Monday, 23 November 2009

लालू जी हम भी गरीब हैं (व्यंग्य)

लालू जी बड़े गरीब नवाज हैं। जहां भी रहते हैं गरीबों की सुध लेते हैं। गरीबों को सपने दिखाने में उनका कोई सानी नहीं है। लिहाजा उन्होंने रेलवे में भी गरीबों के लिए नई रेलगाड़ी शुरू कर दी है। गरीब रथ। इस गरीब रथ में देश की जनता जनार्दन वातानुकुलित कोच में चलने का आनंद उठा सकेगी वह भी सस्ते में। 
इस रेलगाड़ी में चलने के लिए आपको यह घोषणा करनी पड़ेगी कि आप गरीब हैं तभी आप गरीब रथ में सवार हो सकेंगे। पर क्या यह रेलगाड़ी गरीबों की गरीबी का मजाक उड़ाती नहीं प्रतीत होती है। आखिर आज के दौर में कौन खुद को गरीब कहलाना पसंद करता है। सभी लोग अमीर बनना चाहते हैं। भले ही कोई जेब से फकीर हो पर वह नहीं चाहता है कि उसे कोई गरीब कहे। अगर किसी ने गरीब रथ में यात्रा कर ली तो अब उसके नाम के आगे तो मार्का ही लग जाएगा कि वह गरीब है। किसी गरीब को अगर आप याद दिलाएं कि वह गरीब है तो वह इसे अपने आत्मसम्मान पर ले लेता है। भला तुम कौन होते हो मुझे गरीब कहने वाले। क्या है तुमसे मांग कर खाते हैं।
गरीब भले ही गरीब हो पर वह अपने आत्मसम्मान के साथ कोई समझौता नहीं करेगा। वह फिर उसी सेकेंड क्लास के डिब्बे में जलालत और गरमी के बीच यात्रा करना चाहेगा पर खुद को गरीब डिक्लियर करके गरीब रथ के वातानुकूलित कोच में नहीं बैठेगा। वहीं जो लोग चालू पुर्जा किस्म के हैं, भले ही उनके पास पैन कार्ड हो इनकम टैक्स भी जमा करते हों पर सस्ती यात्रा करने के लिए थोड़ी देर के लिए गरीब बन जाएंगे। कई अमीर लोग हमेशा गरीब ही बने रहना चाहते हैं। वे अपनी असली आमदनी का खुलासा नहीं करना चाहते। वे अमीर की चादर में गरीबी की पेबंद लगाकर सोना चाहते हैं। वे ऐसा करके देश के गरीबों को और सरकार को धोखा देते हैं। वे आयकर विभाग को चकमा देकर चूना लगाते हैं। तो भला ऐसे लोगों को रेलवे को चकमा देने में कौन सी देर लगेगी। कहेंगे लो जी हम भी गरीब हैं। हमें भी गरीब रथ का टिकट दे दो। इस तरह अमीर भी लूटेंगे सस्ते में गरीबी का मजा। पर यह क्या लालू जी आप तो गरीबों की आदत बिगाड़ रहे हैं। 

गरीबों के घर में तो अभी तक बिजली भी नहीं पहुंची है। पंखे भी नहीं लगे हुए हैं। जिनके घर में पंखे लगे हुए हैं वे भी भला कौन सा हमेशा पंखे में सो पाते हैं। क्या करें बिजली रानी ही नहीं आतीं। अब भला जिन्हें पंखे भी नसीब नहीं हैं वे कुछ घंटे के लिए अगर गरीब रथ के वातानूकुलित डिब्बे में सफर कर लेंगे तो उनकी आदत नहीं बिगड़ जाएगी। वे फिर घर वापस आएंगे तो उसी मुफलिसी का सामना करना पड़ेगा। कहेंगे अरे बापू ट्रेन में बड़ी प्यारी नींद आई थी। गरमी के दिन में भी ठंडी ठंडी हवा चल रही थी। अब गांव वापस आने पर फिर से सूरज की गरमी से चमड़ी जल रही है। यह गरीबों की गरीबी का मजाक नहीं तो और क्या है। थोड़ी देर के लिए उनको ठंडी ठंडी हवा में सपने दिखा देते हो। अगर असली गरीबों के हमदर्द हो तो पहले उनके घरों को वातानूकुलित करने की योजना बनाओ न। तुम तो सिर्फ सपने दिखाने में लगे हुए हैं। गरीब रथ में सफर करके लौटने के बात एक तो अपनी गरीबी का एहसास हो ही जाता है। उपर से अपनी गरीबी पर बड़ा रोना भी आता है। किसी शायर ने कहा है-
आधी-आधी रात को चुपके से कोई जब मेरे घर में आ जाता है।
कसम गरीबी की अपने गरीब खाने पर बड़ा तरस आता है।
 इसलिए लालू जी कुछ ऐसा इंतजाम कीजिए कि एक अदद एयर कंडीशनर हमारे गरीबखाने में भी लग जाए।
- vidyutp@gmail.com


Tuesday, 17 November 2009

रेलवे और सस्ते एयरलाइनों में टकराव

कई सस्ते एयरलाइनर जिन्हें हम लो कास्ट एयरलाइन कहते हैं अब रेलवे के एसी 2 टीयर के बराबर किराे में हवाई यात्रा का सुख दे रहे हैं। ऐसे में भारतीय रेल को प्रतियोगिता का सामना करना पड़ रहा है। जैसे आपको दिल्ली से मुंबई या चेन्नई जाना है तो आपको लो कास्ट एयर लाइन का टिकट 2500 से 4000 रुपए में मिल जाता है। वहीं रेलवे के एसी 2 टीयर में भी 2500 रुपए तक किराया देना पड़ता है। ऐसे में रेलवे के उच्च वर्ग में सफर करने वाले लोगों पर लो कास्ट एयर लाइनों की नजर है। वहीं एयर डेक्कन जैसे एयर लाइनों का सूत्र वाक्य है कि लोगों को पहली बार हवाई यात्रा के ख्वाब दिखाना। एक मध्यम वर्ग का आदमी एक बार हवाई यात्रा कर लेगा तो शायद बार बार करना चाहेगा।

अभी आसमान में एयर डेक्कन, स्पाइस जेट, गो एयर, इंडिगो सहारा और पैरामाउंट एयरवेज जैसे हवाई संचालक लोगों को सस्ते में उड़ने के सपने दिखा रहे हैं। इन विमान सेवाओं ने प्राइवेट रेल टिकट बुक करने वालों को हवाई टिकट बुक करने के लिए कुछ इंसेटिव देना भी आरंभ कर दिया है। यानी आप रेल टिकट बुक कराने जाएंगे तो आपका एजेंट आपको हवाई जहाज से चले जाने के फायदे बताएगा।
अब स्पाइस जेट और एयर डेक्कन आदि एयरलाइनरों ने रेलवे के राजधानी और शताब्दी एक्सप्रेस के डिब्बों में अपने विज्ञापन देने की नीति भी अपनाई है। जिससे इस क्लास के लोगों को हवाई यात्रा करने के लिए आकर्षित किया जा सके। एक सर्वे के अनुसार रेलवे के 3 फीसदी यात्री उच्च वर्ग के लोग हैं। वे बड़े आराम से हवाई यात्रा में लो कास्ट एयरलाइन को अपना सकते हैं। अगर इनमें से एक फीसदी भी हवाई यात्रा करने लगे हो हवाई यात्रियों में 35 फीसदी का इजाफा हो सकता है। कुछ एयरलाइन कंपनियां पंपलेट पोस्टर और विज्ञापनों से रेलवे के यात्रियों को अपनी ओर आकर्षित करने की कोशिश में लगे हुए हैं।
अब रेलवे भी अपने यात्रियों का आधार खोना नहीं चाहती है इसलिए वह हर रेल बजट में रेल यात्रियों के लिए कुछ आकर्षक आफर लेकर आती है। पिछले साल रेलवेके एसी 2 टीयर में सफर करने वाले यात्रियों के लिए भारतीय स्टेट बैंक के साथ लांच शुभयात्रा क्रेडिट कार्ड में डिस्काउंट की पेशकश की गई है। इस साल के रेल बजट में उम्मीद की जा रही है राजधानी और शताब्दी जैसी रेल गाडि़यों में कई तरह के डिस्काउंट की घोषणा की जा सकती है। पिछले साल रेलवे ने अपग्रेडेशन प्रणाली आरंभ की है जिसके उत्साहजनक परिणाम सामने आए हैं। वहीं सस्ते में वातानूकुलित क्लास में यात्रा की परिकल्पना को साकार करने वाली गरीब रथ ट्रेन को भी लोगों ने अपनाना आरंभ कर दिया है। अगले रेल बजट में कुछ और नए मार्ग पर भी गरीब रथ जैसी रेल गाडियों की घोषणा हो सकती है या फिर कुछ पुरानी गाडि़यों को पूरी तरह वातानुकूलित बनाने की योजना पेश की जा सकती है।
अगर आप दिल्ली से चेन्नई रेल से जाते हैं तो दो दिन लग जाते हैं वहीं आप हवाई जहाज से यही सफर मात्र दो घंटे में तय कर लेते हैं। इस तरह आपके दो दिन की बजत होती है। अगर आपकी एक दिन की आमदनी एक हजार रुपए है तो आप हवाई सफर करके आप दो हजार रुपए की बजत भी करते हैं। इस अर्थशास्त्र को समझें तो हवाई यात्रा करना आपके लिए सस्ता भी हो सकता है।


Monday, 5 October 2009

विचारों के स्वागत के लिए रहें तैयार

अखबारों में संपादकीय लिखने की परंपरा बहुत पुरानी है। कहते हैं संपादकीय अखबार की आत्मा होती है। चुंकि संपादकीय विचार प्रधान होता है इसलिए लोग उस पर अपनी प्रतिक्रिया भी व्यक्त करते हैं। कई अखबारों के संपादक हर हफ्ते अपने नाम से विशेष संपादकीय लिखते हैं। अब जबकि ई मेल का जमाना है तो पाठक अपनी फटाफट प्रतिक्रिया भी जताते हैं। ऐसे में हर अखबार को अपने संपादकीय विचार पर लोगों की प्रतिक्रिया सुनने के लिए खुला मंच प्रदान करन चाहिए। 

हिंदुस्तान दैनिक में हर रविवार को शशिशेखर जी आजकल कालम लिखते हैं। कालम के अंत में उनका ईमेल आईडी छपता है जिसपर पाठक अपनी प्रतिक्रिया दे सकते हैं। वहीं नई दुनिया में आलोक मेहता के कालम के साथ भी अखबार में प्रतिक्रिया देने के लिए ईमेल आईडी प्रकाशित होता है। नवभारत टाइम्स जैसे अखबार ने संपादकीय पर लोगों की प्रतिक्रिया लेने के लिए पहले से फोरम खोल रखा है। अब एक एक अच्छी बात हुई है कि नव भारत टाइम्स और दैनिक भास्कर जैसे समाचार पत्रों ने हर खबर पर लोगों को अपनी प्रतिक्रिया देने के लिए विकल्प खोल दिया है। अगर आप यूनीकोड टाइपिंग जानते हैं तो सीधे अपनी प्रतिक्रिया दें। कई अंग्रेजी के अखबार हर खबर के साथ अपने रिपोर्टर की ईमेल आईडी प्रकाशित करते हैं।

यह बहुत अच्छी बात कही जा सकती है लेकिन कई बड़े अखबार इस मामले में कंजूस हैं। वे पाठकों की प्रतिक्रिया को कोई महत्व नहीं देते। अगर आप संपादकीय या कोई विशेष अग्रलेख लिखते हैं तो ये हजारों लाखों लोगों के बीच जाता है। ऐसे में हमें हर अच्छे बुरे विचार का स्वागत करना चाहिए। विचारों पर चर्चा की शुरूआत करनी चाहिए। और अगर विचारों पर कोई चर्चा नहीं चाहते तो ऐसे लोगो को लिखना भी बंद कर देना चाहिए। बिना किसी संपादकीय के भी अखबार निकालना चाहिए। संपादकीय का मतलब विचारों की धक्केशाही तो हरगिज नहीं होना चाहिए।

एक पत्रकार के रूप में जब किसी पर भी अपने विचारों से प्रहार करते हैं तो आपको उस पर आने वाली प्रतिक्रियाओं के लिए भी तैयार रहना चाहिए। पत्रकार वह प्राणी है जो हमेशा संवाद खोलने का काम करता है। किसी विषय पर दिया गया कोई भी विचार अंतिम नहीं होता। उसमें सुधार की और बदलाव की गुंजाइश हमेशा रहती है। इतिहास गवाह रहा है कि बड़े से बड़े पत्रकार पाठकों के विचारों का स्वागत करते रहे हैं। विचारों पर होने वाली चर्चा से नई अवधारणाओं का जन्म होता है। हमें इसके लिए तैयार रहना चाहिए।
- vidyutp@gmail.com

Tuesday, 15 September 2009

70 प्रतिशत महिलाएं घरेलू हिंसा की शिकार

कहते हैं औरत वो आटे का दीया है, जिसे घर के अन्दर रखो तो घर के चूहे खा जाते हैं। घर से बाहर रखो तो कौए नहीं छोड़ते। यानी कि औरत चाहे घरेलू हो या काम-काजी वह हर जगह शोषित होती है, प्रताड़ित की जाती है। हर स्थान पर उसकी इज्‍़ज़त और अस्तित्त्व पर ख़तरा ही मंडराता रहता है।

 एक सर्वेक्षण से पता चला है कि भारत में लगभग 70 प्रतिशत महिलाएं किसी न किसी ढंग से घरेलू हिंसा से पीड़ित हैं। यह हिंसा ग़रीब, मध्यम वर्ग से लेकर आर्थिक और सामाजिक स्तर पर सम्पन्न परिवारों की महिलाओं तक में देखने को मिली है।
लड़की को पराया धन समझना, न पिता के यहां न पति के घर सुरक्षा, आर्थिक विपन्नता, बढ़ते तलाक, दहेज़ की समस्या, मादाभ्रूण हत्या के लिए मजबूर करना, प्रतिभा को दबाना, मानसिक तौर पर छोटी-छोटी बात के लिए प्रताड़ित करना ऐसी स्थिति चारों ओर देखने को मिलती है। ऐसे माहौल के निरन्तर बढ़ रहे ग्राफ़ के कारण एक ऐसे कानून की आवश्यकता महसूस की जा रही थी, जो पीड़ित महिलाओं को सहायता प्रदान कर सके, उन्हें ऐसी विषम परिस्थतियों से निजात दिला सके।

एक विरोधाभासी परिदृश्य में भारतीय संसद ने अक्‍तूबर 2006 में महिला घरेलू हिंसा निवारण कानून पारित किया है। इस कानून के पारित होते ही सामाजिक क्षेत्रों में नए सिरे से एक बहस छिड़ गई। इस के पक्ष एवं विपक्ष में आवाज़ें उठनी शुरू हो गई।

क्या है महिला घरेलू हिंसा निवारण कानून 2006:- इस कानून के अंतर्गत पत्‍नियां, मां, सास, बहनें, बेटियां यहां तक कि गोद ली हुई महिला भी अपने साथ हो रही हिंसा के खिलाफ़ कानूनी गुहार लगा सकती हैं। यह कानून उन्हें शारीरिक, बोल-चाल और यौन उत्पीड़न से तो बचाएगा ही साथ ही उन्हें निवास और आर्थिक स्वतन्त्रता का अधिकार दिलाने में भी सहायक सिद्घ हो सकता है। यह कानून उन 70 प्रतिशत महिलाओं की पहचान करने और उनकी मदद करने में सहायक सिद्घ हो सकता है। यह कानून कितना प्रभावशाली होगा, आने वाला समय ही बताएगा।

14 वर्ष लगे इस कानून को पारित होने में:- सर्वप्रथम 1992 को भारत के चुनिंदा अधिवक्‍ताओं ने घरेलू हिंसा निवारण का एक मसौदा तैयार करके महिला संगठनों तक पहुंचाया था। फिर महिला आयोग ने 1994 में इसे सदन में पेश कराने की पहल की। सदन में इस बिल के खिलाफ़ तीखी अलोचना हुई, परिणाम वश इसके पक्ष में राष्‍ट्र के सभी महिला संगठनों ने एक मंच पर एकत्रित हो कर, इसके हक़ में आवाज़ बुलन्द की। यह भी चर्चा हुई कि यह कानून अापराधिक (क्राईम) न होकर दीवानी में शामिल किया जाना चाहिए। 

इसके उपरान्त 1999 में इस निवारण कानून को नए ढंग से तैयार करके पुन: सदन में लाया गया। फिर इस पर राष्‍ट्र स्तरीय बहस हुई। इसे तैयार करने में संयुक्‍त राष्‍ट्र के घरेलू हिंसा कानून से भी प्रेरणा ली गई। 2001 में जब केन्द्र सरकार ने इस घरेलू हिंसा निवारण बिल को सदन पटल पर रखा तो इसके खिलाफ़ ज़ोरदार आंदोलन हुआ। इस पर टिप्पणियां की गईं कि इस बिल में यह स्पष्‍ट नहीं था कि घरेलू हिंसा किसे माना जाए और भारतीय दण्ड सहिता के अनुसार किसी कानून के अन्तर्गत कौन-सी सज़ा निर्धारित की जाए। पुरुष प्रधान समाज में भारी विरोध के बावजूद 14 वर्ष के लम्बे संघर्ष के बाद आख़िर इस महिला घरेलू हिंसा निवारण कानून को अक्‍तूबर 2006 को पारित कराने में सफलता प्राप्‍त हुई है।

क्या लाभ हो सकता है इस कानून से:- यह कानून जहां घरेलू हिंसा की परिभाषा स्पष्‍ट करता है वहीं शोषित महिला को बराबरी की नज़र से देखता है। यह कानून निवास, मेंटिनेंस और सुरक्षा के अधिकार भी प्रदान करता है। दोषियों के लिए सज़ा का स्पष्‍ट प्रावधान भी करता है। महिलाओं द्वारा इस कानून के दुरूपयोग का नकारात्मक पहलू भी इसमें छिपा हुआ है।

सबसे पहले महत्वपूर्ण बात यह है कि इस कानून के बारे में ग़रीब से ग़रीब महिला तक को समझाना होगा। भारतीय समाज में प्रचलित सामुदायिक रीति-रिवाज़ों पर आधारित संस्थाएं तथा पंचायतें, धार्मिक संस्थाएं, इस कानून को सरलता और सहजता से लागू होने देने में रुकावट बन सकती हैं। सदियों से महिलाएं इन पर आश्रित रही हैं और इन पुरुषों द्वारा स्थापित पुरुष प्रधान सोच से ग्रस्ति संस्थाओं द्वारा हमेशा महिला को निम्न दर्जे का नागरिक मान कर उसके ख़िलाफ़ ही फैसले दिए हैं। प्रताड़ित महिला को ही दोषी करार देने में कसर नहीं छोड़ी है। संवैधानिक कानूनों और धार्मिक कानूनों के बीच टकराव जारी है। संवैधानिक कानून महिला के पक्ष की बात करता है, तो धार्मिक उसके विपरीत। ऐसे में घरेलू हिंसा कानून को कारगर ढंग से लागू कर पाना भी एक चुनौती से कम नहीं है। इमरानाबलात्कार कांड का हश्र सभी के सामने है। चाहे मीडिया ने इसमें कुछ सकारात्मक भूमिका निभाते हुए इमराना के हक़ में आवाज़ उठाई थी।

इस कानून के पारित होते ही घरेलू हिंसा से पीड़ित महिलाओं के कई मामले मीडिया द्वारा सुर्खियों में लाए गए हैं जो हमारे समाज में 70 प्रतिशत पीड़ित महिलाओं की दुर्दशा को ब्यान करते हैं। लेकिन यह भी सत्य है कि जो काम स्वस्थ सामाजिक माहौल और मानवीय गुण पैदा कर सकते हैं। स्त्री और पुरुष को बराबर समझने की सोच हमारी मानव मूल्य आधारित शिक्षा पैदा कर सकती है। यह वातावरण कोई कानून पैदा नहीं कर सकता। कानून का डर कितना और कितने लोग महसूस करते हैं यह किसी से छिपा नहीं हैं। कानून के निर्माता, संरक्षक खुद ही इन कानूनों की परवाह नहीं करेंगे तो आम लोगों से क्या उम्मीद की जा सकती है। महिलाओं के हक़ में कानून तो पहले भी कई बनाए गए हैं, उनका कितना लाभ वे प्राप्‍त कर सकी हैं या इन कानूनों में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जो होलरह गए, उनका लाभ शोषण करने वालों ने उठाया है। इस नए घरेलू हिंसा निवारण कानून का हश्र भी वैसा ही न हो, इस के बारे में भी महिला संगठनों और भारतीय अधिवक्‍ताओं को चिंतन करना होगा।

यदि समाज में सभी वर्ग मिल कर ऐसे वातावरण का सृजन कर दें जिस में कोई न अपना, न पराया हो, समानता का भाव हो। दयालुता, परोपकार, सहृदयता हो तो ऐसे कानूनों को बनाने की ज़रूरत ही नहीं होगी।

 - vidyutp@gmail.com

Wednesday, 9 September 2009

बादल आया ( नन्ही कविता )


बादल आया
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बादल आया
बादल आया
बारिश हुई
बारिश हुई
कपड़ा भी गिला हुआ
घर भी गिला हुआ
घड़ी भी गिली हुई
और गिला हुआ पेड़....।


- अनादि अनत ( चार साल )


दि्ल्ली की बारिश देखकर हमारे नन्हें बेटे ने ये कविता रच डाली। वे अभी लिखना सीख रहे हैं। इसलिए हमने इसे लिपिबद्ध कर लिया। ये एक नन्हें बच्चे का पहला सृजन है। 

Friday, 28 August 2009

कई मल्टीप्लेक्स पर लग सकता है ताला

मेरे मुहल्ले में कई महीने से चल रहा स्पेंसर्स का रिटेल स्टोर बंद हो गया। मंदी के कारण स्टोर में बिक्री कम हो रही थी , लिहाजा एक दिन शटर गिर गया। अगले साप्ताहिक अवकाश में मैं फिल्म देखने गया। दिल्ली से सटे हुए भीड़भाड़ वाला मुहल्ला है शालीमार गार्डन। यहां एक शापिंग कांप्लेक्स है एसएम वर्ल्ड। इस एसएम वर्ल्ड में तीन 3 स्क्रीन मल्टीप्लेक्स है। मेरी इच्छा फिल्म देखने की हुई। तीनो आडिटोरियम में अलग अलग फिल्में चल रही थीं। मैंने लव आजकल देखने का निर्णय लिया। 

टिकट काउंटर पर जाने पर मालूम हुआ है कि लव आजकल की एक भी टिकट नहीं बिक पाई है, लिहाजा इसमें संदेह है कि शो चलेगा भी की नहीं। बुकिंग करने वाली लड़की ने सलाह दी कि आप कमीने देख लें। मैं घर से फिल्म देखने का तय करके चला था लिहाजा मैंने कमीने ही देखने को सोची। जब मैं सिनेमाघर अंदर दाखिल हुआ तो कमीने देखने वाले भी सिर्फ पांच लोग थे। पांच सौ लोगों की क्षमता वाला आडिटोरियम पूरा खाली था। यानी सिनेमाघर के एसी चलाने का भी खर्चा निकालाना मुश्किल है। 

दिल्ली के आसपास के कई मल्टीप्लेक्स का ऐसा ही हाल है। मल्टीप्लेक्स वाले सिनेमाघर तो बड़ी संख्या में बन गए हैं लेकिन फिल्में देखने आने वाले लोग कम दीख रहे हैं। क्या ये मल्टीप्लेक्स की महंगी टिकटों के कारण है या फिर आने वाली मंदी का असर।

बचपन में कस्बे के सिनेमाघर में फिल्म देखने जाता था तो कभी ऐसा नहीं सुना की पूरे सिनेमाघर में सिर्फ पांच लोग हों, या फिर लोगों की कमी से सिनेमा का शो ही नहीं चला हो। लेकिन शहरों में ऐसा हो रहा है। मल्टीप्लेक्स में टिकट की दरें कुछ ज्यादा जरूर है लेकिन मल्टीप्लेक्स वाले लोगो को अपनी ओर खींचने के लिए टिकट की दरें तो घटाने मे लग गए हैं। दिल्ली एनसीआर के कई सिनेमाघरो में मार्निंग शो की टिकट दरें कम करनी शुरू कर दी है। सौ से 125 रूपये की जगह 30 से 50 रूपये की टिकटें कर दी गई हैं। फिर भी मल्टीप्लेक्स में वीरानगी छाई दिखाई दे रही है। मल्टीप्लेक्स वाले इसके लिए सस्ती सीडी और डीवीडी को दोषी ठहरा सकते हैं। पाइरेसी में सस्ती फिल्में मिल जाती हैं, लेकिन मल्टीप्लेक्स वाले पॉपकार्न के नाम पर जो लूटपाट मचाते हैं भला उसके लिए कौन जिम्मेवार है। अब शायद ऐसा दौर आने वाला है कि कुछ मल्टीप्लेक्स में ताला लग सकता है।


बात रिटेल स्टोर से शुरू की थी, सो फिर वहीं आता हूं। मल्टीप्लेक्स में आदित्यविक्रम बिड़ला समूह का मोर रिटेल शॉप है, जहां शाम के समय भी ग्राहकों का टोटा दिखाई देता है। कई तरह के आफर हैं लेकिन खऱीददार नजर नहीं आते हैं। उपरी मंजिल पर एक और रिटेल स्टोर है। उसके मैनेजर का कहना है कि स्पेंसर रिटेल की तरह मोर पर भी ताला लग सकता है। जाहिर सी बात है, स्टाफ का वेतन, बिजली का बिल और किराया निकालना भी मुश्किल हो जाए तो कोई बड़ा उद्योगपति भी ज्यादा दिन तक रिटेल स्टोर खोल कर कैसे रह सकता है। घर फूंक कर तमाशा देखने को तैयार कोई भी नहीं हैं। तो क्या मल्टीप्लेक्स की चका चौंध अब धीमी पड़ने वाली है। पूर्वी दिल्ली का एक और शापिंग मॉल है इडीएम। इडीएम की उपरी मंजिल पर फूड कोर्टस हैं। लेकिन एक शाम को जब फूड कोर्ट सेक्सन में गया तो आठ दस बड़े बड़े रेस्टोरेंट्स में ग्राहक बहुत कम दिखाई दे रहे थे।
-विद्युत प्रकाश मौर्य

Friday, 17 July 2009

देव सुरैय्या और पहला प्यार

कहते हैं जीवन में पहले प्यार का बड़ा ही महत्व है। उसकी खुशबू जीवन भर साथ बनी रहती है। बहुत से लोगों के जीवन में प्यार आता है। कई प्यार आते हैं। पर उनके बीच पहले प्यार का अपना अलग महत्व होता है। कहा जाता है देवानंद और सुरैय्या में काफी गहरा प्यार था। पर दोनों परिवारों को उनका मिलना पसंद नहीं था। उनके बीच धर्म की दीवार थी वहीं सुरैया परिजन यह बिल्कुल पसंद नहीं करते थे कि उनकी बेटी देवानंद के साथ प्यार के पिंग बढ़ाए।


देव-सुरैय्या का प्यार रजत पट से हटकर हकीकत था पर उस प्यार को अंजाम तक नहीं पहुंचाया जा सका। अब 80 से ज्यादा वसंत देख चुके देवानंद ने अभी हाल में एक बातचीत में सुरैया के साथ अपने प्यार को बड़ी ही शिद्दत से याद किया। उन्होंने कहा कि उन्हें सुरैय्या का प्यार नहीं मिला इसका उन्हें कोई गम नहीं है। वे मानते हैं कि अगर उन्हें सुरैय्या मिल जाती तो उनकी जिंदगी वैसी नहीं होती जैसी आज है। सुरैय्या से अलग रहकर भी उन्होंने जिंदगी को बड़े ही खूबसूरत ढंग से जीया है। देव साहब की यह स्वीकारोत्ति उन लोगों के लिए नजीर है जो प्यार के नहीं मिल पाने पर अपना बाकी समय रोते हुए या फिर शराब के नशे में गुजार देते हैं। मायूसी की चादर तानकर सालों कुछ भी नहीं करते।
किसी का प्यार बड़े नसीब से मिलता है पर अगर जिसे आप प्यार करते हैं वह आपकी जिंदगी में नहीं पाया तो उसकी याद में आप जीवन को और बेहतर ढंग से जी सकते हैं। देव साहब ने यही किया। उन्होंने एक से बढ़कर एक बेहतरीन फिल्में बनाईं। 80 से साल से अधिक की उम्र में भी उनका जोश की नौजवान की तरह ही कायम है। उनके उपर किसी भी तरह की निराशा नहीं देखी जा सकती है।
देव साहब ने कहा कि कुछ साल पहले जब सुरैय्या की मौत हुई तो वे उसके जनाजे में शामिल होनेके लिए नहीं गए। देव साहब के अनुसार किसी के प्रति अपने दुख का सार्वजनिक प्रदर्शन करने में उनकी कोई आस्था नहीं है। वे ऐसे वक्त में अकेले में रोना पसंद करते हैं। जी हां हर मजबूत आदमी भी अकेले में रोता है पर सार्वजनिक स्थलों पर अपने व्यक्तित्व में मजबूती दिखाता है। यही उसकी सफलता का बहुत बड़ा कारण होता है। अगर आप किसी को प्यार करते हैं और वह नहीं मिलता है तो उसकी याद में आप जीवन में हमेशा कुछ नए नए सृजन कर सकते हैं। जरा कल्पना कीजिए आपने किसी को किसी खास वक्त में प्यार किया हो। वह किसी कारण से आपको नहीं मिल पाया हो तो क्या आप उसकी याद में रोते हुए मिलें। जीवन को एक असफल व्यक्ति की तरह जीएं तो आपका प्यार जीवन के किसी मोड़ पर आपको दुबारा मिले तो क्या वह आपको देखकर वह खुश हो सकेगा।
आप यह मानकर चलें कि- तुमसे मिला था प्यार कुछ अच्छे नसीब थे। प्यार के उन सुंदर दिनों को याद करके आप शेष जीवन को और भी सुंदर बनाने की कोशिश में लग जाएं। जिन लोगों को जीवन में प्यार कभी आता है वह भले ही थोड़े वक्त के लिए आए उसको याद करके सारी जिंदगी काटी जा सकती है। जिंदगी में बड़े काम किए जा सकते हैं। शोख जवानी जार दिनों की मेहमान थी। छोड़कर दिल में यादों का संगीत गई।
जो लोग काम करना चाहते हैं उनके लिए यह जिंदगी बहुत बड़ी है। वे उपलब्धियों का अंबार लगा देते हैं जो नहीं करना चाहते वे सालों बैठकर जिंदगी को कोसते रहते हैं। जीवन में प्यार का मिल जाना ही सबकुछ नहीं होता यह महत्वपूर्ण है कि आपने अपने प्यार से क्या सीखा।

 - विद्युत प्रकाश vidyutp@gmail.com


Wednesday, 17 June 2009

गरीबों को कर्ज देने में खतरा नहीं

आमतौर पर बैंक गरीबों को कर्ज देने में डरते हैं। पर आपको यह जानकर अचरज होगा कि गरीब लोग कर्ज चुकाने में अमीरों की तुलना में ज्यादा ईमानदार होते हैं। बंग्लादेश के ग्रामीण बैंक जिसके संस्थापक को इस साल नोबल पुरस्कार मिला है, उनका बैंक अत्यंत गरीब लोगों को को बिना कुछ गिरवी रखे ही कर्ज देता है और उनके बैंक की कर्ज वसूली का प्रतिशत 98 फीसदी तक है। वहीं भारत में कई बड़े बैंक जिन्होंने बड़े उद्योगों को भी कर्ज दे रखा 5 से 10 फीसदी तक एनपीए (नान प्रोड्यूसिंग एसेट) के संकट से जूझ रहे हैं। हम यह मान सकते हैं कि कर्ज लेने वाले के चुकाने में उसकी नीयत ज्यादा महत्व रखती है बजाय के उसकी चुकाने की क्षमता के। आजकल बैंक मकान ऋण बहुत आसानी से दे रहे हैं। पर मकान ऋण के मामले में डिफाल्टर के केस खूब हो रहे हैं।

मोहम्मद यूनुस जो बंग्लादेश के जाने माने अर्थशास्त्री थे के मन में गरीब लोगों का महाजनों और साहूकारों से शोषण नहीं देखा गया और उन्होंने गरीबों को कम ब्याज पर कर्ज देने के लिए बंग्लादेश में ग्रामीण बैंक की स्थापना की। यह बैंक ग्रामीणों के लिए स्व सहायता समूहों का निर्माण करवाता है। इस समूह को बैंक कर्ज देता है। यानी कर्ज चुकाने का भार किसी एक व्यक्ति पर न होकर कई लोगों पर होता है इसलिए लोग एक दूसरे को कर्ज की किस्त देने के लिए तैयार करते रहते हैं। भारत में भी ग्रामीण बैंकों ने इसी माडल से प्रभावित होकर देशभर में एक खास तरह के पेशे से जुड़े हुए लोगों के लिए स्व सहायता समूह बनाने पर जोर देना आरंभ किया है। हालांकि ये समूह यहां इतने लोकप्रिय नहीं हो पा रहे हैं। पर ऐसे समूह की उपयोगिता जिन लोगों ने समझ ली है उन्हें इसका लाभ होता हुआ दिखाई दे रहा है। जिन पेशेगत श्रमिकों ने स्व सहायता समूह का मतलब समझ लिया है वे उसका पूरा लाभ उठा रहे हैं। गांव में खेती करने वाले लोग भी इस तरह का समूह बना रहे हैं।
वास्तव में बैंक का कर्ज अगर न चुकाया जाए तो नासूर बन जाता है। बहुत कम ऐसे मामले होते हैं जिसमें लोग बैंक का कर्ज लेकर फरार हो पाते हैं। बैंक भी अपने पैसे को वसूल करने के लिए तमाम जुगत उठाता है। पर बैंक चाहता है कि पहले सब कुछ समझौते से ही निपट जाए क्योंकि मुकदमेबाजी में बैंक का भी काफी रुपया और मैनपावर खर्च होता है। पर छोटे कारोबारियों को छोटे छोटे कर्ज देने को लेकर बैंकों में कभी उत्सह नहीं रहा है। अगर हम किसी ऐसे व्यक्ति को छोटा सा कर्ज देते हैं जो इस राशि से रोजगार कर लेता है तो यह उसके के लिए बहुत बड़ी आर्थिक सहायता के साथ समाजसेवा जैसा पुण्य कार्य भी होता है। बंग्लादेश का ग्रामीण बैंक कुछ इसी तरह का कार्य करता है। यह माइक्रोफाइनेंस की अवधारणा है। भारत में इस अवधारणा को लेकर विक्रम आकुला ने काम किया है। उन्होंने आंध्र प्रदेश की गरीब महिलाओं को को छोटे छोटे कर्ज दिए हैं। इससे इन महिलाओं के जीवन स्तर में काफी बदलाव आया है। विक्रम आकुल को उनके कार्यों के लिए मैग्सेसे पुरस्कार से नवाजा गया है। हम यों कहें तो विक्रम आकुल और मोहम्मद युनुस जैसे लोगों को अंधकार को धिक्कारने के बजाय एक दीपक जलाने का काम किया है। उनके प्रयासों से सबसे निचली श्रेणी के लोगों के जीवन स्तर में आशा की एक रोशनी दिखाई दी है। अब कई लोग उनके प्रयासों को अपने यहां लागू करने की कोशिश कर रहे हैं।



Sunday, 17 May 2009

म्युचुअल फंड में निवेश कर करें कर बचत


अगर आप आयकर में राहत चाहते हैं तो पीपीएफ या एनएससी जैसे परंपरागत साधनों के बजाय म्युचुअल फंड के इएलएसएस ( इक्विटी लिंक्ड सेविंग स्कीम)के बारे में भी सोच सकते हैं। ये आकर्षक रिटर्न देते हैं। जब आप डाकघर या बैंक की बचत योजना में निवेश करते हैं तो आपका रुपया आठ साल के लिए ब्लाक हो जाता है जबकि इक्वीटी में आपका रुपया तीन साल बाद निकाला जा सकता हैयानी यहां तीन साल का लाक इन पीरियड होता है।


डाकघर से बेहतर निवेश- मान लिजिए आप पीपीएफ खाते में निवेश करते हैं तो आपको आठ फीसदी सालाना की दर से ब्याज मिलता है। वहीं राष्ट्रीय बचत पत्र में अधिकतम ब्याज की राशि 8.14 फीसदी तक होती है। साथ ही इसमें निवेश के तरीके भी सीमित ही हैं। पर आपको म्युचुअल फंड के इक्विटी में निवेश के लिए तमाम विकल्प मौजूद हैं। अधिकांश म्युचुअल फंड कंपनियों के पास कई टैक्स सेविंग प्लान मौजूद हैं। आप किसी पुराने प्लान में निवेश कर सकते हैं वहीं आप किसी नए फंड आफर (एनएफओमें भी निवेश कर सकते हैं। एनएफओ में आपको 10 रुपए का यूनिट सम मूल्य पर ही प्राप्त होता है जबकि पुराने फंडों में आपको यूनिट बाजार मूल्य यानी नव (नेट एसेट वैल्यूपर खरीदना होगा। अक्सर एनएफओ में निवेश फायदे का सौदा साबित होता है। आमतौर पर कोई भी एनएफओ तीन साल की अवधि में दुगुना या अधिक जरूर हो जाता है। अगर हम इस साल देंखे तो अगस्त में खुला रिलायंस का टैक्स सेवर फंड अभी 14 रुपए से अधिक का हो गया है। यानी चार महीने में 40 फीसदी की वृद्धि। यहां हम आपको दो लोकप्रिय इएलएसएस का उदाहरण देना चाहेंगे। फ्रैंकलिन टैक्सशील्ड प्लान जो 1999 में खुला था आज 122रुपए यूनिट के आसपास है। यानी 90 फीसदी से भी ज्यादा ग्रोथ। इसी तरह बिड़ला का 96 प्लान आज 200 रुपएके करीब पहुंच गया है।
अब इन प्लान की तुलना आप पीपीएफ या एनएससी से करें। किसी व्यक्ति ने बिड़ला के टैक्स सेवर प्लान में 1996 से लगातार 1000 रुपए मासिक निवेश आरंभ किया होगा तो अभी तक वह 1.30 लाख रुपए निवेश कर चुका होगा। 8 फीसदी ग्रोथ से यह राशि 3 लाख रुपए के आसपास घूम रही होगी। जबकि यही राशि बिड़ला सनलाइफ के प्लान में 14 लाख रुपए से ज्यादा हो चुकी होगी।

योजना बद्ध तरीके से करें टैक्स बचत- आप किसी भी वित्तीय वर्ष में टैक्स के लिए सेविंग की योजना बनाएं मान लिजिए आपको साल में 60 हजार रुपए बचत के लिए निवेश करने की जरूरत है तो आप पांच हजार रुपए मासिक की दर से हर माह निवेश किया करें। इससे आपको वित्तीय वर्ष के आखिरी महीनों यानी फरवरी और मार्च में परेशान नहीं होना पड़ेगा जो लोग प्लानिंग नहीं करते उन्हें अक्सर मार्च महीने का वेतन टैक्स सेविंग और कटौती के बाद शून्य ही प्राप्त होता है। जब इएलएसएस में बचत की योजना बनाएं तो फंड का चयन सोच समझ कर करें। पुरानी कहावत है कि सभी अंडों को एक ही टोकरी में नहीं रखना चाहिए ठीक उसी तरह अपने रुपए को अलग फंडों में लगाएं। मान लिजिए आपके 30 हजार रुपए हैं तो उन्हे 10 हजार के अलग अलग तीन फंडों में निवेश करें।
यह मान कर चलें कि म्युचुअल फंड और शेयर बाजार में निवेश जोखिम भरा होता है। इसलिए यहां गारंटिड रिटर्न की उम्मीद नहीं है। प्रदर्शन उम्मीद से बेहतर भी हो सकता है तो खराब भी। इसलिए आप जोखिम सोच समझ कर ही उठाएं। 


- vidyutp@gmail.com
  (MONEY, MUTUAL FUNDS ) 

गांव में बनाएं आशियाना

मुंबई के एक अखबार ने एक विज्ञापन छापा है। सिर्फ आठ लाख रुपए में गांव में खरीदें अपना घर। उसके साथ पाएं खेती करने के लिए थोड़ी सी जमीन भी। यानी अब कई बिल्डर आपको गांव में मकान बना कर दे रहे हैं। यह इस बात का सूचक है कि काफी लोग अपने सूकून भरे दिन अब गांव में गुजारना चाहते हैं। इनमे वैसे लोग भी शामिल हैं जिन्होंने कभी गांव नहीं देखा हो। ऐसे तमाम लोगों को मिलाकर एक नए गांव का निर्माण हो रहा है। यह आपके सपनों का गांव भी हो सकता है।
शहर के अपार्टमेंट में बालकोनी पर लटके हुए वक्त गुजारने के अच्छा है कि गांव में आपका घर हो और उसमें एक छोटी सी फुलवारी भी हो। अगर यह गांव शहर के पास ही हो तो क्या कहना। जब आपके पास अपनी कार हो तो जब चाहे आधे घंटे में शहर की ओर पहुंच जाइए। जब चाहे फिर गांव की ओर वापस। इसलिए कई लोगों के जेहन में अब यह ख्याल आ रहा है कि गांव में रहे तो अच्छा हो। अगर गांवों को योजनाबद्ध तरीके से बसाया गया हो तो बात ही क्या है।
फिलहाल गांवों में खुली हवा होती है घर भी होते हैं पर आम तौर घर बनाते वक्त शहरों जैसी प्लानिंग नहीं की जाती है। पंजाब के कई गांवों आर्किटेक्ट की मदद से योजना बनाकर घर बनाते देखा जा सकता है। आमतौर पर यह देखा गया है कि गांवों में लोगों के पास जमीन की कोई कमी नहीं होती इसलिए लोग अपनी जरुरत के हिसाब से घर में विस्तार करते जाते हैं। अगर यही घर योजनाबद्ध तरीके से बनाए जाएं तो इसके कई फायदे हो सकते हैं। इसलिए अब अगर आप आप अपने गांव के घर को भी नया रूप देने के मूड में हैं तो उसका नक्सा किसी वास्तुकार से बनवा लें तो अच्छा रहेगा। गांव के घर में रेनवाटर हार्वेस्ट सिस्टम लगवाया जा सकता है। इसके साथ ही सोलर लाइटिंग सिस्टम लगवाने पर भी विचार किया जा सकता है। मोटर गैराज और गोबर गैस प्लांट पर भी विचार कर सकते हैं।
बैंक लोन भी - अगर आप गांव में घर बनवाने के लिए कर्ज लेना चाहते हैं तो उसके लिए भी कई बैंक हाउसिंग लोन देने को तैयार बैठे हैं। इसमें आईसीआईसीआई बैंक से बात करते हैं वह गांवों के घर के निर्माण के लिए खास तौर पर कर्ज दे रहा है। इसके अलावा जिस बैंक के आप पुराने ग्राहक हैं वहां भी कर्ज लेने के लिए बातचीत कर सकते हैं।
रूरल हाउसिंग प्रोजेक्ट - कई राज्यो में गांवों में योजना बद्ध तरीके से सेक्टरों का विकास किया जा रहा है। हरियाणा में 10 हजार से अधिक आबादी वाले गांवों में हाउसिंग डेवलपमेंट आथरिटी सेक्टरों का निर्माण करने जा रही है। इसमें लोग अपने घर नियोजित तरीके से बना सकेंगे।
अब अगर को ई यह दंभ भरता है कि वह शहर में रहता है तो यह कहीं से भी कोई गौरव की बात नहीं है। लोगों को यह पता चल गया है कि शहरी जीवन के क्या क्या नुकसान है। सबसे बड़ा नुकसान तो यही है कि वहां शुद्ध हवा तक नहीं मिलती। ऐसे में गांव में रहने के अपने फायदे हैं। दिल्ली व मुंबई में हजारों ऐसे लोग हैं जो अपने ही शहर में रहते हुए रोज दफ्तर आने जाने में 2+2 चार घंटे गुजार देते हैं। आप दिल्ली मुंबई के कई कोने से आसपास के किसी गांव में भी एक या दो घंटे में जा सकते हैं। यहां गांव में रहकर आप जो सुकुन और आराम महसूस कर सकते हैं वह शहरों में नहीं मिल सकता है। आजकल कई ऐसी बीमारियां भी हैं जो शहरों को लोगों को ही ज्यादा होती हैं। इसलिए आप बेहतर जीवन के लिए किसी गांव में जाने के बारे में सोच सकते हैं।

Tuesday, 31 March 2009

मेरी पसंद की कुछ शायरी...

कुछ मेरी पसंद के पंक्तियां हैं आप भी पढ़िए... 

पुण्य हूं न पाप हूं
जो भी हूं
अपने आप हूं
अंतर देता दाह
जलने लगता हूं
अंतर देता राह
चलने लगता हूं
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ये माना की गुलशन लूटा
और नशेमन जला
फिर भी कुछ तो बाकी
निशां रह गया
तिनके तिनके चुनकर
फिर बना लेंगे आशियां
हौशला गर जो हमारा जवां रह गया
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काम कुछ अच्छे कर लो अच्छी जिंदगानी आपकी
लोग भी कुछ कहें , लोग भी कुछ सुनें कहानी आपकी

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मैं रोया परदेस में भीगा माँ का प्यार
दुख ने दुख से बात की
बिन चिठ्ठी बिन तार
छोटा करके देखिये जीवन का विस्तार
आँखों भर आकाश है बाहों भर संसार

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ए मेरे दोस्त जब घर जाना अपने याद दिलाना मेरी करना एक निवेदन
उनके कल के लिए हमने अपना आज किया समर्पण।
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गति प्रबल पैरों में भरी
फिर क्यों रहूं दर दर खडा
जब आज मेरे सामने है रास्ता इतना पडा
जब तक न मंजिल पा सकूँ,
तब तक मुझे न विराम है, चलना हमारा काम है ।

(( - डा. शिवमंगल सिंह सुमन))
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हुआ सवेरा ज़मीन पर फिर अदब से आकाश अपने सर को झुका रहा है
कि बच्चे स्कूल जा रहे हैं
नदी में स्नान करने सूरजसुनारी मलमल की पगड़ी बाँधे
सड़क किनारे खड़ा हुआ मुस्कुरा रहा है
कि बच्चे स्कूल जा रहे हैं
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कालरात्रि के महापर्व पर अँधकार के दीप जल रहे
भग्न हृदय के दु:खित नयन मेंआँसू बनकर स्वप्न ढल रहे
मानवता के शांति दूत तुम
प्रीति निभाना छोड़ न देना
दीप जलाना छोड़ न देना
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आसमां आस लिए है कि ये जादू टूटे
चुप की जंजीर कटे वक्त का दामन छूटे
दे कोई शंख दुहाई कोई पायल बोले
कोई बुत जागे कोई सांवली घूंघट खोले ( फैज अहमद फैज )

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सातों दिन भगवान के क्या मंगल क्या पीर
जिस दिन सोए देर तक भूखा रहे फ़कीर
अच्छी संगत बैठकर संगी बदले रूप
जैसे मिलकर आम से मीठी हो गई धूप
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यूं तो हर दिल किसी दिल पर फिदा होता है
प्यार करने का मगर तौर जुदा होता है
आदमी लाख संभले गिरता है मगर
झुककर जो उसे उठा ले खुदा होता है...
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जब अंधेरा घना छाने लगा
तब प्रकाश की चिंता सताने लगी
तब एक छोटा सा नन्हा सा दीपक आगे आया
और बोला मैं लडूंगा प्रकाश से...
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महफिल में हंसना मेरा मिजाज़ बन गया
तन्हाई में रोना राज़ बन गया
दर्द को चेहरे से ज़ाहिर ना होने दिया
यही मेरे जीने का अंदाज़ बन गया ...
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यह न सोचो कल क्या हो
कौन कहे इस पल क्या हो
रोओ मत न रोने दो
ऐसा भी जल थल क्या हो
बहती नदी की बांधे बांधे
चुल्लू में हलचल क्या हो
रात ही गर चुपचाप मिले
फिर सुबह चंचल क्या हो
आज ही आज की कहें सुने
क्यों सोचें कल क्या हो। ( मीना कुमारी )
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मुस्कुराके जिनको गम का जहर पीना आ गया
ये हकीकत है जहां में उनको जीना आ गया
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आहों के नगमें अश्कों के तारे
कितने हसीं हैं ये गम हमारे
एक छोटा सा दिल
और उल्फत की ये दौलत
क्या कोई जीते
क्या कोई हारे..
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जिंदगी है बहार फूलों की
दासंता बेशुमार फूलों की
तुम क्या आए तसव्वुर में
आई खुशबू हजार फूलों की

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हरेएक खुशी हजार गम के बाद मिलती है
दीए की रोशनी जलाने के बाद मिलती है
मुश्किलों में घबराके सिसकने वालों
चांदनी रात अंधेरे के बाद मिलती है।
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सृष्टि बीज का नाश न हो
हर मौसम की तैयारी है
कल का गीत लिए होठों पर
आज लड़ाई जारी है
(( महेश्वर ))

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अजनबी शहर के अजनबी रास्ते
मेरी तन्हाई पर मुस्कुराते रहे
मैं बहुत दूर यूं ही चलता रहा
तुम बहुत दूर यूं ही याद आते रहे...
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राहों पे नजर रखना
होठों पर दुआ रखना
आ जाए शायग कोई
दरवाजा खुला रखना

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समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याघ।
जो तटस्थ है, समय लिखेगा उनका भी अपराध।।
( रामधारी सिंह दिनकर )

Tuesday, 24 March 2009

बंद करो ये सरकस

आईपीएल का सर्कस अब दक्षिण अफ्रीका मे होगा, यह अच्छा ही हुआ..वैसे आईपीएल –सीजन 2 टल जाता तो और भी अच्छा होता। सबसे बड़ा सवाल यह है कि देश में चुनाव ज्यादा जरूरी है या फिर आईपीएल के मैच। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के सबसे बड़े चुनाव के लिए देश की सेना मुस्तैद रहेगी ऐसे में जाहिर है कि आईपीएल में दुनिया भर से आने वाले क्रिकेटरों के लिए सुरक्षा देना मुश्किल होता। ऐसे में कई राज्यों का मैच कराने से इनकार करना सही कदम था।
सिर्फ सुरक्षा का मुद्दा नहीं
लेकिन सवाल सिर्फ सुरक्षा का नहीं है कि चुनाव के समय में आईपीएल जैसे मैच कहीं भी नहीं होना चाहिए। सब जानते हैं कि भारत में क्रिकेट में लोगों की रूचि ज्यादा रहती है। चुनाव के समय में मैच होने पर जाहिर सी बात है लोग वोट डालने में कोताही कर सकते हैं। मैच को लेकर लोग टीवी से ज्यादा चिपके रहे तो लोकतंत्र के इस महायज्ञ में हवन में लोग आहुति नहीं डाल पाएंगे।

प्राथमिकता तय करें
अब हमें ये सोचना होगा कि हमारे लिए प्राथमिकता क्या होनी चाहिए। अच्छे नेता चुनकर संसद में भेजना, केंद्र में अच्छी सरकार बनवाना या फिर बैठकर टीवी पर मैच देखना....वोटरों को जादरूक करने के लिए देश भर में अभियान चलाए जा रहे हैं और पप्पू नहीं बनने की सलाह दी जा रही है। ऐसे में अगर चुनाव के दौरान आईपीएल के मैच होते रहे तो वोट न डालने वाले पप्पूओं की संख्या में इजाफा हो सकता है। मैच के कारण वोट डालने कि लिए जागरूक करने वाले अभियान पर बुरा असर पड़ना स्वभाविक है।

देश पहले क्रिकेट बाद में
साल भर सरकार की निंदा करने वाली युवा पीढी अगर क्रिकेट से चिपकी रही तो जाहिर है कि देश की आर्थिक नीति बनाने, आम आदमी के जीवन को समुन्नत बनाने के सरकारी प्रयासों पर बुरा असर पड़ सकता है। ऐसे में हमें चुनाव के दौरान आईपीएल जैसी नाटकबाजी का पूरी तरह बहिष्कार करना चाहिए। नाटकबाजी इसलिए मैं कह रहा हूं कि 20-20 मैच कोई खेल है ही नहीं....यह सिर्फ नाटक हैं जहां चीयर लीडर्स को नचाया जाता है...अगर मेले में चलने वाले कैबरे डांस को बंद करने की बात कर रहे हैं तो चीयर लीडर्स को नचाने वाले खेल को खेल कैसे कहा जा सकता है।

-विद्युत प्रकाश मौर्य

Tuesday, 17 March 2009

अब गरीब भी बन गया है ब्रांड

भले ही लोग महंगाई का रोना रो रहे हैं हो पर बाजार अभी भी उत्पादकों को चीजों को सस्ते में बेचनेकी होड़ लगी है। अभी हाल में नेसकैफे ने अपनी काफी का एक रुपए का पाउच जारी किया है। अगर आपको एक कप काफी पीनी हो तो एक रुपए खर्च कीजिए पाउच लाइए और काफी पीजिए।
कमाल एक रुपए का- ठीक इसी तरह बाजार में एक रुपए के शैंपू और एक रुपए वाशिंग पाउडर के कई ब्रांड मौजूद हैं। अगर हम कई साल के पुराने परिदृश्य को याद करें तो तब अगर कोई शैंपू करना चाहे तो उसे डिब्बा ही खरीदना पड़ता था यानी गरीब या मजदूर वर्ग के व्यक्ति के लिए शैंपू का इस्तेमाल करना एक लक्जरी वाली बात हो सकती थी। पर अब अब कोई भी एक रुपए का पाउच खरीद कर बालों में इस्तेमाल कर लेता है। इसी तरह पाराशुट नारियल तेल और कई अन्य प्रोडक्ट भी एक रुपए में मौजूद है। इस कारोबार से जहां कंपनियों की बिक्री में इजाफा हो रहा है वहीं उनके प्रोडक्ट के उपयोक्ता निचले तबके के लोग भी हो रहे हैं। बहुत सी बड़ी कंपनियों की नजर गरीब लोगों पर है जो उनके उपभोक्ता हो सकते हैं। चाय पत्ती के पाउच भी एक, दो और पांच रुपए के उपलब्ध हैं। और तो और ब्रिटानिया और पारले जी अपने बिस्कुटों के भी एक रुपए के पैक निकाले हैं। इसलिए आप यह नहीं कह सकते हैं कि भला आज के जमाने में एक रुपए में क्या मिलता है। आज भी एक रुपए में बहुत बड़ी ताकत है। आप एक रुपए में नहा सकते हैं बालों को ठंडक का एहसास करा सकते हैं चाय काफी की चुस्की ले सकते हैं तो थोड़ी सी पेटपूजा भी कर सकते हैं। कई नामचीन वाशिंग पाउडर कंपनियां अभी भी एक रुपये का पाउच निकाल रही हैं।
कमाल पांच रुपए का - पांच रुपए में तो कई कंपनियों में कई उत्पादों को बेचने की होड़ लगी है। कई एफएमसीजी कंपनियां अपने उत्पादों का पांच रुपए का पैक निकाल रही हैं। कई प्रोडक्ट जो मंहगे हो गए थे उन कंपनियों ने दुबारा से कम वजन का पांच रुपए का पैक निकाला है। पांच रुपए का टूथपेस्ट, पांच रुपए का वाशिंग पाउडर, पांच रुपए का को ल्ड ड्रिंक तो पांच रुपए का साबुन बाजार में उपलब्ध है। सर्दियों में इस्तेमाल किए जाने वालेा कोल्डक्रीम व वैसलीन जैसे उत्पाद अभी भी पांच रुपए का पैक निकाल रहे हैं जो धुआंधार बिकते हैं। वहीं बोरो प्लस ने भी पांच रुपए का पैक अपने उपभोक्ताओं के लिए निकाला है। टीवी पर एक रुपए दो रुपए और पांच रुपए में मिलने वाले प्रोडक्ट के विज्ञापनों की भरमार है। यह सब कुछ निम्न मध्यम वर्ग के उपभोक्ताओं को ध्यान में रखकर किया जाता है जो एक समय में ज्यादा रुपए का उत्पाद नहीं खऱीद सकता है। एक,दो और पांच रुपए की यूनिट वाले उत्पाद वे लोग भी खरीद सकते हैं जो रोज 70 से
100 रुपए दैनिक कमा पाते हैं। वहीं ज्यादा आय के लोग भी जो किसी प्रोडक्ट को एक बार या दो बार उपयोग करने के लिए लेना चाहते हैं उनके लिए पाउच पैकिंग वरदान के रुप में मिली है।
यानी जिन्हें हम गरीब समझते हैं वह भी कई तरह के उत्पादों का बड़ा उपभोक्ता है। कंपनियां अब इस गरीब आदमी को ब्रांड मानकर उसके लिए कई तरह के उत्पाद पेश करने में लगी हुई हैं। जिन कंपनियों ने इस मूल मंत्र को नहीं समझा है वे मार्केटिंग के इस दौर में पिछड़ रही हैं। वहीं जागरूक कंपनियां दरिद्रनारायण को भी उपभोक्तावाद में उलझाने में कोई कसर नहीं छोड़ रही हैं।



समलैंगिकता की वकालत

कुछ बुद्धिजीवियों ने भारत में भी समलैंगिकता को कानूनी जामा पहनाने की वकालत की है। इसके लिए हस्ताक्षरित पत्र राष्ट्रपति को भी लिखा गया है। इतना ही नहीं एड्स जैसी बीमारी के लिए काम करने वाली संस्था नाको ने भी इसके समर्थन में अभियान छेड़ दिया है।

 नाको के एक आंकड़े के अनुसार देश में 24 लाख से ज्यादा ऐसे लोग हैं जो समलैंगिक हैं। नाको के अनुसार वह सिर्फ छह लाख लोगों को ही कवर कर पाया है बाकि लोगों तक पहुंचने के लिए उसे काफी समय चाहिए। नाको भी चाहता है कि भारत में समलैंगिकता को कानूनी मान्यता दे दी जाए। पर अहम सवाल यह उठता है कि क्या भारत जैसे देश में समलैंगिकता को मान्यता देना कितना उचित होगा। देश में बुद्धिजीवियों का एक बड़ा वर्ग इसके पक्ष में है। दुनिया के कई देशों में समलैंगिकता के पक्ष में बयार बह रही है। कई देशों में तो गे परेड और उनके अलग से फैशन शो भी आयोजित किए जाते हैं। अमेरिका में ऐसे लोग भी कानूनी मान्यता की लड़ाई लड़ रहे हैं।
पर भारत जैसे देश में यह बड़े बहस का विषय है। हालांकि यह भारत की परंपरा नहीं रही है। कुछ राज्यों में कुछ लोगों के बीच इस तरह के किस्से जरूर सुने जाते हैं।


 कुछ साल पहले वरिष्ठ पत्रकार तवलीन सिंह ने बिहार के बक्सर जिले के आसपास के ऐसे कुछ मामलों पर अध्ययन किया था। उन्होंने यह स्थापित करने की कोशिश की थी समाज में इस तरह के रिश्ते चल रहे हैं। इतिहास में यह देखने में आया है कि मुगल आक्रमण कारियों की फौज में ऐसे लोग रहते थे जिनसे सरदार समलैंगिक रिश्ते बनाता है। पर किसी भी समाज में जब ऐसे रिश्तों को मान्यता देने का कानून बनाएं तो उससे पहले हमें इस विषय पर सूक्ष्मता से विचार करना होगा। इसका समाज पर कितना बुरा प्रभाव पड़ेगा। भारत में अगर इस तरह के रिश्ते कहीं बनते हैं तो भी लोग उसको सार्वजनिक तौर पर प्रकट नहीं करना चाहते। मनोवैज्ञानिक समलैंगिक संबंधों को एक मानसिक विकृति ही मानते हैं। जबकि समलैंगिक संबंधों के पैरोकार इसे एक समान्य तौर पर लेना चाहते हैं।
इधर मुंबई की फिल्म इंडस्ट्री में इस विषय पर कई फिल्में भी बनने लगी हैं। पिछले साल की हिट फिल्म पेज 3 में इस तरह के संबंधों को दिखाया गया है। इसमें फिल्मी हीरो तथा समाज के रईस लोगों को इस तरह के संबंध में लिप्त दिखाया गया है। वहीं अमोल पालेकर ने इस पर एक फिल्म बनाई है क्वेस्ट। इस फिल्म में भी हीरो के अपनी पत्नी के अलावा अपने एक दोस्त से समलैंगिक संबंध दिखाए गए हैं। एक ऐसा विषय जिस पर लोग बात नहीं करना चाहते उस पर अब कहानियां भी लिखी जाने लगी है और फिल्में भी बनने लगी हैं। हिंदी के प्रख्यात साहित्यकार दूधनाथ सिंह की लंबी कहानी नमो अंधकारम में समलैंगकता के तत्व थे तो उससे काफी पहले पांडेय बेचन शर्मा उग्र के उपन्यास चाकलेट में भी इस विषय को उठाया गया था।

समलैंगिकता के पैरोकार इंडियन पीनल कोड की धारा 377 को हटाने की बात कर रहे हैं जिसके तहत समलैंगिक संबंधों को अपराध माना गया है। पर इसी धारा के तहत अगर कोई व्यक्ति किसी बच्चे के साथ कुकर्म करता है तो उसे सजा देने का प्रावधान है। अब अगर दो व्यक्ति अपनी मर्जी से इस तरह का संबंध बनाते हैं तो उन्हें सजा मिलनी चाहिए या नहीं यह चर्चा का विषय हो सकता है। पर इस तरह के रिश्तों को अगर कोई सार्वजनिक करता है तो उसका समाज पर कतई अच्छा प्रभाव नहीं पड़ता है। इसलिए ऐसे संबंधों पर परदा रखना ही उचित है।
-विद्युत प्रकाश vidyutp@gmail.com




Monday, 23 February 2009

सोना कितना सोना है

सोना खरीदना और पहनना है भारत के लोगों का प्रिय शगल है। सदियों से सोना खरीदने पहनने और उसे बुरे दिनों के लिए संभालकर रखने की भारत के लोगों की मानसिकता है। पर क्या आपको मालूम है कि आपके पास जो सोना है वास्तव में वह कितना खरा है। क्या आपके खानदानी सुनार ने आपको अगर कोई सोने का गहना 22 कैरेट का कहकर दिया है तो वास्तव में वह 22 कैरेट ही है। आप अपनी कमाई का बहुच बड़ा हिस्सा सोना खरीदने पर लगाते हैं तो आपको इसकी शुद्धता को लेकर जागरुक होना ही चाहिए।


नब्बे फीसदी तक अशुद्ध- आपको यह जानकर अचरज होगा कि सरकार की जांच में पाया गया है कि जो सोना आप खरीदते हैं वह 90 फीसदी तक अशुद्ध हो सकता है। भारतीय मानक ब्यूरो द्वारा किए गए एक सर्वे में पाया गया है कि देश के अधिकांश हिस्सो में ज्वेलरों द्वारा बेचा जाने वाला सोना शुद्धता के पैमाने पर खरा नहीं उतरता है। कई शहरों में 20 से 30 फीसदी तो कई शहरों में 90 फीसदी तक सोना अशुद्ध पाया गया है। अगर आप किसी सुनार से कोई गहना बनवाते हैं तो वह आपको 22 कैरेट कहकर कोई स्वर्ण आभूषण देता है तो वह कुछ सालों बाद उतनी मात्रा में सोना वापस लेने की गारंटी देता है। यह गारंटी कोई वास्तविक गारंटी नहीं है। अगर एक सुनार का बेचा हुआ सोना किसी दूसरे शहर का भी सुनार उतनी ही शुद्धता बताकर खरीद ले तब उसे ईमानदार सौदा माना जा सकता है। पर अधिकांश सुनार बेइमान का कारोबार सदियों से करते आ रहे हैं।
कैसी हो सोने की शुद्धता - सोना 24 कैरेट में अपने शुद्ध फार्म में माना जाता है। पर बिल्कुल शुद्ध सोना में कोई गहना नहीं बनाया जा सकता है। इसलिए उसमें कुछ फीसदी चांदी, तांबा या जिंक मिलाया जाता है। इस मिलावट के स्तर को कैरेट में मापते हैं। इसको आम भाषा में यूं समझा जाए कि किसी चीज को 24 हिस्से में बांट दिया गया तो अगर इसमें एक हिस्सा मिलावट है तो वह 23 कैरेट का सोना होगा। अगर इसे फीसदी में देखें तो 95.80 फीसदी शुद्धता होनी चाहिए। इसी तरह 22 कैरेट की शुद्धता 91.60 फीसदी होनी चाहिए।
21 कैरेट मे 87.50 फीसदी शुद्धता होनी चाहिए। इसी तरह 18 कैरेट में 75.00 फीसदी शुद्धता यानी इतना हिस्सा सोना होना चाहिए। 14 कैरेट के आभूषण में सोना 58.50 फीसदी और 9 कैरेट मे 37.50 फीसदी सोने का हिस्सा होना चाहिए। इसलिए जब कभी आप सोना खरीदें तो उसकी शुद्धता के प्रति जरूर आश्वस्त हो लें। नहीं तो आप 22 कैरेट के नाम पर 16 से 17 कैरेट के आभूषण खरीदकर कर बेवकूफ बन सकते हैं।

कैसे मापी जाए शुद्धता- परंपरागत तौर पर सुनार कसौटी पर सोना को मापते हैं। यह तरीका पूरी तरह मानक नहीं है और इसमें ठगे जाने की भी संभावना ज्यादा है। अब सोने की जांच के लिए कई नए तरीके आ गए हैं। सबसे लोकप्रिय तरीका कैरेटोमीटर का है। पर अधिकांश सुनार कैरेटो मीटर नहीं लगाते हैं क्योंकि वे आपको शुद्ध सोना नहीं बेचना चाहते। अधिकांश सोना खरीदने वाले उपभोक्ताओं को कैरट के बारे में भी सही जानकारी नहीं होती।

सोने का कारोबार करने वाली टाटा समूह की कंपनी तानिष्क ने अपने देश भर के शो रूम में कैरेटो मीटर लगा रखा है। वहां आप कहीं और से भी खरीदे गए सोने की जांच करवा सकते हैं। वहीं आप तानिष्क से खरीदे जाने वाले सोने की शुद्धता की भी जांच कर सकते हैं। कैरेटो मीटर एक्सरे सिद्धांत पर काम करता है। यह सोने में मिलावट के स्तर को काफी शुद्धता से पकड़ लेता है।


आप खरा सोना ही खरीदें इसके लिए भारतीय मानक ब्यूरो ने शुद्ध सोने के ऊपर हालमार्क की व्यवस्था बनाई है। यह व्यवस्था सोने के खरीद फरोख्त में उपभोक्ता के साथ हो रही ठगी से निजात दिलाने के लिए की गई है। जैसे खाने पीने की वस्तुओं में एग मार्क की व्यवस्था है उसी तरह सोने की खरीद मे हालमार्क की व्यवस्था की जा रही है। सोने की हालमार्किंग के लिए देश भर मे लैब की स्थापना की गई है। वहीं आने वाले समय में तेजी से और भी लैब की स्थापना की जा रही है। सरकार चाहती है कि देश में 2008 के बाद सिर्फ हालमार्क किया हुआ सोना ही बेचा जाए। लगभग सभी प्रमुख शहरों में इस तरह की व्यवस्था आने वाले समय में लागू कर दी जाएगी। इसके लिए सरकार उपभोक्ताओं को बीच जागरुकता अभियान भी चला रही है। उपभोक्ताओं में जागरुकता को देखते हुए कई बड़े शहरों के ज्वेलरों ने हालमार्क किया हुआ सोना बेचना आरंभ भी कर दिया है। हालमार्क किया हुआ सोना थोड़ा महंगा हो सकता है पर सस्ते के चक्कर में अशुद्ध सोना खरीदना समझदारी नहीं है। अगर आप कम कीमत में ही गहने बनवाना चाहते हैं तो 18 कैरेट या 14 कैरेट में बने गहने खरीद सकते हैं। यहां तक की आप 9 कैरेट के गहने भी खऱीद सकते हैं। पर सोना जांच करवाकर ही खऱीदे हैं।
एमएमटीसी लि. - भारत सरकार की संस्था एमएमटीसी लि. सोने का कारोबार करती है। आमतौर पर विदेशी बाजार से सारा सोना एमएमटीसी के द्वारा ही भारत में आता है। एमएमटीसी खुद भी हालमार्क ज्वेलरी अपने शो रूम अथवा फ्रेंजाइजी के द्वारा बेचती है। एमएमटीसी ने सांची नाम से देश के प्रमुख शहरों में अपने शो रूम खोले हैं जहां सोने व चांदी के आभूषण खरीदे जा सकते हैं। एमएमटीसी के जिम्मे ही देश भर में सोने की शुद्धता के जांच के लिए हालमार्किंग लैब बनवाने की भी जिम्मेवारी है। इसलिए जब कभी आप सोना खरीदने की बात करें तो अपने ज्वेलर के हालमार्क की मांग जरूर करें। अगर वह कहता है कि हालमार्क किया हुआ आभूषण समान्य आभूषण से महंगा आ रहा है तो भी आप हां कहें। जिस गहने पर हालमार्क लगा हो उस पर हालमार्क का निशान उसकी शुद्धता का प्रतिशत और निर्माण का साल और निर्माता का कोड नंबर हैंड लेंस की सहायता से देखा जा सकता है। इसलिए इसको लेकर हमेशा जागरुक रहें।
कितने कैरेट का सोना खरीदें- कोई जरूरी नहीं है कि 23 या 24 कैरेट का सोना ही खरीदा जाए। आप कम मात्रा वाला भी ले सकते हैं। 23 कैरेट के आभूषण में लगभग 4 फीसदी मिलावट होती है। 24 कैरेट में डिजाइनर आभूषणों का निर्माण संभव नहीं है। भारत में लोगों में 22 कैरेट का सोना खरीदने की सर्वाधिक परंपरा है। 22 कैरेट यानी 91.60 फीसदी शुद्धता। पर कोई भी परंपरागत सुनार इतनी शुद्धता नहीं देता। आप 22 कैरेट के नाम पर 18 से 21 कैरेट का सोना खरीदें इससे तो अच्छा है कि आप सोचसमझकर 18 कैरेट ही खरीदें। इसकी कीमत 22 कैरेट से 15 फीसदी तक कम हो सकती है। वैसे दुनिया के कुछ प्रमुख सोना विशेषज्ञों का मानना है कि गहने हमेशा 18 कैरेट में ही बनवाना चाहिए। 18 कैरेट में गहने बनवाना सुविधाजनक है साथ ही 18 कैरेट का गहना 22 कैरेट की तुलना में मजबूत होता है। इससे टूटने की संभावना कम रहती है यानी यह लंबे समय तक चलेगा। अगर आप सिर्फ संभालकर रखने के लिए सोना खरीदना चाहते हैं 24 कैरेट का सोने का सिक्का खरीद सकते हैं। आजकल कई बैंक भी गारंटी के साथ ऐसा सोना बेच रहे हैं। यह 5 10 ग्राम में उपलब्ध है।
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