास बना देती है। धर्म और विज्ञान के बीच एक बुनियादी अंतर है। धर्म जहां आस्था और विश्वास पर टिका है, वहीं विज्ञान ऑब्जर्वेशन (अवलोकन) और रीजन (कारण) कारण पर चलता है। विज्ञान जीत जाएगा क्योंकि यह काम करता है। हम सभी जो चाहें, उस पर विश्वास करने के लिए स्वतंत्र हैं।
अगर ईश्वर के बारे में कोई पक्का सिद्धांत बन सके तो वह विज्ञान की सबसे बड़ी कामयाबी होगी,तब हमारे पास ईश्वर के दिमाग को समझने का बच जाएगा। मैं हमेशा से ही सृष्टि की रचना पर हैरान रहा हूं। समय और अंतरिक्ष हमेशा के लिए रहस्य बने रह सकते हैं, लेकिन इससे मेरी कोशिशें नहीं रुकी हैं।

मानव को दूसरा घर खोजने की दी थी सलाह

स्टीफेन हॉकिंग ने कहा था कि इस धरती की उम्र ज्यादा नहीं बची है। अगर मानव प्रजाति को बचाना है तो अगले कुछ सौ सालों में हमें पृथ्वी से अलग किसी दूसरे ग्रह पर अपना घर तलाशने की शुरुआत कर देनी होगी। उन्होंने एक थ्योरी की माध्यम से इस बात की संभावना जाहिर की थी कि आने वाले कुछ सौ या हजार सालों में पृथ्वी पर क्लाइमेट चेंज,  महामारी,  जनसंख्या वृद्धि या एस्टेरॉयड के टकराने जैसा कोई बड़ा हादसा हो सकता है। अगर हम ब्रह्मांड में दूसरा घर तलाश लेंगे तो ही मानव प्रजाति को बचाया जा सकता है।

द थ्योरी ऑफ एवरीथिंग समेत कई बेस्ट सेलर किताबें लिखीं

1974 में ब्लैक होल्स पर असाधारण तौर पर शोध करके उसकी थ्योरी में नया मोड़ देने वाले स्टीफन हॉकिंग द ग्रैंड डिजाइन,  यूनिवर्स इन नट शेल,  माई ब्रीफ हिस्ट्री,  द थ्योरी ऑफ एवरीथिंग जैसी पुस्तकें लिखीं। इन पुस्तकों ने उनकी वैज्ञानिक समझ और चिंतन को दुनिया के सामने रखा। 1988में उन्हें सबसे ज्यादा चर्चा मिली थी, जब उनकी पहली पुस्तक 'ए ब्रीफ हिस्ट्री ऑफ टाइम: फ्रॉम द बिग बैंग टू ब्लैक होल्स' प्रकाशित होकर बाजार में आई। इसके बाद कॉस्मोलॉजी पर आई उनकी पुस्तक की 1 करोड़ से ज्यादा प्रतियां बिक गईं। इसे दुनिया भर में विज्ञान से जुड़ी सबसे ज्यादा बिकने वाली पुस्तक माना जाता है।

2014 में स्टीफन के जीवन पर फिल्म आई 

दुनिया के सबसे प्रसिद्ध भौतिकीविद और ब्रह्मांड विज्ञानी पर 2014 में थ्योरी ऑफ एवरीथिंग नामक फिल्म भी बन चुकी है। इस फिल्मा में स्टी1फन का किरदार एडी रेडमेने ने निभाया था। इसके लिए उन्होंसने उस साल बेस्ट  एक्ट र का ऑस्कएर पुरस्कार भी जीता। निर्देशक जेम्स मार्श ने निर्देशन में बनी इस फिल्म को 87वें एकेडमी अवॉर्ड्स में कुल पांच नोमिनेशन मिले थे। अभिनेत्री फेलिसिटी जोन्स नेफिल्म में उनकी पार्टनर की भूमिका निभाई थी।

फिल्म में निजी जिंदगी समाने आई

स्टीफन हॉकिंग ने 1965 मे जेन से शादी की थी। फिल्म थ्योरी ऑफ एवरीथिंग से स्टी5फन की निजी जिंदगी और इसकी हलचल लोगों के सामने आई थी। और साथ ही इस बात का खुलासा भी हुआ था कि उनकी पत्नी जेन के साथ बेहद प्याकर भरा रिश्ताउ कैसे वक्तस के साथ कड़वाहट में बदल गया। पहली पत्नी जेन ने फिल्म‍ की रिलीज के बाद एक साक्षात्कार में कहा था कि बीमारी के बावजूद मैं उनसे पहले जैसा प्यार करती थी। लेकिन एक दिन आया जब स्टीफन और मुझे अलग होना पड़ा। कई बार वो अपना पूरा हफ्ता अपनी कुर्सी पर बिता देते थे। वो कई बार मुझे और हमारे बच्चों को देखते भी नहीं थे। अपनी हालत के बारे में बताते नहीं थे। रिसर्च के बाद वो एक हस्ती बन चुके थे। मुझे इस बात से जलन नहीं थी, लेकिन इस वजह से हमारे रिश्तों में परेशानी आने लगी थी।

1995 में दूसरी शादी की
1995 में पहली पत्नी जेन से अलग होने के बाद स्टीफन ने अपनी नर्स एलेन मेसन से शादी कर ली।2006 में इन दोनों का भी तलाक हो गया। हॉकिंग की बेटी लूसी ने एलेन पर केस किया था वो हॉकिंग के साथ अमानवीय व्यवहार कर रही थीं। लेकिन 2004 में इस केस की जांच पूरी हुई और एलेन इस मुकदमे से बरी हो गईं। 

आइंस्टीन के जन्मदिन के दिन दुनिया छोड़ी
आइंस्टीन और हॉकिंग में कई समानताएं देखी जाती हैं। अल्बर्ट आइंस्टीन के बाद दुनिया केस्टीफन हॉकिंग को दुनिया का सबसे महान सैद्धांतिक भौतिकीविद माना जाता है। पर यह संयोग ही कहा जाएगा कि स्टीफन हॉकिंग की निधन का दिन और आइंस्टीन की जन्म का दिन एक ही यानी 14 मार्च है।

हॉकिंग का भारत का यादगार दौरा

साल 2001 में स्टीफन हॉकिंग ने भारत का यादगार दौरा किया था। यह उनका पहला भारत दौरा था, जो उनके लिए बेहद यादगार रहा था। कुल 16 दिन की भारत यात्रा पर आए स्टीफन हॉकिंग ने दिल्ली  और मुंबई का दौरा करने के साथ ही तत्कालीन राष्ट्रपति केआर नारायणन से भी मुलाकात की थी। उन्होंने कुतुब मीनार और जंतर-मंतर भी देखा था। इस दौरान वे दिल्ली के संसद मार्ग स्थित जंतर-मंतर को देखने भी पहुंचे थे। तब जंतर मंतर के गाइड प्रेम दास ने उन्हें जंतर मंतर जो कि वेधशाला है उसके बारे में जानकारी दी थी।

हॉकिंग जब भारत आए थे तो उन्होंने कहा था कि भारतीय गणित और फिजिक्स में काफी अच्छे होते हैं। उन्होंने मुंबई स्थित टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च में अंतरराष्ट्रीय फिजिक्स सेमिनार को भी संबोधित किया था। स्ट्रिंग 2001 कॉन्फ्रेंस के दौरान उन्हें प्रथम सरोजिनी दामोदरन फैलोशिप से भी सम्मानित किया गया था। उन्होंने भारत में ओबरॉय टावर्स होटल में अपना 59वां जन्मदिन भी मनाया था।

दुर्लभ बीमारी के साथ 55 साल जीवित रहे...

स्टीफन हॉकिंग ने शारीरिक अक्षमताओं को पीछे छोड़ते हु्ए यह साबित किया था कि अगर इच्छा शक्ति हो तो इंसान कुछ भी कर सकता है।  8 जनवरी, 1942 को इंग्लैंड को ऑक्सफोर्ड में दूसरे विश्व युद्ध के दौरान जन्मे स्टीफन अपने जीवन के  55 साल तक मोटर न्यूरॉन नामक दुर्लभ बीमारी से पीड़ित रहे।  घुड़सवारी और नौका चलाने के शौकीन स्टीलफन  1963 में पहली बार हॉकिंग को मोटर न्यूरॉन बीमारी का पता चला। तब डॉक्टरों ने कहा था कि उनके जीवन के सिर्फ दो साल बचे हैं। आमतौर पर इस बीमारी से ग्रस्त मरीज 3 से 10 साल तक ही जी पाते हैं, लेकिन हॉकिंग ने इस लाइलाज बीमारी के साथ भी 55 साल तक जीवित रहे। स्टीफन हॉकिंग ह्वीलचेयर के जरिए हीचलफिर पाते थे। इस बीमारी के साथ इतने लंबे अरसे तक जीवित रहने वाले वे पहले शख्स थे। वह बोल और सुन नहीं पाते थे और मशीनों की मदद से उन्होंयने इतने साल तक विज्ञान में शोध जारी रखा। 

इस बीमारी में दिमाग का मांसपेसियों पर नियंत्रण खत्म हो जाता है। रीढ़ की हड्‌डी की नसें काम करना बंद कर देती हैं। इसमें शरीर की नसों पर लगातार हमला होता है और शरीर के अंग धीरे-धीरे काम करना बंद कर देते हैं और व्यक्ति चल-फिर पाने की स्थिति में भी नहीं रह जाता है। मोटर न्यूरॉन नर्व सेल होती है जो मांसपेसियों को इलेक्ट्रिकल सिग्नल भेजती है, जिससे हमारे शरीर का संचालन होता है। आमतौर पर यह बीमारी 40 साल के बाद के लोगों को होती है लेकिन कई बार कम उम्र के लोगों को भी हो जाती है।

पुरस्कार और सम्मान
12  मानद डिग्रियां और अमेरिका का सबसे उच्च नागरिक सम्मान प्राप्त हुआ।
1978 - अल्बर्ट आइंस्टीन पुरस्कार
1988 - वॉल्फ प्राइज
1989 - प्रिंस ऑफ ऑस्टुरियस अवाडर्स
2006 - कोप्ले मेडल
2009 - प्रेसिडेंशियल मेडल ऑफ फ्रीडम
2012 - विशिष्ट मूलभूत भौतिकी पुरस्कार।

डेटलाइन स्टीफन हॉकिंग
    1942 में 8 जनवरी को स्टीफन हॉकिंग का ब्रिटेन में जन्म हुआ।
    1959 में हॉकिंग ने ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी में स्नातक की पढ़ाई शुरू की
    1965 में 'प्रॉपर्टीज ऑफ एक्सपैंडिंग यूनिवर्सेज' विषय पर अपनी पीएचडी पूरी की थी।
    1970 में एक शोधपत्र प्रकाशित कराया जिसमें दर्शाया कि ब्रह्मांड ब्लैक होल के केंद्र से ही शुरूहुआ होगा।
    1973 में कॉस्मोलॉजी में पोस्टग्रेजुएट रिसर्च करने के लिए कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय चले गए।
    1988 उनकी पुस्तक 'ए ब्रीफ हिस्ट्री ऑफ टाइम: फ्रॉम द बिग बैंग टू ब्लैक होल्स' प्रकाशित हुई।
    2014 में जब हॉकिंग फेसबुक पर पहली बार आए । उन्होंने लिखा - मैं इस यात्रा को आपके साथ बांटने के लिए उत्सुक हूं।
-    कथन -
मुझे सबसे ज्यादा खुशी इस बात की है कि मैंने ब्रह्माण्ड को समझने में अपनी भूमिका निभाई। इसके रहस्य लोगों के खोले और इस पर किए गए शोध में अपना योगदान दे पाया। मुझे गर्व होता है जब लोगों की भीड़ मेरे काम को जानना चाहती है।
-    स्टीफन हॉकिंग


Sunday, 11 February 2018

भारतीय राजनीति का पकौड़ा काल

जो बच्चे यूपी में बोर्ड की परीक्षा छोड़ रहे हैं वे बड़े समझदार हैं। अब तक 10 लाख से ज्यादा बच्चे परीक्षा छोड़ चुके हैं। वे इस दिव्य ज्ञान से अवगत हो चुके हैं कि ज्यादा पढ़ने लिखने से कोई लाभ होने वाला नहीं है। सालों बरबाद होंगे। माता पिता की मिहनत की कमाई का रुपया फूंकेगा सो अलग। उन्हे हाल में पकौड़ा ज्ञान मिल गया है। वास्तव में पकौड़ा तलने का मजाक उड़ाने की जरूरत नहीं है। पकौड़ा तो अब स्वरोजगार का प्रतीक बनकर उभरा है। इसलिए गौर फरमाइए-
पढ़ोगे लिखोगे बनोगे ख़राब ! पकोड़ा बेचेगो बनोगे नवाब !!
मध्य प्रदेश की राज्यपाल और गुजरात की पूर्व मुख्यमंत्री आनंदीबेन पटेल बोलीं- पकौड़ा बनाना भी कौशल विकास का हुनर, तीन साल में रेस्त्रां के मालिक बन सकते हैं। बिल्कुल सही फरमाया है आनंदी बेन ने। उन्होंने ये भी कहा कि अडानी और अंबानी जैसे कारोबारियों ने भी शुरुआत छोटे कारोबार से की थी। सभी को सरकारी नौकरी नहीं मिल सकती. हमारा अनुभव है कि पकौड़े तलना भी कौशल विकास का एक हुनर है।
भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तरह पकौड़ा रोजगार की बात को दोहराया है एक भाषण में शाह ने कहा कि बेरोजगारी से अच्छा है कि कोई युवा पकौड़ा बेच रहा हैपकौड़ा बेचना शर्म की बात नहीं है इसकी भिखारी के साथ तुलना ना करें। शाह ने कहा कि चाय बेचने वाला आज देश का प्रधानमंत्री है। आज जो पकौड़ा बेच रहा है वो कल का उद्योगपति बन सकता है।
रोजी रोजगार पर चला हथौडा,
तलो समोसा और बेचो पकौड़ा
जिस किसी ने ये नारा बनाया वह बेवकूफ है। वास्तव में पकौड़ा तो रोजगार का प्रतीक बन चुका है। पकौड़ा पर मेरे भी कुछ सुझाव हैं। बेकार का मजाक बंद करें। मुझे लगता है साहित्यकारों को भी अब उत्तर आधुनिक विमर्श, स्त्री विमर्श आदि से आगे बढ़कर साहित्य में पकौड़ा विमर्श की शुरुआत कर देनी चाहिए
सरकार को भी चाहिए कि प्रधानमंत्री पकौड़ा परियोजना लेकर आए। इसमें युवाओं को पकौड़ा की ठेली लगाने के लिए रोजगार उपलब्ध कराया जाए। साथ पुलिस वालों को निर्देश हो कि वे पकौड़े की ठेली से हरगिज रोजाना की अपनी बंधी बंधाई रकम की वसूली बंद करें।
उच्च शिक्षण संस्थाओं में पकौड़ा पर शोध होना चाहिए। आईआईटी में खास तौर पर पकौड़ा पर शोध शुरू हो जाना चाहिए। जैसे कैसे पकौड़े वाला करोड़पति बना और उसने पीएचडी किए लोगों को अपने यहां मुलाजिम रखा।
साथ ही मेरी एक और गुजारिश है कि पकौड़े जैसी नाक कहावत बंद हो। ऐसा कहने वाले पर जुर्माना हो। अब आप अपने बच्चों के नाम पकौड़ी लाल रखें।

अब जरा देखिए कितने किस्म के पकौडे होते हैं। आलू पकौड़ाब्रेड पकौड़ाप्याज पकौड़ामिर्च पकौड़ामूंग दाल पकौड़ा, चना दाल पकौड़ाचिकन पकौड़ा, क्रंची पनीरपकौड़ागोभी पकौड़ा बैगन पकौड़ा आदि आदि। आपको जो पसंद हो स्वाद लिजिए पर पकौड़े के खिलाफ न बोलें। पकौड़ा को गुजराती भजिया कहते हैं। पर नाम बदल जाने से क्या होता है।

अब जरा पकौड़े के इतिहास पर नजर डालिए। पकौड़ा एक ऐसा फ्राइड स्नैक्स है जो भारत का ही है। पर यह भारत के अलावा पड़ोसी देश पाकिस्तानबांग्लादेश और नेपाल में भी बहुत प्रसिद्ध हैबता दें कि पकौड़ा शब्द संस्कृत का शब्द 'पक्ववटसे बना है. पक्व मतलब होता है पका हुआ और वट का मतलब है दालों से बना हुआ गोलाकार केक जिसे घी में तला जाता हो
क्या आपको पता है कि शाहजहां ने मुमताज को पकौड़ा खिलाकर ही पटाया था। वैसे पकौड़ा को महाराष्ट्रकर्नाटक और आंध्रप्रदेश में पकौड़ा न कहकर भाजी कहा जाता है जैसे आलू भाजीप्याज की भाजीमिर्च की भाजी आदिप्याज की भाजी बनाने के लिए प्याज को बारीक काटकर हरी मिर्च के साथ मिक्स कर बेसन के घोल में डूबोकर तला जाता हैस्वादानुसार मसाले भी मिलाए जाते हैंइसी तरह से बेसन या आटे के घोल में डूबोकर तरह-तरह के पकौड़े बनाए जाते हैं

इक्कीसवीं सदी  के महान पत्रकार सुधीर चौधरी ने सरकार द्वारा किए गए रोजगार के अवसर पैदा करने के वादे के मामले पर सवाल किया तब पीएम मोदी ने पकौड़ा तलने का उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि अगर जी टीवी के बाहर कोई व्यक्ति पकौड़ा बेच रहा है तो क्या वह रोजगार होगा या नहीं?
मोदी जी ने जवाब दिया - अगर आपके जीटीवी के आफिस के बाहर कोई पकौड़े बेचताहै और शाम को 200 रुपये कमाकर जाता है तो आप उसे रोजगार मानोगे की नहीं मानोगे... बिल्कुल सही कहा था पीएम साहब ने। शुक्रिया आपने आंखे खोल दीं।
क्या आपको पता है कि भारत में पकौड़े का हर दिन का 100 करोड़ के ऊपर का व्यापार हैमहीने का 3000 करोड़ और साल का 36000 करोड़ अरे येनाम का ही है पकौड़ा। वैसे तो अच्छे - अच्छे को कड़ाही में तल देता है।
( ये व्यंग्य नहीं है, कृपया इसे गंभीरता से ही लें )
-        विद्युत प्रकाश मौर्य

Monday, 15 January 2018

त्रिपुरा –लड़ाई सीपीएम बनाम भाजपा

तीन जनवरी की सुबह। नार्थ त्रिपुरा जिले का कैलाशहर नगर। महिलाएं सड़क पर रैली निकाल रही हैं। जितेगा भाई जितेगा बीजेपी जीतेगा। अभी त्रिपुरा में चुनाव का ऐलान नहीं हुआ है,  पर सड़कों पर प्रचार चरम पर आ चुका है। अगले दिन कैलाशहर बाजार में बीजेपी के साइकिल यात्री नजर आते हैं। वे जन जागरण अभियान निकाल रहे हैं। मैं उन्हें रोककर पूछता हूं। मुद्दा क्या है। वे कहते हैं, नौकरी नहीं है। अस्पतालों में दवाएं नहीं है। डाक्टर नहीं है।

भाजपा के एक कार्यकर्ता कहते हैं, सिलचर जाने वाली पैसेंजर में रोज हजारों मरीज त्रिपुरा से इलाज कराने उधर जा रहे हैं। मैं तीन साल पहले त्रिपुरा आया था। तब मैंने त्रिपुरा को एक ऐसे खुशहाल राज्य के रुप में देखा था जिसे मानिक सरकार संकट से उबार कर विकास के राह पर लेकर आए थे। मानिक सरकार 1998 से त्रिपुरा के मुख्यमंत्री हैं। वैसे राज्य में 1993 में सीपीएम की सरकार है। इस बार भाजपा के लोग कह रहे हैं कि 25 साल के वाम शासन को उखाड़ फेंकेंगे और त्रिपुरा में कमल खिलेगा। हालांकि 20 साल से लगातार मुख्यमंत्री मानिक सरकार पर भ्रष्टाचार का कोई आरोप नहीं है, पर भाजपा के लोग कह रहे हैं कि मानिक दादा के मंत्री भ्रष्ट हैं।

त्रिपुरा के कई शहरों में सड़क के दोनों तरफ हर थोड़ी दूर पर भाजपा के झंडे नजर आ रहे है। कहीं कहीं कांग्रेस, त्रिणमूल और सीपीएम के भी झंडे नजर आ रहे हैं। मैं कैलाशहर में एक व्यक्ति से पूछता हूं क्या इस बार सरकार बदल जाएगी.. वे कहते हैं बिल्कुल बदल जाएगी। तो दूसरे व्यक्ति कहते हैं बदलेगी तो नहीं पर इस बार सीपीएम की सीटें घट जाएंगी। भाजपा राज्य में बड़ी पार्टी बनकर उभरेगी। एक तीसरे व्यक्ति बोल पड़ते हैं। राज्य नगरपालिका, नगर पंचायत सब जगह सीपीएम का बोलबाला है, भाजपा का सत्ता में आ जाना इतना आसान नहीं होगा। पर जिस तरह केसरिया झंडे से त्रिपुरा के छोटे छोटे शहर पटे पड़े हैं उससे लगता है कि इस बार मुकाबला दिलचस्प होगा।

अगले दिन उदयपुर शहर में भाजपा की विशाल बाइक रैली के दर्शन हुए। बताया गया कि 4000 बाइक पर रैली निकाली गई उदयपुर शहर में। इसी तरह की बाइक रैली पूरे त्रिपुरा के हर शहर में निकाली गई। रंगबिरंगी रैली में नारा लग रहा था भारत माता की जय। हालांकि रात को राजधानी अगरतला में सीपीएम के लोग भी सड़क पर रैलियां निकालते दिखे। पूरे शहर में जगह जगह भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष बिप्लव देव, राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पोस्टर लगे हैं। पर कहीं सीपीएम के मुख्यमंत्री मानिक सरकार का पोस्टर नहीं दिखाई दे रहा है। पर मुख्यमंत्री मानिक सरकार दिन रात काम में व्यस्त हैं। इसकी गवाही अगरतला से छपने वाले बांग्ला के अखबार दे रहे हैं। मानिक सरकार मानते हैं कि इस बार मुकाबला भाजपा से है। पर वे अपनी एक बार फिर जीत को लेकर आश्वस्त हैं। अगर वे इस बार भी जीतते हैं तो वे त्रिपुरा पर 25 साल शासन करने वाले मुख्यमंत्री बन जाएंगे। यानी ज्योति बसु और पवन कुमार चामलिंग की बराबरी पर आ जाएंगे।



अगर सीपीएम की सीटों को देखें तो 2003 के बाद पार्टी की सीटें लगातार बढ़ी हैं। साल 2003 के चुनाव में सीपीएम ने 38 सीटें जीती थीं। पर 2008 में पार्टी ने 46 सीटों पर जीत हासिल की। वहीं साल 2013 में पार्टी ने 49 सीटें जीतीं। राज्य में 60 में आरक्षित 20 जनजातीय सीटों पर तो 19 सीटें सीपीएम के ही खाते में है।

अब तक राज्य में भाजपा लड़ती रही है पर उसे एक भी सीट पर जीत नहीं हासिल हुई थी। पर कांग्रेस से तृणमूल में गए छह विधायक दल बदल कर भाजपा का हिस्सा बन चुके हैं। इस तरह फिलहाल त्रिपुरा विधानसभा में भाजपा के पास छह विधायक हैं। राज्य में भाजपा के प्रभारी सुनील देवधर हैं, जो लंबे समय ने पूर्वोत्तर के राज्यों में काम कर रहे हैं। वे राज्य में भाजपा की जीत दिलाने के लिए दिन रात कोशिश में जुटे हैं।

अगरतला के शंकर चौमुहानी से आगे कृष्णानगर की तरफ भाजपा के दफ्तर में सुबह से शाम तक खूब चहल पहल रहती है। दिन भर प्रचार की रणनीति पर काम हो रहा है। राज्य में लगातार राष्ट्रीय नेताओं की आवाजाही जारी है। पार्टी ने राज्य में बिप्लव देव को अपना चेहरा बनाया है। वे उदयपुर के पास के गांव के रहने वाले हैं। 1998 से 2015 तक त्रिपुरा के बाहर संघ काम देखने वाले बिप्लव अब राज्य में नेतृव करने की कामना से उतरे हैं। पर राहें इतनी आसान भी नहीं है। त्रिपुरा में अपनी जगह बनाने के लिए बीजेपी जनजातियों और इंडिजीनिस पीपल्स फ्रंट ऑफ त्रिपुरा (आईपीएफटी) को अपने साथ करने की कोशिश कर रही है। हालांकि इस पार्टी का राज्य में कोई खास जनाधार नहीं है।
सीपीएम के नेता भी जीत के लिए राज्य में रैलियां कर रहे हैं। राज्य में सीताराम येचुरी, वृंदा करात की रैलियां हो रही हैं। राज्य को ओलंपियन जिमनास्ट दीपा कर्माकर मुख्यमंत्री मानिक सरकार के साथ मंच साझा करती दिखाई दे रही हैं। पर जो जन आंकक्षाओं का उभार है उसमें सीपीएम नेतृत्व के लिए जवाब देने में मुश्किलें आ रही हैं।


राज्य में मुद्दे – लोग राज्य में ठेके पर बहाल 10 हजार से अधिक शिक्षकों की नौकरी जाने को मुद्दा बना रहे हैं। स्वास्थ्य व्यवस्था में बेहतरी की बात कर रहे हैं। लोग राज्य और बेहतर सुविधाओं की मांग कर रहे हैं। वेतन बढ़ोत्तरी का मुद्दा उठा रहे है। हालांकि त्रिपुरा, बिजली, पानी सड़क जैसी आधारभूत सुविधाओं में काफी आगे निकल चुका है। मुझे कैलाशाहर के सुदूर गांव में नलों से पानी आता दिखाई दे रहा है। भाजपा के लिए मानिक सरकार के खिलाफ गंभीर और बड़े मुद्दे तलाशना मुश्किल हो रहा है। इसलिए मुकाबला दिलचस्प होने वाला है। इतना जरूर है कि पहले लड़ाई सीपीएम बनाम कांग्रेस हुआ करती थी पर इस बार लड़ाई सीपीएम बनाम भाजपा होने वाली है।


त्रिपुरा में विधान सभा सीटें  60  ( इनमें 20 सीटें जनजातीय लोगों के लिए आरक्षित हैं )
2013 के परिणाम सीपीएम 49 कांग्रेस 10 सीपीआई 01

( कांग्रेस के 06 विधायक बाद में तृणमूल कांग्रेस में फिर भाजपा में चले गए ) 

18 जनवरी 2018 को त्रिपुरा में विधानसभा चुनाव का ऐलान हुआ
18 फरवरी को मतदान 
03 मार्च 2018 को आए परिणाम में त्रिपुरा में भाजपा गठबंधन ने 43 सीटें जीतीं। भाजपा को 35 और सहयोगी दल आईपीएफटी को 8 सीटें आईं। सीपीएम 16 सीटों पर जीत सकी। 

-    विद्युत प्रकाश मौर्य