Tuesday, 30 May 2006

तेल नहीं तेल की धार देखो...

कहते हैं तेल देखा है अब तेल की धार भी देखो। फिलहाल सरकार तेल की धार दिखा रही है। इसमें जनता बेचारी उलझी हुई है वह किसको असली दोषी माने। किसी भी देश की अर्थव्यवस्था को तेल बड़ी गहराई से प्रभावित करता है। तेल के भाव बढ़ने के साथ कमोबेश हर चीज पर प्रभाव पड़ता है। चूंकि सारी परिवहन व्यवस्था चाहे वह बस ट्रक हो या रेल तेल पर आधारित है इसलिए तेल के दाम बढ़ने के साथ ही माल भाड़ा और यात्री भाड़ा बढ़ने की पूरी संभावना रहती है। माल भाड़ा बढ़ने के साथ ही बाजार में बिकने वाले सभी उत्पाद भी महंगे होने लगते हैं। किसी वस्तु की कीमत में 10 से 15 फीसदी तक प्रभाव ट्रांसपोर्ट डालते हैं।

अगर डीजल के दाम बढ़ेंगे तो खेतों में ट्रैक्टर चलाना और पंपिंग सेट से सिंचाई भी मंहगी हो जाती है। जाहिर है इसका असर किसानों पर पड़ता है और खेती में उत्पादन लागात बढ़ जाती है। इसलिए तेल का दाम बढ़ते ही राजनैतिक पार्टियां और जनता के हर वर्ग में खलबली मच जाती है।
सरकार इस बात की दुहाई देकर तेल के दाम बढ़ाती कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल के दाम बड़ रहे हैं इसलिए यहां भी दाम बढ़ाने के सिवा कोई विकल्प नहीं है। सभी सरकारी और निजी क्षेत्र की तेल कंपनियां सरकार पर लगातार दबाव बनाती हैं पेट्रोल डीजल के दाम बढ़ाए जाएं क्योंकि उन्हें घाटा उठाना पड़ रहा है। सरकार एलपीजी और किरासन तेल पर सब्सिडी देती है इसलिए वे हमें सस्ते में मिल रहे हैं। पर पेट्रोल और डीजल पर टैक्स लगाना सरकार की आमदनी का प्रमुख साधन है इसलिए देश में पेट्रोल और डीजल पर सर्वाधिक टैक्स है। अगर पेट्रोल 50 रुपए लीटर के करीब है तो उसकी वास्तविक कीमत 20 से 22 रुपए लीटर तक ही है बाकि सब उस पर विभिन्न चरणों में लगने वाला टैक्स है। सरकार हवाई जहाज के लिए दिए जाने वाले तेल जिए एटीएफ (एयर टरबाइन फ्यूल) कहते हैं कि कीमत को हमेशा पेट्रोल से काफी कम रखा जाता है। कारण इस पर टैक्स कम लगाया गया है। वहीं दुनिया के कई देशों में डीजल व पेट्रोल दोनों की कीमतें लगभग बराबर है।
इस बार जब तेल की बढ़ी कीमतों को लेकर विरोध हुआ तो केंद्र सरकार ने सुझाव दिया कि राज्य सरकारें अपने हिस्से से बिक्री कर में कमी करें। कई राज्यों ने बिक्री कर में थोड़ी कमी की भी जिससे लोगों ने कीमतों को लेकर थोड़ी राहत महसूस की।
तेल कंपनियों को मिलेगी आजादी - पर अब सरकार तेल के दाम को लेकर इंडियन आयल सहित सभी सरकारी व निजी कंपनियों को यह छूट देने पर विचार कर रही है कि वे अपनी इच्छा से तेल की कीमतें कम अधिक कर सकें। एक नियामक के तहत उन्हें आजादी दे दी जाएगी कि जैसे इंटरनेशनल मार्केट में रेट 70 डालर प्रति बैरल या उससे अधिक हो जाए उसके अनुसार ही वे कीमत को बढ़ा सकेंगे साथ ही रेट कम होने पर भारत में भी रेट कम कर सकेंगे। इससे विभिन्न तेल कंपनियों के रेट अलग अलग भी हो सकते हैं। निजी कंपनियों के रेट पर तो सरकार का अब भी नियंत्रण नहीं है सरकारी कंपनियों को भी कीमते बढ़ाने घटाने की छूट मिल जाएगी। जाहिर है इसका असर बाजार पर पड़ेगा। फिर कीमतें बढ़ने या घटने के लिए लोग सरकार को कोसते हुए नजर नहीं आएंगे। तब तेल कंपनियां ही बाजार के हालात को देखते हुए तेल की धार तय करेंगी।
- विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com



Thursday, 25 May 2006

सार्थक विपक्ष की जरूरत

यह सही है कि प्रजातंत्र में सार्थक विपक्ष होना चाहिए। पर विपक्ष बहुत कमजोर हो तो प्रजातंत्र में भी शासक निरंकुश होकर फैसले करने लगता है। जैसे 1984 के चुनावों में कांग्रेस ज्यादा सीटें जीत कर आई थीं और प्रधानमंत्री राजीव गांधी के सामने विपक्ष बड़ा कमजोर था। ऐसी स्थिति में सरकार के किसी निरंकुश कदम का विरोध नहीं हो पाता। जबसे केंद्र में मिली जुली सरकारों का दौरा शुरू हुआ है स्थितियां बदली हैं। अब सरकार को अपने कई फैसले विपक्ष के या अपनी ही सरकार के घटक दलों के विरोध के कारण बदलने पड़ते हैं। जैसे अभी केंद्र सरकार को आयकर रिटर्न का सरल फार्म की जगह चार पन्ने का फार्म लाने का निर्णय वापस लेना पड़ा है।


पर हम उससे भी आगे बढ़कर देखें तो अब कई बार एक ही पार्टी में रहकर भी नेता एक दूसरे का विरोध करते नजर आते हैं। हरियाणा में पिछले विधान सभा चुनाव के परिणाम आने पर यहां सत्तासीन पार्टी इनेलो का पूरी तरह सफाया हो गया। कांग्रेस पूर्ण बहुमत में आ गई। इनेलो के इतने कम उम्मीदवार जीते की कि विपक्ष के रुप में उनकी संख्या विधान सभा में नगण्य ही नजर आने वाली थी। इस दौरान किसी टीवी चैनल पर एक चुनाव विश्लेषक ने कहा कि आने वाली सरकार चैन की वंशी बजाएगी क्योंकि विरोध करने के लिए यहां मजबूत विपक्ष नहीं है। इस पर सामने वाले ने जवाब दिया था कि नहीं हरियाणा कांग्रेस में इतने गुट हैं कि चाहे कोई भी मुख्यमंत्री बने बाकी गुट पांच साल तक विपक्ष की भूमिका निभाएंगे। उसके बाद का परिदृश्य वाकई ऐसा ही है। जबसे हरियाणा में भूपेंद्र सिंह हुड्डा मुख्यमंत्री बने उन्हें भजनलाल गुट के विरोध का सामना करना पड़ रहा है। हालांकि भजनलाल के एक बेटे चंद्रमोहन इस सरकार में उपमुख्यमंत्री हैं। पर उनके दूसरे सांसद बेटे कुलदीप बिश्नोई ने आजकल अपनी ही सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल रखा है। खासकर रिलायंस को स्पेशल इकोनोमिक जोन के लिए सस्ते में जमीन दिए जाने के मामले पर उन्होंने सरकार के से जवाब मांगा है साथ ही आंदोलन की भी धमकी दे डाली है। भजनलाल का कुनबा जहां मुखर रुप से विरोध करता है वहीं सरकार कई अन्य गुटों का विरोध भी झेलना पड़ता है। मुख्यमंत्री के दो दावेदार तो सरकार में साथ आ गए हैं इसलिए वे विरोध नहीं कर पाते। पर वह टिप्पणी बहुत ही सटीक होकर उभरी है कि अपनी पार्टी में विधायक विपक्ष की भूमिका निभाते नजर आएंगे। इसके अलावा भी कुछ विधायकों ने अपने हल्के में विकास नहीं होने पर सरकार के खिलाफ प्रेस कान्फ्रेंस करके आग उगली है।

निरंकुश न हो मुख्यमंत्री-  वास्तव में इसे लोकतंत्र में सकरात्मक रुप में देखा जाना चाहिए। यह लोकतंत्र अंदर चल रहे अधिनायकवाद के खात्मे का प्रतीक है। यह इस बात को संकेत करता है कि प्रजातंत्र में कोई मुख्यमंत्री निरंकुश होकर शासन नहीं कर सकता है। उसे अपनी सरकार के विभिन्न गुटों को साथ लेकर चलना ही पड़ेगा। उनकी बातें सुननी पड़ेगी। उनकी समस्याओं का निदान करना पड़ेगा। सरकार की योजनाओं और कारगुजारी पर सबको विश्वास में लेकर चलना पड़ेगा। लोकतांत्रिक व्यवस्था में यह अच्छी बात है। हालांकि इसके कुछ दुष्परिणाम भी हैं। कई मामले में निर्णय लेने में देरी होती है। पर अच्छी बात है कि सरकारी काम में पारदर्शिता बनी रहती है। सरकार में अलग अलग गुट मीडिया कोई भी कुछ जानकारियां देते रहते हैं जिससे जनता भी आगाह रहती है।

- विद्युत प्रकाश मौर्य  (  मई 2006) 



Sunday, 21 May 2006

हाई प्रोफाइल नशा - कोकीन

कोकीन एक हाई प्रोफाइल नशा है। इसकी एक डोज ही 4000 रुपए में आती है। जाहिर है कि कोई निम्न या मध्यम वर्ग का आदमी इस नशे को नहीं ले सकता। पहले फिल्म स्टार फिरोज खान के बेटे फरदीन खान के बाद प्रमोज महाजन के बेटे राहुल महाजन इसकी गिरफ्त में हैं। वहीं हेरोइन भी इसी तरह का महंगा नशा है। जाहिर की मध्यम वर्ग के लोग इस तरह का नशा नहीं कर सकते। यह उच्च आय वर्ग के लोगों के ही वश की बात है। गरीब लोगों का तो नशा स्मैक है। अक्सर दिल्ली के फुटपाथ पर रिक्से वाले और खोमचे वाले तथा इसी प्रोफाइल के दूसरे लोग स्मैक लेते हुए दिखाई दे जाते हैं। स्मैक उन्हें गरीबी से थोड़ी देर सपनीली दुनिया में ले जाता है शायद...

पर हम बात कर रहे हैं इन हाई प्रोफाइल नशेड़ियों की। ये लोग फाइव स्टार होटलों में बड़ी बड़ी पार्टियां करते हैं। बड़े घरों के इन बिगड़ैल युवाओं का मासिक खर्च लाखों में होता है। ये लोग पार्टियों के बाद हाई प्रोफाइल स्मग्लरों से अपने लिए नशे का इंतजाम करवाते हैं। प्रमोद महाजन के बेटे राहुल महाजन को नशे की डोज सप्लाई करने वाला कश्मीरी युवक साहिल भी बड़े घर का बेटा है। उसके पिता का मुंबई में पांच सितारा होटल व कश्मीर इम्पोरियम है। अब इस तरह के लोगों से क्या उम्मीद की जा सकती है। मुंबई के सबसे बड़े कोकीन के तस्कर का दावा है कि मशहूर अभिनेत्री मनीषा कोईराला भी उनकी ग्राहक है। वह उनसे कोकीन की डोज लेकर जाती है। फरदीन खान इस मामले में पहले ही फंस चुके हैं। ये तो काली स्याह रात के कुछ ऐसे नाम हैं जो पकड़े जाने पर लोगों के सामने आ गए हैं। अभी इसके अलावा बहुत से ऐसे नाम हो सकते हैं जिनपर से पर्दा नहीं हट पाया है। ऐसे हाई प्रोफाइल नशेड़ी अपने रसूख के बल पर मुकदमों से छूट भी जाते हैं। अगर मीडिया उनकी खबर नहीं ले तो मामला कई बार ले देकर रफादफा हो जाता है। वैसे भी उच्च वर्ग में यह कारोबार बड़ी सफाई से चलता है। क्योंकि बेचने वाले खरीदने वाले और दलाल सभी हाई प्रोफाइल के हैं । कोई इनके मूवमेंट पर जल्दी शक नहीं करता। अगर राहुल महाजन का मामला कुछ महीने बाद प्रकाश में आया होता तो शायद भारतीय जनता पार्टी पर बड़ा कलंक लगता क्योंकि भाजपा उन्हें जल्द ही अपने पिता प्रमोद महाजन की विरासत का वारिस घोषित करने वाली थी। वे पार्टी कार्यकारिणी की बैठक में शामिल भी हुए थे। अब पार्टी के सभी बड़े नेताओं ने उनसे कन्नी काट ली है। हालांकि इस मामले मे अटल बिहारी वाजपेयी के बयान की जवानी में गलती हो जाती है पर उमा भारती की आपत्ति जायज है। क्या एक 31 साल के आदमी के गंभीर अपराध को जवानी गलती समझ कर खारिज किया जा सकता है। नहीं.. उन्हें तो ऐसी सजा मिलनी चाहिए जो दूसरों के लिए नजीर बने। उस देश में 40 फीसदी लोगों को आदमी जैसा भोजन नहीं मिलता वहां एक करोड़ रुपए किलो बिकने वाला नशा करने की इजाजत कैसे दी जा सकती है। वैसे लोग अगर किसी तरह जन प्रतिनिधि बन जाएं तो यह और भी खतरनाक है। यह बहुत अच्छा हुआ कि कोई ऐसा आदमी संसद की सीढ़ियों पर कदम रखने से पहले ही नंगा हो गया। पर राहुल महाजन, साहिल या फरदीन खान तो स्याह रात रंगीन बनाने वाले अमीर घरों के बिगड़ेल शोहदों में चंद नाम ही हैं जो लोगों को पचा चल सके हैं। अभी यह फेहरिस्त बहुत लंबी हो सकती है उन्हें बेनकाब किए जाने की जरूरत है खुद को संभ्रांत घोषित करने में लगे हैं और हर समस्या का इलाज खानदानी पैसे से ढूंढ लेना चाहते हैं। हालांकि इस पैसे को कमाने में उन्होंने खुद मेहनत नहीं की होती है।

-माधवी रंजना madhavi.ranjana@gmail.com



Saturday, 20 May 2006

कंप्यूटर की जगह ले लेंगे बड़े लैपटाप

कुछ सालों में कंप्यूटर बीते जमाने की चीच हो जाएगी। जब कंप्यूटर की कीमत पर लैपटाप उपलब्ध होगा तो भला क्यों कोई कंप्यूटर खरीदेगा। इतना ही नहीं लैपटाप में भी अब 15 इंच या 17 इंच के मोनीटर का नहीं बल्कि 19 या 20 इंच के विशाल एलसीडी मानीटर वाले लैपटाप का जमाना आ रहा है। सभी लैपटाप बनाने वाली कंपनियां इस तरह के लैपटाप को विकसित करने में लगी हैं।

आमतौर पर जब आप कंप्यूटर खरीदते हैं तो उसके कई अलग अलग हिस्से होते हैं। उसका सबसे भारी हिस्सा उसका मानीटर होता है। उसके बाद सीपीयू, की बोर्ड, माउस और स्पीकर यानी पांच हिस्से। अब लैपटाप में ये पांचों हिस्से एक ही जगह इंटीग्रेट हो जाते हैं। यानी जगह की बचत। कंप्यूटर को जब आप घर में या दफ्टर में किसी एक जगह स्थापित कर देते हैं तो उसे आसानी से एक जगह से दूसरी जगह नहीं ले जाया जा सकता है। अब हम उन कारणों पर नजर डालते हैं जिनके कारण लैपटाप लोकप्रिय हो रहे हैं।
पोर्टेबलिटी- लैपटाप को आसानी से कहीं भी उठा कर ले जाया जा सकता है। एक कमरे से दूसरे कमरे में। लान में. दफ्तर में कहीं भी। आप अपनी कार में भी इस पर काम कर सकते हैं। हवाई और रेल यात्रा के दौरान भी इसे लेकर चल सकते हैं।
जगह की बचत- कंप्यूटर जहां आपके टेबल पर काफी जगह ले लेता है वहीं लैपटाप को बस थोड़ी सी जगह चाहिए। इसे कहीं भी रखा जा सकता है। इसके लिए अलग से कोई कंप्यूटर टेबल बनाने की कोई जरूरत नहीं है।
बैटरी बैकअप- कंप्यूटर के साथ कोई बैटरी बैकअप नहीं होता, जबकि लैपटाप को आप उसके बैटरी बैकअप से आराम से चार से छह घंटे चला सकते हैं। और अधिक देर तक चलाने के लिए आप चाहें तो बैटरी का दूसरा सेट भी लेकर रख सकते हैं।
आमतौर पर बाजार में अभी जो लैपटाप उपलब्ध हैं उनके स्क्रीन 15 इंच या 17 इंच के हैं। पर अब लैपटाप कंपनियां 19 इंच और 20 इंच के स्क्रीन वाले लैपटाप का निर्माण करने मे लगी हुई हैं। ये सुपरसाइज के लैपटाप नोटबुक के बजाए ब्रीफकेश ती तरह दिखाई देंगे। इसलिए इन्हें नोटबुक पीसी कहना जायज नहीं होगा। अब बाजार में 19 20 इंच के एलसीडी स्क्रीन प्रवेश कर रहे हैं उसके बाद उसी साइज के लैपटाप बनाने की भी कंपनियां प्रवृत हुई हैं। हालांकि उस युग में जहां मोबलिटी की बात की जाती है वहां छोटा बेहतर है का सिद्धांत चलता है ऐसे में अभी यह तय होना बाकी है कि लोग इन लैपटाप का कितना स्वागत करेंगे। उम्मीद की जाती है कि ऐसे लैपटाप उन लोगों में ज्यादा लोकप्रिय होंगे जो कंप्यूटर पर गेम खेलते हैं तथा जिन्हें सीमित मोबलिटी की जरूरत होती है। जैसे दफ्तर में ही अपने सिस्टम को कहीं ले जाना हो या घर में ही एक कोने से दूसरे कोने में ले जाना हो तो ऐसे में इस तरह के सुपर साइज लैपटाप लोकप्रिय हो सकते हैं। लैपटाप बनाने वाली कंपनी डेल और एसर 19 इंच के लैपटाप का निर्माण करने में जुटी हुई हैं। वहीं कोरियाई कंपनी सैमसंग ने भी मेगा लैपटाप बनाने की घोषणा कर दी है। एसर ने को ताइपेई में हाल में लगे कंप्यूटर शो में 20 इंच स्क्रीन वाला लैपटाप पेश कर दिया है। एसर के इस सिस्टम पर गेम और फिल्मों का बखूबी आनंद उठाया जा सकता है। इसकी खुदरा कीमत 2700 डालर (तकरीबन 1.30 लाख रुपए) रखी गई है। जबकि डेल 3500 डालर में व सैमसंग 5000 डालर में ऐसे ही माडल पेश कर रही है। देखते जाइए कीमतें तो गिर सकती हैं।
-    विद्युत प्रकाश मौर्य


Friday, 19 May 2006

फ्लाई ओवर का शहर दिल्ली

कुछ दिन में दिल्ली को फ्लाई ओवरों के शहर के रुप में याद किया जाएगा। अगर आपने दससाल पहले दिल्ली की यात्रा की हो, और अब जाएं तो दिल्ली आपको काफी बदली हुई नजर आएगी। दो दशक पहले की दिल्ली का मतलब यह होता था कि लाल बत्ती और हरी बत्ती का शहर। अगर लाल बत्ती हो तो जिंदगी ठहरी हुई है। अगर हरी बत्ती हो तो जिंदगी चल पड़ी। कितनी कहानियां और व्यंग्य रचनाएं इस लाल बत्ती और हरी बत्ती पर लिखी गई हैं। रफ्तार चाहने वाले लोगों के लिए लाल बत्ती बहुत बड़ा संकट थी। अगर आप दिल्ली में किसी से मिलने जाते हों तो न जाने कितने चौराहों पर आपको यह इंतजार करना पड़ता था कि कब हरी बत्ती होगी और आप चल पाएंगे।
दिन लदे गोल चक्कर के - इस लाल बत्ती खत्म करने के लिए बड़े चौराहों पर राउंड एबाउट की परिकल्पना को स्वरुप प्रदान किया गया। इसमें गर चौक पर एक गोल चक्कर होता है। इस गोल चक्कर में घूमते हुए आप अपने लेन का चयन कर लेते हैं। इसमें लाल बत्ती तो नहीं मिलती। पर इस राउंड एबाउट का लोगों को सही तरीक से इस्तेमाल करना नहीं आया। इसका परिणाम हुआ कि गोल चक्कर पर काफी एक्सीडेंट की घटनाएं सुनने को मिलने लगीं।
फ्लाईओवर या भूल भुलैय्या - अब बढ़ते ट्रैफिक के दबाव के कारण दिल्ली में फ्लाई ओवर बनाए जाने का सिलसिला जारी है। दिल्ली में 50 किलोमीटर के रिंग रोड पर लगभग हर चौराहे पर फ्लाई ओवर बनाए जा रहे हैं जिससे वहां कभी रेडलाइट की स्थिति न हो और ट्रैफिक निर्बाध गति से चलता रहे। अगर आप रिंग रोड पर चलें तो आजादपुर, वजीरपुर डिपो, पीतमपुरा, ब्रिटानिया, पंजाबी बाग, राजा गार्डन, राजौरी गार्डन, नारायणा, धौलाकुआं, मोतीबाग, सफदरजंग, मेडिकल, आश्रम आदि में सब जगह आपको फ्लाई ओवर मिलेंगे। दिल्ली में धौला कुआं और मेडिकल के फ्लाई ओवर तो काफी कलात्मक ढंग से बनाए गए हैं। ये इतने घुमावदार हैं कि किसी नए व्यक्ति के लिए यह समझना बहुत मुश्किल होगा कि उसे किधर जाने के लिए कौन सा लेन चयन करना चाहिए। यहां तक सालों से दिल्ली में ही रहने वालों के लिए ये फ्लाई ओवर भूलभूलैया जैसे साबित हो रहे हैं।

दिल्ली को 2010 में होने वाले राष्ट्र मंडल खेलों के लिए तैयार करने के लिए शहर के ट्रैफिक को बेहतर बनाने की कवायद की जा रही है। इसी के तहत फ्लाईओवर और अंडर पास बनाए जा रहे हैं। इससे पूर्व भारत में बेंगलूर शहर की सड़कों को बेहतर बनाया गया है। वहां पर चौक पर फ्लाईओवर और अंडरपास बनाए गए हैं। निश्चय ही फ्लाईओवर से समय की बचत होती है। साथ ही घंटो प्रदूषित वातावरण में रहने से छुट्टी मिल जाती है।
पदयात्रियों का भी रखे ख्याल - हां इन फ्लाईओवरों ने पैदल चलने वालों के लिए मुश्किल खड़ी जरूर की है। कई जगह सड़क पार करने के लिए आधे किलोमीटर का सफर तय करना पड़ता है। इससे सड़क पार करना मुश्किल हो गया है। रेडलाइट नहीं होने के कारण सड़कों पर अब हमेशा तेज गति से वाहन चलते रहते हैं। इसलिए जितनी बड़ी संख्या में फ्लाई ओवर बन रहे हैं उसी अनुपात में पैदल पार पथ भी बनाए जाने चाहिएं। इससे सड़क पार करने वालों को सुविधा हो सकेगी। साथ ही हर फ्लाईओवर के आसपास कौन सी लेन किसमें जाकर मिल रही है इसकी सूचना सही ढंग से लिखी होनी चाहिए। ऐसा नहीं होने से कई लोगों को भ्रमित होना पड़ता है।
- विद्युत प्रकाश मौर्य




Thursday, 18 May 2006

कैसा हो बॉस का व्यवहार

दफ्तर में बॉस का व्यवहार कैसा हो इस पर ही काफी हद तक दफ्तर के कर्मचारियों की कार्यक्षमा निर्भऱ करती है। इसलिए आजकल मानव संसाधन के तहत बास को भी प्रशिक्षण दिया जा रहा है कि वे दफ्तर में अपने मातहत काम करने वाले लोगों के साथ कैसा व्यवहार करें। अगर बास हर बात पर गुस्सा करता हो आंखे चढ़ाता हो तो इसका बुरा प्रभाव उसके अधीन काम करने वाले लोगों पर पड़ता है। इसलिए अब इस बात की जरूरत बड़ी शिद्दत से महसूस की जा रही है कि बास का व्यवहार थोड़ा सा विनोदी होना चाहिए। साथ ही उसे अपने जूनियर लोगों के साथ मित्रवत व्यवहार करना चाहिए।

विनोदी चरित्र - चाहे कितना गंभीर मामला हो उसे बड़े ही आत्मीय और हल्के-फुल्के वातावरण में कहा सुना जा सकता है। इसका सामने वाले पर अच्छा प्रभाव पड़ता है। एक दार्शनिक ने कहा है कि मनुष्य के लिए विपत्ति का सामना करने के लिए मुस्कान से बढ़कर कोई अस्त्र नहीं है। ऐसे में गंभीर बातों के बीच भी थोड़ी विनोद की फुलझड़ी छोड़ना जरूरी होता है। इससे आपके साथ बैठे लोगों का तनाव कम होता है। लोग ऐसे में अपनी बातें खुलकर रख पाते हैं। इसलिए हमेशा कड़क व्यवहार छोड़कर बॉस को कभी कभी विनोद भी करना चाहिए।
बॉस को भी ट्रेनिंग- अब कई दफ्तरों में बास को भी ट्रेनिंग दी जा रही है। ट्रेनिंग इस बात की कि वे अपने मुलाजिमों से कैसा व्यवहार करें। आज प्रतिस्पर्धा का दौर है। ऐसे में हर काबिल कर्मचारी के पास कई विकल्प होते हैं। अगर बास का व्यवहार लगातार परेशान करने वाला हो तो कई कर्मचारी नौकरी छोड़कर दूसरी नौकरी ढूंढने में लगे रहते हैं। अगर कई लोग किसी दफ्तर से नौकरी छोड़कर चले जाएं तो इससे उस बास की बदनामी होती है। प्रबंधन की नजर में बास का रिपुटेशन खराब होता है। इसलिए अब हर बास को चिंता करनी चाहिए कि उसका व्यवहार अपने जूनियरों के प्रति अच्छा हो।
छुट्टी देने में आनाकानी- अक्सर बास अपने मुलाजिमों को छुट्टी देने में आनाकानी करते हैं। अगर कोई वाजिब कारण हो तो भी जल्दी छुट्टी पास नहीं करते। इससे कई घाटा होता है। कई बार कर्मचारी झूठ बोलकर छुट्टी लेना चाहता है। कई बार वाजिब काम के लिए छुट्टी नहीं मिलने पर कर्माचारियों में तनाव बढ़ता है। हमने सेना की कई ऐसी खबरें पढ़ी हैं जिसमें सैनिक छुट्टी नहीं मिलने पर अपने साथियों की या अधिकारी ही हत्या कर देता है। इसलिए बास को हमेशा वाजिब कारण होने पर अपने मुलाजिम को छुट्टी दे देनी चाहिए। हां बास को चाहिए कि वह अपने कर्माचारियों को इस बात के लिए जिम्मेवार बनाए कि उसके नहीं रहने पर दफ्तर में कैसे काम चलेगा इसके लिए अपने साथियों को प्रशिक्षित करें।
इंटरैक्टिव प्रोग्राम करें- कई दफ्तरों में सभी कर्मचारियों और बास के बीच अच्छा तालमेल बनाए रखने के लिए इंटरैक्टिव कार्यक्रम कराए जाते हैं। इसका अच्छा प्रभाव पड़ता है। इसके तहत पिकनिक पर ले जाना, अंत्याक्षरी जैसे प्रोग्राम आयोजित करना। बास की ओर से अपने कर्मचारियों के लिए लंच देना और लंच के दौरान ही दफ्तर की बैठक कर लेना। कर्मचारियों से उनके निजी और परिवार के बारे में जानकारी लेना आदि अच्छे बॉस के लक्षण हैं। कभी कभी हर बॉस को अपने आप से पूछना चाहिए कि क्या वह अपने कर्मचारियों से अच्छा व्यवहार करता है।
-    विद्युत प्रकाश मौर्य


Tuesday, 16 May 2006

मोबाइल रखिए, सब कुछ जाइए भूल

अगर आपके पास मोबाइल फोन है तो कई चीजें साथ रखने की जरूरत अब नहीं होनी चाहिए। घड़ी, अलार्म घड़ी, फोन डायरी, आर्गनाइजर, कैलकुलेटर जैसी कई चीजें एक ही जगह अब समाहित हो चुकी हैं। ये सुविधाएं हर सस्ते मोबाइल हैंडसेट में भी उपलब्ध है।
घड़ी- जैसे हर मोबाइल में घड़ी होती है तो फिर अलग से कलाई घड़ी बांधने की क्या जरूरत है। साठ फीसदी मोबाइल रखने वाले लोगों ने घड़ी बांधना छोड़ दिया है। समय देखना है तो मोबाइल की स्क्रीन को देख लिजिए। यहां तक की घड़ियों के बाजार में घड़ी की बिक्री पर भी असर पड़ा है। अब कई समझदार लोग घड़ी नहीं खरीदना चाहते उनका मोबाइल स्क्रीन समय और तारीख भी बताता है।
अलार्म घड़ी- अभी तक अगर आपको जगना हो तो अलार्म लगाने के लिए अलग से एक अलार्म घड़ी रखनी पड़ती थी क्योंकि कलाई घड़ी में आमतौर पर अलार्म नहीं होता पर अब मोबाइल फोन में ही आप जब चाहें अलार्म लगा सकते हैं। कई फोन में एक बार के लिए व रिपीट अलार्म लगाने की सुविधा भी मौजूद है।
फोन डायरी - इसी तरह जेब में अलग से फोन डायरी रखने की भी जरूरत नहीं है। आपके मोबाइल में अब आमतौर पर 300 से लेकर 2000 लोगों तक के नाम पते सुरक्षित किए जा सकते हैं। फिर अलग से डायरी रखने की क्या जरूरत है। हां अपने मोबाइल में सेव किए गए नाम पते को सुरक्षा के लिए आप घर में किसी डायरी में भी लिख कर रखें तो बहुत अच्छी बात होगी।
कैलकुलेटर- पहले जहां आपको इलेक्ट्रानिक कालकुलेटर के लिए अलग से एक बड़ा डिब्बा लेकर चलना पड़ता होगा। पर आजकल लगभग हर मोबाइल में कालकुलेटर का विकल्प होता ही है। आप इसमें समान्य कालकुलेटर वाले सारे काम ले सकते हैं। हां साइंटफिक या विशेष कालकुलेटर इसमें नहीं होते। पर गाहे बगाहे जरूरत पड़ने वाले कालकुलेशन इसमें किए जा सकते हैं।
आरगनाइजर- आपको कब कहां जाना यह याद दिलाने के लिए आपका मोबाइल एक सचिव की भूमिका भी निभाता है। मोबाइल फोन ने डिजिटल आरगनाइजर का बाजार भी लगभग खत्म कर दिया है। पहले लोग खास तौर पर फोन बुक के लिए और अपने एपवाइंटमेंट याद रखने के लिए जेब में एक डिजिटल आरगाइजर लेकर चला करते थे पर अब यह सब कुछ मोबाइल में ही संभव है। विपिन बजाज एक एंश्योरेंस एडवाइजर हैं जो अपने सारे एप्वाइंटमेंट और किस दिन कौन सा काम करना यह याद करने के लिए फटाफट उसे मोबाइल में ही फीड कर लेते हैं। उनका फोन उस समय काम की याद दिला देता है।
इस प्रकार हम देखते हैं कि अगर एक समान्य सा मोबाइल लिया जाए जिसमें कैमरा, एफएम रेडियो आदि न भी हो तो भी वह आपके कई तरह के काम आता है। अब लोग अपने शौक पूरे करने के लिए कैमरा, रेडियो, जीपीआरएस, इन्फ्रारेड अथवा गाने सुनने की सुविधा वाले सेट ढूंढते हैं। पर अगर इतना सब कुछ न हो तो भी दो से तीन हजार रुपए के हैंडसेट में भी कई तरह की सुविधाएं मौजूद है। अब रंगीन हैंडसेट भी तीन हजार से कम में आरंभ होने लगे हैं। आप जब मोबाइल खरीदने की योजना बना रहे हों तो यह देख लें की बातें करने के अलावा आपकी जरूरतें और क्या क्या हैं। इसके बाद ही कोई हैंडसेट खरीदें। हालांकि अब विदेशों में लोगों में ढेर सारी सुविधाओं वाले हैंडसेट का खुमार उतर रहा है। लोग अब साधारण हैंडसेट की ओर आकर्षित हो रहे हैं।
 माधवी रंजना madhavi.ranjana@gmail.com



Monday, 15 May 2006

एंकरिंग के साथ अभिनय भी..

टीवी पर एक नई परंपरा चल पड़ी है अभिनय के साथ एंकरिंग करने की। खासकर समाचार चैनलों पर अपराध पर आधारित कार्यक्रमों में आप इसे बखूबी देख सकते हैं। अभी हाल में चैनल-7 ने अपने सभी कार्यक्रमों को रीलांच किया है। 
इसी क्रम में उसका अपराध पर आधारित कार्यक्रम क्रिमिनल में एंकर पुराने जमाने की अभिनेत्री नादिरा को कापी करते हुए अपराध की खबरें परोसती हुई नजर आ रही है। इसमें वह लाल रंग की स्लीवलेस ब्लाउज में नजर आती है। खबरें परोसने के साथ ही वह खास अंदाज में अपनी जुल्फों को झटकती है। कई बार वह एंकर कम विष कन्या अधिक नजर आती है। यह सब कुछ अपराध पर आधारित कार्यक्रमों को बेचने के लिए किया रहा है। समाचार चैनलों में क्राइम को बेचने के लिए बड़ी रोचक प्रतिस्पर्धा चल पड़ी है। इसकी शुरुआत हालांकि जी न्यूज और स्टार न्यूज जैसे चैनलों ने की। जी न्यूज ने चैन से जीना है तो जाग जाइए पंच लाइन के साथ अपना अपराध कार्यक्रम आरंभ किया। यह कार्यक्रम अपराध की खबरें परोसने के साथ आपको डराता भी था। इसके बाद स्टार न्यूज का कार्यक्रम सनसनी आया। इसके एंकर श्रीवर्धन त्रिवेदी अभिनय करते हुए खबरें पेश करते हैं। यानी अपराध की खबरें अपराधी के अंदाज में ही। वे स्क्रीन पर न्यूज एंकर कम अभिनेता ज्यादा नजर आते हैं। हालांकि उनका अभिनय सिर्फ बोलने के अंदाज में होता है। वे चेहरे पर कोई मेकअप नहीं करते या परिवेश में कोई बदलाव नहीं किया जाता है।
यहां तक तो ठीक था पर अब इंडिया टीवी और चैनल-7 ने नए किस्म के बदलाव किए हैं। इसके तहत अब क्राइम प्रोग्राम के लिए खासतरह का सेट डिजाइन किया गया है। इंडिया टीवी का प्रोग्राम है एसीपी अर्जुन। इसमें एंकर एक पुलिस अधिकारी की वेशभूषा में आता है। उसके हाथ में रुल भी होता है सिर पर टोपी भी। वह सभी अपराध की खबरों को पुलिसिया अंदाज में पेश करता है। वह एफआईआर की भाषा में देश भर में हो रहे अपराध की खबर लेता है। उसके संवाददाता भी कुछ इसी अंदाज में उसे रिपोर्ट करते हैं। यह खबरों की प्रस्तुति का नाटकीयकरण है। एक बारगी किसी नए आदमी के लिए यह समझना मुश्किल हो जाए कि वह कोई समाचार चैनल देख रहा है या कोई मनोरंजन चैनल पर क्राइम धारावाहिक।

ठीक इसी तरह चैनल-7 ने शुरू किया है क्रिमिनल। आपके ड्राइंग रुम, घर, बाथरुम या दफ्तर कहीं भी हो सकता है क्रिमिनल। इस तरह की पंचलाइन आपको आतंकित करने के लिए काफी है। उसके बाद की दास्तान को बड़े ही रोमांटिक अंदाज में एकंर पेश करने की कोशिश करती है। भला अपराध की खबरों को रोमानी अंदाज में कैसे सुना जा सकता है। सो यह सब कुछ बड़ा ही नाटकीय लगता है। यहां खबरों को मूल भावना खत्म हो गई लगती है। एक होड़ सी लगी है, अपराध को नाटकीय अंदाज में पेश करने की। इस होड़ में अपराध को कितना बिकाऊ बनाया जा सकता है इसकी पूरी कोशिश जारी है।

मामूली खबरें नाटकीय अंदाज में- इस होड़ में कई बार अपराध की मामूली सी खबरों को भी नाटकीय अंदाज में पेश किया जाता है। कई घटनाओं को तो किसी टीवी धारावाहिक की तरह दुबारा शूट किया जाता है। यह काम सभी चैनल कर रहे हैं। यहां तक की क्षेत्रीय चैनल भी इस तरह के प्रोग्राम लेकर आ गए है। ईटीवी बिहार और ईटीवी उत्तर प्रदेश भी इस तरह का कार्यक्रम दिखा रहे हैं। पुलिस फाइल में जो अपराधी मोस्ट वांडेट हैं उन्हें इस तरह के प्रोग्राम में शूट करके दिखाने की शुरूआत इंडियाज मोस्ट वांटेड जैसे प्रोग्राम में की गई थी। पर अब मामूली अपराधी भी इन कार्यक्रमों में बहुत ज्यादा जगह पा लेते हैं।

- विद्युत प्रकाश मौर्य