Saturday, 17 January 2009

ओरकुट बनाम लोकप्रियता और प्रतिबंध

दिल्ली के प्रमुख विश्वविद्यालय जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय और दिल्ली विवि ने गूगल के लोकप्रिय साइट ओरकुट पर प्रतिबंध लगा दिया है। इन यूनिवर्सिटियों में ओरकुट की वेबसाइट चलाने से काफी परेशानी आ रही थी। इससे नेटवर्क से जुड़े सारे कंप्यूटर धीमी गति से चलने लगते थे। ओरकुट कंप्यूटर पर चलने के दौरान ज्यादा स्पेश लेता है। यानी वह कंप्यूटर के रैम में ज्यादा जगह एक्वाएर करता है।

वास्तव में इंटरनेट पर सोशल नेटवर्किंग एक बड़े लोकप्रिय समाधान के रुप में उभर कर आया है। यह एक आभासी दुनिया का सृजन करता है जहां जाकर आप अपने लिए दोस्तों की तलाश कर सकते हैं। किसी जमाने में ऐसे दोस्त ढूंढना दुस्कर कार्य था। लोग पत्रमित्रता किया करते थे। अब दोस्ती करने का इंस्टेट तरीका बनकर उभरा है इंटरनेट। यहां आकर आप अपने विचारों से मिलते जुलते या जाति समाज से जुड़े हुए लोगों का समूह बना सकते हैं। यह पत्रमित्रता की तुलना में ज्यादा फास्ट तरीका है। इसमें आपका दोस्त दुनिया के किसी भी कोने में बैठा हुआ हो सकता है। इंटरनेट पर इस दोस्ती से काफी फायदे हो रहे हैं। कई लोग दोस्ती और बाद में शादी कर रहे हैं तो कई लोग अपने प्रोफेशन के लोगों से दोस्ती करके अपने कैरियर को भी संवार रहे हैं।
इंटरनेट पर ऐसे समूह के रुप में याहू ग्रूप काफी लोकप्रिय है। याहू के इमेल यूजर अपने विचारों से जु़ड़े हुए समूह का निर्माण कर सकते हैं। जैसे लाइब्रेरी साइंस पढ़ने वालों का समूह, पत्रकारों का समूह, किसी खास जाति बिरादरी के लोगों को समूह या फिर किसी खास विचार धारा के लोगों का समूह बनाया जा सकता है। हो सकता है आपकी विचार धारा के लोग दुनिया भर में कुछ सौ ही हों तो भी ऐसे लोग एक खास मंच पर एकत्र हो सकते हैं। आप अपने विचारों से जुड़े हुए समूह को इंटरनेट पर जाकर ढूंढ भी सकते हैं। याहू के ग्रुप के बाद गूगल ने इसी तरह के समूह ओरकुट को कुछ साल पहले ही लांच किया है। यह समूह दुनिया भर में तेजी से लोकप्रिय हो रहा है। छात्र और शिक्षक भी बड़ी संख्या में इस समूह के सदस्य हैं।
डीयू और जेएनयू में इस समूह के इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगने से वहां के छात्रों और शिक्षकों को परेशानी भी है। उनकी सोशल नेटवर्किंग को लगाम लग गई है। कोई भी संस्थान जब अपने सदस्यों को इंटरनेट के उपयोग करने की छूट देता है तो वह टर्मिनल पर कुछ भी करने की इजाजत नहीं दे सकता है। अगर सारे लोगों को ओरकुट खोलने से सिस्टम बाधित होता है तो ऐसे में संस्थान को कोई न कोई एहितयाती कदम तो उठाने ही पड़ेंगें। आजकल कई ऐसी वेबसाइट आ रही हैं जो उपयोग करने के दौरान ज्यादा जगह लेती हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय के कंप्यूटर सेंटर ने कई और वेबसाइटों को भी ब्लाक किया है। इसमें लोकप्रिय साइट यूट्यूब भी शामिल है। यू ट्यूब पर लोग अपने वीडियो जारी कर देते हैं। इन वीडियो को देखने में भी इंटरनेट कनेक्शन के ज्यादा बैंडविड्थ का इस्तेमाल होता है।
जेएनयू प्रशासन के अनुसार ओरकुट के इस्तेमाल से उन लोगों को परेशानी हो रही थी जो अपने शोध प्रबंधों पर काम कर रहे हैं। उनकी स्पीड कम हो जाती थी। हालांकि ओरकुट के इस्तेमाल करने वालों का दावा है कि यह साइट उनके अध्ययन में भी उपयोगी है क्योंकि इससे वे लोग अपने समान विचारधारा और पढ़ाई करने वालों के साथ विचारों का आदान प्रदान करते हैं।
-vidyutp@gmail.com 



फ्री में भी उपलब्ध हैं साफ्टवेयर

अगर माइक्रोसाफ्टर और एडोब जैसी कंपनियां लोगों को अपने साफ्टवेयर खरीदकर उपयोग करने के लिए प्रेरित कर रही हैं तो आपके पास दूसरी और फ्री में साफ्टवेयर लेकर इस्तेमाल करने का विकल्प खुला हुआ है। अगर आप साफ्टवेयर खरीदने पर रुपया नहीं खर्च करना चाहते हैं तो कोई बात नहीं आप इसके विकल्प ढूंढ सकते हैं। निश्चय की कंप्यूटर पर पूरी दुनिया में काम किए जाने वाले माध्यम के रुप में माइक्रोसाफ्ट का विंडोज लोकप्रिय है। पर अब विंडो का पूरा जोर लोगों असली साफ्टवेयर खरीद कर उपयोग करवाने पर है। ऐसे में आपके पास फ्री माध्यम के रुप में लाइनेक्स का विकल्प मौजूद है। दुनिया में ऐसे लोगों की एक बड़ी फौज मौजूद है जो लगातार शोध कर हर तरह के साफ्टवेयर फ्री में उपलब्ध कराने पर लगे है। उनका काम लोगों द्वारा दिए जाने वाले चंदे से चलता है।

विंडो का जवाब है लाइनेक्स - आपको यह जानकर अचरज होगा कि कंप्यूटर सर्वर के लिए लाइनेक्स साफ्टवेयर मुफीद है। दुनिया के 25फीसदी सर्वर लाइनेक्स पर ही चल रहे हैं। वहीं डेस्कटाप पीसी में यह आंकड़ा महज 2.8 फीसदी का है। यह कम इसलिए है कि मुफ्त में उपलब्ध होने के कारण इसका प्रचार तंत्र कमजोर है। पर आईबीएम, डेल और एचपी जैसे कंप्यूटर निर्माताओं को लाइनेक्स के साथ करार है। वे अपने कंप्यूटर के साथ लाइनेक्स उपभोक्ताओं को लोड करके देते हैं। जैसे जैसे विंडो अपनी पाइरेसी पर रोक लगाकर लोगों को साफ्टवेयर खरीदने को मजबूर करेगा लोग दुनिया भर में लाइनेक्स की ओर शिफ्ट करेंगे।
शौक बन गया नजीर- लाइनेक्स़ की खोज फिनलैंड के शहर हेलंसिकी के एक छात्र ने शौकिया तौर पर की थी, पर यह बाद में नजीर बन गया। 25 अगस्त 1991 को कंप्यूटर छात्र लाइनेक्स ट्रावोल्ड ने इस साफ्टवेयर की नींव रखी। बाद में इस अभियान से काफी लोग जुड़ते चले गए।

वर्ड प्रोसेसर भी फ्री में - सिर्फ काम करने का माध्यम ही नहीं कई वर्ड प्रोसेसर साफ्टवेयर भी फ्री में उपलब्ध हैं। अब बाजार में माइक्रोसाफ्ट आफिस का विकल्प ओपन आफिस के रुप में उपलब्ध है। इसे दुनिया की सभी प्रमुख भाषाओं में डाउनलोड किया जा सकता है। खासतौर पर यह विंडो एक्सपी और उपर के माध्यम में बेहतर ढंग से काम भी करता है। अगर आप इंटरनेट इस्तेमाल के लिए भी किसी विकल्प की तलाश में है तो वहां भी निराशा नहीं मिलेगी। इंटरनेट एक्सप्लोरर का विकल्प फायरफाक्स के रुप में उपलब्ध है। फायरफाक्स ने तो इंटरनेट एक्सप्लोरर के लेटेस्ट वर्जन का जवाब भी पेश कर दिया है। अगर आप मुफ्त में इन्साइक्लोपाडिया देखना चाहते हैं तो आपके पास वीकिपीडिया की वेबसाइट उपलब्ध है। यानी हर खरीदी जाने वाली चीज का कोई न कोई मुफ्त विकल्प भी मौजूद है।

कैसे चलता है कारोबार - फ्री साफ्टवेयर उपलब्ध कराने का बीड़ा कुछ उत्साही कंप्यूटर के जानकारों ने उठाया है। इन सभी साफ्टवेयरों को इंटरनेट से डाउनलोड किया जा सकता है। या फिर आप वेबसाइट पर जाकर सीडी अनुरोध कर सकते हैं। आप इनके फ्री वितरण के नेटवर्क में शामिल भी हो सकते हैं। इन साफ्टवेयरों का विकास दुनिया भर के लोगों सो प्राप्त होने वाले चंदे से होता है। अगर आप समर्थ हैं तो उन्हें चंदा दे सकते हैं। अगर नहीं दे सकते हैं तो भी आप फ्री में उनके द्वारा विकसित साफ्टवेयर का इस्तेमाल तो कर ही सकते हैं।
विद्युत प्रकाश vidyutp@gmail.com