Friday, 30 December 2005

राजश्री ने बचा रखी है परंपरा

भले ही कई निर्माताओं ने फिल्में बनाने के सिलसिले में खुद को समय के अनुसार बदल लिया हो पर राजश्री ने अपनी परंपराओं को बचा कर रखा हुआ है। वे आज भी कहानी चुनने में पूरी सावधानी बरतते हैं और ऐसी ही फिल्में बनाते हैं जो भारतीय परिवार की सांसकृतिक परंपराओं को बचा कर रखती हो। उनका हाल में प्रदर्शित फिल्म विवाह इसी का ताजा उदाहरण है। उन्होंने उस दौर में भी जबकि छोटा परदा भी नंगापन परोसने में पीछे नहीं है एक साफ सुथरी फिल्म देने की कोशिश की है। राजश्री की फिल्मों की विशेषता रही है कि फिल्म हिट होने पर ऐसा सामाजिक प्रभाव छोड़ती है कि लोग अपनी जड़ों की ओर लौटने की कोशिश करते हैं। जब हम आपके हैं कौन सुपर हिट हुई तो शादी विवाह समारोहों में जूता जुराने की रश्म फिर से जीवित हो गई। इसके साथ ही फिल्म में पारिवारिक रिश्तों के बीच जिस सम्मान का भाव था उसे भी लोगों ने काफी गहराई से आत्मसात किया। यानी हम यों कहें कि राजश्री जब कोई अच्छी फिल्म बनाती है तो उससे समाज में कमजोर होते रिश्ते नाते को एक मजबूती मिलती है, एक नया आयाम मिलता है तो कत्तई गलत नहीं होगा।


राजश्री की हर फिल्म में भारतीयता की खूशबु होती है। हालांकि यश चोपड़ा भी कभी कभी और सिलसिला जैसी फिल्में बनाने के साथ पारिवारिक फिल्मों के लिए ही जाने जाते थे। उनकी फिल्म चांदनी, लम्हे और दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे भी इसी पृष्ठभूमि पर केंद्रित थीं। पर दिल तो पागल है के बाद यश चोपड़ा की फिल्मों का स्वरूप बदलने लगा है। उन्होंने एमटीवी और चैनल वी की पीढ़ी से प्रभावित पीढ़ी के लिए फिल्में बनानी आरंभ कर दी। दिल वाले दुल्हिनया ले जाएंगे में पूरब और पश्चिम का संगम देखने के मिला था। पर अब यश चोपड़ा की फिल्मों में पश्चिमी बयार ही बह रही है। अब यश चोपड़ा का प्रोडक्शन हाउस भी राजश्री की तरह ही बाहरी निर्माताओं से फिल्में बनवाने लगा है। पर वे सब लोग भी उसी तरह की फिल्में बना रहे हैं। 2006 में प्रदर्शित सलाम नमस्ते में तो बिल्कुल नई मान्यताएं देखने को मिली। इसमें हीरो में सभी स्त्रियोचित गुण देखे जा सकते हैं। वह इंजीनयरिंग पढ़कर भी खाना पकाने का काम करता है। पर इसके उलट राजश्री ने जिन बाहरी निर्देशकों से अपने लिए फिल्में बनावाई उन्होंने भी बिल्कुल साफ सुथरी फिल्में बनाई। कमोबेश यश चोपड़ा की राह पर कर जौहर भी चल रहे हैं। उनकी इस साल प्रदर्शित फिल्म कभी अलविदा ना कहना में कहानी का तानाबाना विवाहेत्तर संबंधों के आसपास घूमता है। हम अभी ऐसी कहानी को भारतीय परिवेश में आत्मसात करने को तैयार नहीं हैं।
हम यह नहीं कह सकते हैं कि जैसी कथानक का चयन करन जौहर और यश चोपड़ा जैसे निर्माता कर रहे हैं वैसे पात्र समाज में नहीं हैं। समाज में तो अच्छे बुरे पात्र हमेशा ही मौजूद रहे हैं। पर यह निर्माता पर निर्भऱ करता है कि वह फिल्म बनाते समय कैसे पात्रों का चयन करे। यह ध्रुव सत्य बात है कि फिल्मों का समाज पर व्यापक प्रभाव पड़ता है। लोग अपने हीरो की नकल करते हैं ऐसे में प्रोड्यूसर का दायित्व बनता है कि वह कहानी के चयन में गंभीरता बरते। इस मामले मे यश चोपड़ा और करण जौहर जैसे लोग चुक गए लगते हैं। वहीं सूरज बड़जात्या ने अपनी पारिवारिक परंपरा को न सिर्फ बचाए रखा है बल्कि उसे बड़ी ही सुंदरता से आगे बढ़ा रहे हैं।
विद्युत प्रकाश vidyutp@gmail.com

Tuesday, 27 December 2005

विंडो का ओरिजिनल साफ्टवेयर अभियान

भारत में कंप्यूटरों में जो साफ्टवेयर इस्तेमाल हो रहा है वह बड़ी संख्या में अभी भी पाइरेटेड है। अब माइक्रोसाफ्ट की कंपनी इस अभियान में जुट गई है कि लोग असली साफ्टवेयर का ही इस्तेमाल करें। हालांकि पिछले कुछ सालों से जब आप कंप्यूटर खरीदते थे तो उसमें जो साफ्टवेयर लोड करके दिए जा रहे थे वे आमतौर पर पायरेटेड यानी दूसरे शब्दों में कहें तो गैर लाइसेंसी या चोरी के ही होते थे। जैसे विंडो का कोई भी संस्करण हो या किसी तरह के इस्तेमाल किए जाने वाले साफ्टवेयर। मसलन पेजमेकर, फोटोशाप, क्वार्क एक्सप्रेस, एमएस वर्ड, एक्सेल जैसे सभी साफ्टवेयर आमतौर पर पाइरेसी से ही इस्तेमाल में आ रहे हैं। खास तौर पर जो कंप्यूटर किसी मैकेनिक से एसेंबल करके खरीदे जाते हैं उनमें पाइरेटेड साफ्टवेयर ही लोड किए जाते हैं।

जब हम कोई भी साफ्टवेयर असली खरीदना चाहते हैं तो कंप्यूटर की कीमत के साथ ही हमें साफ्टवेयरों की भी अच्छी खासी कीमत चुकानी पड़ती है। ऐसे में ग्राहक भी सोचता है कि चलो पाइरेटेड साफ्टवेयर से ही काम चला लेते हैं। अभी तक साफ्टयवेयर बनाने वाली कंपनियां भी इस मामले मे ढील देने की नीति बरत रही थीं। उनका लक्ष्य था कि लोग भले ही पाइरेसी का साफ्टवेयर इस्तेमाल करें पर धीरे धीरे लोग इसके बड़ी संख्या में उपयोक्ता बन जाएं। अब देश में कंप्यूटर उपयोक्ताओं की संख्या करोड़ों में पहुंच गई है तो कंपनियों का ध्यान अब लोगों को ओरिजिनल साफ्टवेयर इस्तेमाल करने के लिए प्रेरित करने की ओर है। इसके लिए कंपनियां अखबारों में बड़े ब़ड़े विज्ञापन भी दे रही हैं।

आखिर असली ही क्यों - जब आप अपने कंप्यूटर के साथ इंटरनेट का इस्तेमाल करते हैं तो आपका कंप्यूटर विश्व व्यापी नेटवर्क से जुड़ जाता है। ऐसी हालात में आपके कंप्यूटर में मौजूद विभिन्न साफ्टवेयर अपनी वेबसाइटों से जुड़कर खुद को अपडेट करना चाहते हैं। ऐसे अपडेट की स्थिति में कंपनी को पता चल जाता है कि कहां उसका असली साफ्टवेयर इस्तेमाल हो रहा है और कहां पायरेटेड। असली साफ्टवेयर का इस्तेमाल करने से आपको कोई भी साफ्टवेयर फुल वर्जन में प्राप्त होता है वहीं आप उसको समय समय पर कंपनी की वेबसाइट पर जाकर अपडेट कर सकते हैं। जबकि पाइरेसी वाले साफ्टवेयर को अपडेट करने में मुश्किल आती है। अब जहां विंडो ने अपने एक्सपी और उसके आगे के संस्करणों के असली वर्जन के इस्तेमाल करने की मुहिम चला रखी है वहीं टैली और दूसरी कई कंपनियां भी ऐसा ही कर रही हैं।

फिलहाल इन साफ्वेयर कंपनियों की नजर ऐसे लोगों पर है जो व्यवसायिक यूजर हैं। जैसे बड़े दफ्तरों और बैंकों और दुकानों में कंपनियां चाहती हैं कि असली साफ्टवेयर ही इस्तेमाल हो। आने वाले समय में घरों में निजी उपयोग वाले कंप्यूटरों में भी पाइरेसी के साफ्टवेयर का इस्तेमाल करना मुश्किल हो जाएगा। अगर आप कोई नया ब्रांडेड पीसी खरीदते हैं तो आपको उसके साथ विंडो का ओरिजिनल संस्करण मिलता है साथ ही कुछ साफ्टवेयर भी मिलते हैं। अगर आप साफ्टवेयर पर पैसा लगाने को इच्छुक नहीं हैं तो आपके पास लाइनेक्स और ओपन आफिस जैसे विकल्प मौजूद हैं जो दुनिया भर में फ्री साफ्टवेयर उपलब्ध कराते हैं। इनका इस्तेमाल भी आप अपने पीसी में कर सकते हैं।
-- vidyutp@gmail.com 




Friday, 23 December 2005

नैनो टेक्नोलाजी यानी जिंदगी हुई आसान

कल्पना कीजिए की कड़कड़ाती ठंड पड़ रही हो और एक आदमी पतला सा शर्ट पहने मस्ती मे घूम रहा हो। ऐसा आने वाले दिनों में संभव है। यह सब कुछ नैनो टेक्नोलाजी के बदौलात संभव है। इसकी बदौलत सिर्फ इलेक्ट्रानिक उपकरण ही नहीं बल्कि कई चीजों को छोटा करके जीवन को आसान बनाया जा सकता है। आजकल वैज्ञानिक हर क्षेत्र में चीजों को छोटा करने की कोशिश में लगे हुए हैं। 

अब हम टीवी के पिक्चर ट्यूब का ही उदाहरण लें। परंपरागत टीवी स्क्रीन पिक्चर ट्यूब के पीछे निकलती उसकी नली के कारण वजनी और बड़े होते हैं। अभी हाल में कुछ टीवी कंपनियों ने उसमें कुछ सुधार कर 30 फीसदी चौड़ाई कम कर दी है। पर टीएफटी स्क्रीन वाले एलसीडी और प्लाज्मा स्क्रीन ने तो टीवी की दुनिया ही बदल कर रख दी है। अब ऐसा टीवी सिर्फ तीन ईंच मोटा ही होता है। आप ऐसे टीवी को सुटकेस में पैक करके कहीं भी ले जा सकते हैं। वहीं अपने घर में आप ऐसे टीवी को कहीं भी दीवार पर स्थापित कर सकते हैं। यानी दीवार में कैलेंडर की तरह टीवी टंगा हुआ दिखाई देगा। ऐसा नैनो टैक्नोलाजी की बदौलत ही संभव हो सका है। ठीक इसी तरह कंप्यूटर का भी सबसे भारी भरकम भाग मानीटर में एलसीडी स्क्रीन के आ जाने के बाद कंप्यूटर का वजन कम हो गया है। अभी एलसीडी स्क्रीन थोड़े महंगे जरूर हैं पर उनकी कीमतें लगातार गिरती जा रही हैं।

अब इस नैनो टेक का कमाल जीवन के हर क्षेत्र में दिखाई देने वाला है। आप कल्पना कर सकते हैं कि कड़कड़ाती ठंग में कोई व्यक्ति सिर्फ एक शर्ट पहने घूम रहा हो। वास्तव में उस शर्ट के उपर थीन फिल्म की ऐसी कोटिंग कर दी जाएगी जो हवा की आवाजाही तो रोकेगा ही साथ ही शरीर को उष्णता भी प्रदान करेगा। फिर शरीर पर भारी भरकरम स्वेटर डालने की कोई जरूरत नहीं रह जाएगी। यानी सरदी में कपड़ों का बोझ कम हो सकेगा। ऐसे शर्टों की दूसरी विशेषताएं भी होंगी। इन पर दाग धब्बे और खरोंचे भी नहीं लग सकेंगी। साथ ही क्रिज की भी कोई समस्या नहीं होगी। आपकी कलाई घड़ी या मोबाइल फोन पर थिन फिल्म की कोटिंग की जा सकती है जो उपकरणों के जीवन को बढ़ाएगा साथ ही उन्हें खरोंच लगने से भी बचाएगा।
नैनो टेक का इस्तेमाल सेना के लिए काफी लाभकारी सिद्ध हो सकता है। सीमा पर पहाड़ी और बरफीली वादियों में सैनिकों को भारी भरकम कीट और कपड़े आदि लेकर रहना पड़ता है। कश्मीर की वादियों रहने वाले फौजियों का कीट 35 किलो का होता है। सेना में इस बात पर भी लगातार शोध चल रहे हैं कि फौजियों के सामानों का वजन कैसे कम किया जाए। अमेरिका के नेशनल साइंस फाउंडेशन को इस बात का भरोसा का है कि 2015 तक बाजार में नैनो टेक्लनोलाजी प्रोडक्ट की बाढ़ आ चुकी होगी। लोग हर तरह की वस्तुओं में छोटी चीजें ढूंढते नजर आएंगे। एक रिपोर्ट के अनुसार ड्रग डिलेवरी सिस्टम में भी इस तकनीक का योगदान होगा। ट्यूमर थेरेपी और कैंसर की दवाओं के निर्माण में भी नैनो टेक्नोलाजी अपना महत्वपूर्ण योगदान करेगी। इससे जहां कम दवाएं लेने से काम चल सकेगा वहीं कई तरह की बीमारियों के इलाज खर्च में भी कमी आने उम्मीद है। यानी नैनो टेक न सिर्फ आपके जीवन को आसान और सुगम बनाएगा बल्कि कई तरह के खर्चों को कम भी कर सकता है।
-माधवी रंजना madhavi.ranjana@gmail.com



Saturday, 17 December 2005

जल्द आम लोगों के पहुंच में होगा इंटरनेट

वह दिन अब दूर नहीं जबकि इंटरनेट आम लोगों के बीच लोकप्रिय होता हुआ दिखाई देगा। कुछ साल पहले जब भारत में इंटरनेट आया तब तेजी से वेबसाइटों का पंजीकरण होने लगामीडिया सहित अलग अलग क्षेत्रों में कारोबार होने लगा। पर जल्द ही यह इंटनेट बूम टांय टायं फिस्स हो गया। इसका प्रमुख कारण यह था कि इंटरनेट तब देश में ज्यादा लोगों की पहुंच में नहीं था इसलिए इस माध्यम से संदेश भेजने वाले लोगों को ज्यादा सफलता नहीं मिली। पर अब स्थितियां तेजी से बदल रही हैं। अब देश में कंप्यूटरों की संख्या तेजी से बढ़ रही है वहीं इंटरनेट के वेबसाइटों की लोकप्रियता में भी इजाफा हो रहा है। अब गली गली में इंटरनेट ढाबा और साइबर कैफे खुल गए हैं। कई चीजों के लिए तो इंटरनेट की वेबसाइटें सबसे लोकप्रिय माध्यम साबित हो रही हैं। अब किसी भी परीक्षा का रिजल्ट जारी करना हो तो इंटरनेट सबसे मुफीद साधन है। क्योंकि किसी भी माध्यम से लाखों लोगों के रिजल्ट छाप कर भेजना संभव नहीं है। 

अखबार में छपवाना महंगा सौदा है वहीं गजट छाप कर हर जिले में भेजने में भी लंबा समय और खर्च लग जाता है। वहीं कुछ रुपए खर्च करके अब लोग कहीं भी रिजल्ट देख लेते हैं। इसी तरह किसी भी काम के लिए ठेके (टेंडरभी अब आनलाइन निकाले जा रहे हैं। इससे ठेकेदार या संबंधित लोग नियम व शर्ते कहीं भी पढ़ लेते हैं। 

शेयर कारोबार, म्युचुअल फंड और बैंकिंग, क्रेडिट कार्ड आदि के लिए भी अब इंटरनेट वरदान बन गया है। आप जहां आनलाइन शेयर ट्रे़डिंग कर सकते हैं वहीं म्युचुअल फंडों के नव (नेट एसेट वैल्यू) रोज देख सकते हैं। आप जिन सेवाओं के भी उपभोक्ता हैं उसकी वेबसाइट पर लागिन करके अपने खाते के स्टेटस को आनलाइन देख सकते हैं। अब यह सब कुछ बड़े ही कम खर्च पर उपलब्ध है।


खासकर ब्राड बैंड के सस्ता और लोकप्रिय हो जाने से देश में इंटरनेट के उपभोक्ताओं को संख्या बड़ी तेजी से बढ़ रही है। अब स्कूली विद्यार्थी इंटरनेट का इस्तेमाल करके अपने ज्ञान को बढ़ा रहे हैं। किसी भी प्रोडक्ट के बारे में सूचना प्राप्त करने के लिए इंटरनेट एक गेटवे का काम कर रहा है। कुछ साल पहले हम जिन बातों को कल्पना में कहा करते थे वे अब हकीकत बनते जा रहे हैं।
आज आप भारतीय रेल की वेबसाइट को ही देखें रोज लाखों को लोग उसे हिट करके ट्रेनों की आवाजाही के बारे में पता करते हैं साथ ही आनलाइन टिकट भी बुक करवाते हैं। वहीं किसी भी एयरलाइन के फ्लाइट शिड्यूल और सीटों की उपलब्धता और टिकट बुकिंग आदि सब कुछ इंटरनेट के माध्यम से करवाया जा सकता है। जिस सूचना को पाने के लिए अथवा जिस सुविधा का प्राप्त करने के लिए आपको पहले 100 से 200 रुपए खर्च करने पड़ रहे थे वही अब आपको 10 से 20 रुपए के खर्च करने पर ही उपलब्ध हो पा रहा है। इस प्रकार अब सही मायने में लोगों को इंटरनेट का लाभ मिलना आरंभ हो गया। 

इंटरनेट से आनलाइन कारोबार को भी बढ़ावा मिलने लगा है। अगर आन लाइन कारोबार नहीं भी होता है तो भी लोग किसी भी प्रोडक्ट अथवा सेवा के बारे में इंटरनेट से जानकारी प्राप्त करते हैं। इस प्रकार यह किसी प्रोडक्ट के विज्ञापन का अच्छा काम कर रहा है। मान लिजिए आपको किसी बैंक में खाता खोलना है तो आप विभिन्न बैंकों की वेबसाइटों पर जाकर उनके द्वारा दी जारही सुविधाओं का तुलनात्मक अध्ययन कर सकते हैं। इसके बाद आपको जहां अच्छा लगे वहां खाता खोलें। ऐसा ही किसी अन्य उत्पाद के बारे में भी लागू होता है।
- विद्युत प्रकाश मौर्य