Tuesday, 31 March 2009

मेरी पसंद की कुछ शायरी...

कुछ मेरी पसंद के पंक्तियां हैं आप भी पढ़िए... 

पुण्य हूं न पाप हूं
जो भी हूं
अपने आप हूं
अंतर देता दाह
जलने लगता हूं
अंतर देता राह
चलने लगता हूं
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ये माना की गुलशन लूटा
और नशेमन जला
फिर भी कुछ तो बाकी
निशां रह गया
तिनके तिनके चुनकर
फिर बना लेंगे आशियां
हौशला गर जो हमारा जवां रह गया
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काम कुछ अच्छे कर लो अच्छी जिंदगानी आपकी
लोग भी कुछ कहें , लोग भी कुछ सुनें कहानी आपकी

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मैं रोया परदेस में भीगा माँ का प्यार
दुख ने दुख से बात की
बिन चिठ्ठी बिन तार
छोटा करके देखिये जीवन का विस्तार
आँखों भर आकाश है बाहों भर संसार

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ए मेरे दोस्त जब घर जाना अपने याद दिलाना मेरी करना एक निवेदन
उनके कल के लिए हमने अपना आज किया समर्पण।
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गति प्रबल पैरों में भरी
फिर क्यों रहूं दर दर खडा
जब आज मेरे सामने है रास्ता इतना पडा
जब तक न मंजिल पा सकूँ,
तब तक मुझे न विराम है, चलना हमारा काम है ।

(( - डा. शिवमंगल सिंह सुमन))
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हुआ सवेरा ज़मीन पर फिर अदब से आकाश अपने सर को झुका रहा है
कि बच्चे स्कूल जा रहे हैं
नदी में स्नान करने सूरजसुनारी मलमल की पगड़ी बाँधे
सड़क किनारे खड़ा हुआ मुस्कुरा रहा है
कि बच्चे स्कूल जा रहे हैं
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कालरात्रि के महापर्व पर अँधकार के दीप जल रहे
भग्न हृदय के दु:खित नयन मेंआँसू बनकर स्वप्न ढल रहे
मानवता के शांति दूत तुम
प्रीति निभाना छोड़ न देना
दीप जलाना छोड़ न देना
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आसमां आस लिए है कि ये जादू टूटे
चुप की जंजीर कटे वक्त का दामन छूटे
दे कोई शंख दुहाई कोई पायल बोले
कोई बुत जागे कोई सांवली घूंघट खोले ( फैज अहमद फैज )

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सातों दिन भगवान के क्या मंगल क्या पीर
जिस दिन सोए देर तक भूखा रहे फ़कीर
अच्छी संगत बैठकर संगी बदले रूप
जैसे मिलकर आम से मीठी हो गई धूप
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यूं तो हर दिल किसी दिल पर फिदा होता है
प्यार करने का मगर तौर जुदा होता है
आदमी लाख संभले गिरता है मगर
झुककर जो उसे उठा ले खुदा होता है...
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जब अंधेरा घना छाने लगा
तब प्रकाश की चिंता सताने लगी
तब एक छोटा सा नन्हा सा दीपक आगे आया
और बोला मैं लडूंगा प्रकाश से...
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महफिल में हंसना मेरा मिजाज़ बन गया
तन्हाई में रोना राज़ बन गया
दर्द को चेहरे से ज़ाहिर ना होने दिया
यही मेरे जीने का अंदाज़ बन गया ...
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यह न सोचो कल क्या हो
कौन कहे इस पल क्या हो
रोओ मत न रोने दो
ऐसा भी जल थल क्या हो
बहती नदी की बांधे बांधे
चुल्लू में हलचल क्या हो
रात ही गर चुपचाप मिले
फिर सुबह चंचल क्या हो
आज ही आज की कहें सुने
क्यों सोचें कल क्या हो। ( मीना कुमारी )
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मुस्कुराके जिनको गम का जहर पीना आ गया
ये हकीकत है जहां में उनको जीना आ गया
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आहों के नगमें अश्कों के तारे
कितने हसीं हैं ये गम हमारे
एक छोटा सा दिल
और उल्फत की ये दौलत
क्या कोई जीते
क्या कोई हारे..
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जिंदगी है बहार फूलों की
दासंता बेशुमार फूलों की
तुम क्या आए तसव्वुर में
आई खुशबू हजार फूलों की

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हरेएक खुशी हजार गम के बाद मिलती है
दीए की रोशनी जलाने के बाद मिलती है
मुश्किलों में घबराके सिसकने वालों
चांदनी रात अंधेरे के बाद मिलती है।
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सृष्टि बीज का नाश न हो
हर मौसम की तैयारी है
कल का गीत लिए होठों पर
आज लड़ाई जारी है
(( महेश्वर ))

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अजनबी शहर के अजनबी रास्ते
मेरी तन्हाई पर मुस्कुराते रहे
मैं बहुत दूर यूं ही चलता रहा
तुम बहुत दूर यूं ही याद आते रहे...
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राहों पे नजर रखना
होठों पर दुआ रखना
आ जाए शायग कोई
दरवाजा खुला रखना

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समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याघ।
जो तटस्थ है, समय लिखेगा उनका भी अपराध।।
( रामधारी सिंह दिनकर )

Tuesday, 24 March 2009

बंद करो ये सरकस

आईपीएल का सर्कस अब दक्षिण अफ्रीका मे होगा, यह अच्छा ही हुआ..वैसे आईपीएल –सीजन 2 टल जाता तो और भी अच्छा होता। सबसे बड़ा सवाल यह है कि देश में चुनाव ज्यादा जरूरी है या फिर आईपीएल के मैच। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के सबसे बड़े चुनाव के लिए देश की सेना मुस्तैद रहेगी ऐसे में जाहिर है कि आईपीएल में दुनिया भर से आने वाले क्रिकेटरों के लिए सुरक्षा देना मुश्किल होता। ऐसे में कई राज्यों का मैच कराने से इनकार करना सही कदम था।
सिर्फ सुरक्षा का मुद्दा नहीं
लेकिन सवाल सिर्फ सुरक्षा का नहीं है कि चुनाव के समय में आईपीएल जैसे मैच कहीं भी नहीं होना चाहिए। सब जानते हैं कि भारत में क्रिकेट में लोगों की रूचि ज्यादा रहती है। चुनाव के समय में मैच होने पर जाहिर सी बात है लोग वोट डालने में कोताही कर सकते हैं। मैच को लेकर लोग टीवी से ज्यादा चिपके रहे तो लोकतंत्र के इस महायज्ञ में हवन में लोग आहुति नहीं डाल पाएंगे।

प्राथमिकता तय करें
अब हमें ये सोचना होगा कि हमारे लिए प्राथमिकता क्या होनी चाहिए। अच्छे नेता चुनकर संसद में भेजना, केंद्र में अच्छी सरकार बनवाना या फिर बैठकर टीवी पर मैच देखना....वोटरों को जादरूक करने के लिए देश भर में अभियान चलाए जा रहे हैं और पप्पू नहीं बनने की सलाह दी जा रही है। ऐसे में अगर चुनाव के दौरान आईपीएल के मैच होते रहे तो वोट न डालने वाले पप्पूओं की संख्या में इजाफा हो सकता है। मैच के कारण वोट डालने कि लिए जागरूक करने वाले अभियान पर बुरा असर पड़ना स्वभाविक है।

देश पहले क्रिकेट बाद में
साल भर सरकार की निंदा करने वाली युवा पीढी अगर क्रिकेट से चिपकी रही तो जाहिर है कि देश की आर्थिक नीति बनाने, आम आदमी के जीवन को समुन्नत बनाने के सरकारी प्रयासों पर बुरा असर पड़ सकता है। ऐसे में हमें चुनाव के दौरान आईपीएल जैसी नाटकबाजी का पूरी तरह बहिष्कार करना चाहिए। नाटकबाजी इसलिए मैं कह रहा हूं कि 20-20 मैच कोई खेल है ही नहीं....यह सिर्फ नाटक हैं जहां चीयर लीडर्स को नचाया जाता है...अगर मेले में चलने वाले कैबरे डांस को बंद करने की बात कर रहे हैं तो चीयर लीडर्स को नचाने वाले खेल को खेल कैसे कहा जा सकता है।

-विद्युत प्रकाश मौर्य

Tuesday, 17 March 2009

अब गरीब भी बन गया है ब्रांड

भले ही लोग महंगाई का रोना रो रहे हैं हो पर बाजार अभी भी उत्पादकों को चीजों को सस्ते में बेचनेकी होड़ लगी है। अभी हाल में नेसकैफे ने अपनी काफी का एक रुपए का पाउच जारी किया है। अगर आपको एक कप काफी पीनी हो तो एक रुपए खर्च कीजिए पाउच लाइए और काफी पीजिए।
कमाल एक रुपए का- ठीक इसी तरह बाजार में एक रुपए के शैंपू और एक रुपए वाशिंग पाउडर के कई ब्रांड मौजूद हैं। अगर हम कई साल के पुराने परिदृश्य को याद करें तो तब अगर कोई शैंपू करना चाहे तो उसे डिब्बा ही खरीदना पड़ता था यानी गरीब या मजदूर वर्ग के व्यक्ति के लिए शैंपू का इस्तेमाल करना एक लक्जरी वाली बात हो सकती थी। पर अब अब कोई भी एक रुपए का पाउच खरीद कर बालों में इस्तेमाल कर लेता है। इसी तरह पाराशुट नारियल तेल और कई अन्य प्रोडक्ट भी एक रुपए में मौजूद है। इस कारोबार से जहां कंपनियों की बिक्री में इजाफा हो रहा है वहीं उनके प्रोडक्ट के उपयोक्ता निचले तबके के लोग भी हो रहे हैं। बहुत सी बड़ी कंपनियों की नजर गरीब लोगों पर है जो उनके उपभोक्ता हो सकते हैं। चाय पत्ती के पाउच भी एक, दो और पांच रुपए के उपलब्ध हैं। और तो और ब्रिटानिया और पारले जी अपने बिस्कुटों के भी एक रुपए के पैक निकाले हैं। इसलिए आप यह नहीं कह सकते हैं कि भला आज के जमाने में एक रुपए में क्या मिलता है। आज भी एक रुपए में बहुत बड़ी ताकत है। आप एक रुपए में नहा सकते हैं बालों को ठंडक का एहसास करा सकते हैं चाय काफी की चुस्की ले सकते हैं तो थोड़ी सी पेटपूजा भी कर सकते हैं। कई नामचीन वाशिंग पाउडर कंपनियां अभी भी एक रुपये का पाउच निकाल रही हैं।
कमाल पांच रुपए का - पांच रुपए में तो कई कंपनियों में कई उत्पादों को बेचने की होड़ लगी है। कई एफएमसीजी कंपनियां अपने उत्पादों का पांच रुपए का पैक निकाल रही हैं। कई प्रोडक्ट जो मंहगे हो गए थे उन कंपनियों ने दुबारा से कम वजन का पांच रुपए का पैक निकाला है। पांच रुपए का टूथपेस्ट, पांच रुपए का वाशिंग पाउडर, पांच रुपए का को ल्ड ड्रिंक तो पांच रुपए का साबुन बाजार में उपलब्ध है। सर्दियों में इस्तेमाल किए जाने वालेा कोल्डक्रीम व वैसलीन जैसे उत्पाद अभी भी पांच रुपए का पैक निकाल रहे हैं जो धुआंधार बिकते हैं। वहीं बोरो प्लस ने भी पांच रुपए का पैक अपने उपभोक्ताओं के लिए निकाला है। टीवी पर एक रुपए दो रुपए और पांच रुपए में मिलने वाले प्रोडक्ट के विज्ञापनों की भरमार है। यह सब कुछ निम्न मध्यम वर्ग के उपभोक्ताओं को ध्यान में रखकर किया जाता है जो एक समय में ज्यादा रुपए का उत्पाद नहीं खऱीद सकता है। एक,दो और पांच रुपए की यूनिट वाले उत्पाद वे लोग भी खरीद सकते हैं जो रोज 70 से
100 रुपए दैनिक कमा पाते हैं। वहीं ज्यादा आय के लोग भी जो किसी प्रोडक्ट को एक बार या दो बार उपयोग करने के लिए लेना चाहते हैं उनके लिए पाउच पैकिंग वरदान के रुप में मिली है।
यानी जिन्हें हम गरीब समझते हैं वह भी कई तरह के उत्पादों का बड़ा उपभोक्ता है। कंपनियां अब इस गरीब आदमी को ब्रांड मानकर उसके लिए कई तरह के उत्पाद पेश करने में लगी हुई हैं। जिन कंपनियों ने इस मूल मंत्र को नहीं समझा है वे मार्केटिंग के इस दौर में पिछड़ रही हैं। वहीं जागरूक कंपनियां दरिद्रनारायण को भी उपभोक्तावाद में उलझाने में कोई कसर नहीं छोड़ रही हैं।



समलैंगिकता की वकालत

कुछ बुद्धिजीवियों ने भारत में भी समलैंगिकता को कानूनी जामा पहनाने की वकालत की है। इसके लिए हस्ताक्षरित पत्र राष्ट्रपति को भी लिखा गया है। इतना ही नहीं एड्स जैसी बीमारी के लिए काम करने वाली संस्था नाको ने भी इसके समर्थन में अभियान छेड़ दिया है।

 नाको के एक आंकड़े के अनुसार देश में 24 लाख से ज्यादा ऐसे लोग हैं जो समलैंगिक हैं। नाको के अनुसार वह सिर्फ छह लाख लोगों को ही कवर कर पाया है बाकि लोगों तक पहुंचने के लिए उसे काफी समय चाहिए। नाको भी चाहता है कि भारत में समलैंगिकता को कानूनी मान्यता दे दी जाए। पर अहम सवाल यह उठता है कि क्या भारत जैसे देश में समलैंगिकता को मान्यता देना कितना उचित होगा। देश में बुद्धिजीवियों का एक बड़ा वर्ग इसके पक्ष में है। दुनिया के कई देशों में समलैंगिकता के पक्ष में बयार बह रही है। कई देशों में तो गे परेड और उनके अलग से फैशन शो भी आयोजित किए जाते हैं। अमेरिका में ऐसे लोग भी कानूनी मान्यता की लड़ाई लड़ रहे हैं।
पर भारत जैसे देश में यह बड़े बहस का विषय है। हालांकि यह भारत की परंपरा नहीं रही है। कुछ राज्यों में कुछ लोगों के बीच इस तरह के किस्से जरूर सुने जाते हैं।


 कुछ साल पहले वरिष्ठ पत्रकार तवलीन सिंह ने बिहार के बक्सर जिले के आसपास के ऐसे कुछ मामलों पर अध्ययन किया था। उन्होंने यह स्थापित करने की कोशिश की थी समाज में इस तरह के रिश्ते चल रहे हैं। इतिहास में यह देखने में आया है कि मुगल आक्रमण कारियों की फौज में ऐसे लोग रहते थे जिनसे सरदार समलैंगिक रिश्ते बनाता है। पर किसी भी समाज में जब ऐसे रिश्तों को मान्यता देने का कानून बनाएं तो उससे पहले हमें इस विषय पर सूक्ष्मता से विचार करना होगा। इसका समाज पर कितना बुरा प्रभाव पड़ेगा। भारत में अगर इस तरह के रिश्ते कहीं बनते हैं तो भी लोग उसको सार्वजनिक तौर पर प्रकट नहीं करना चाहते। मनोवैज्ञानिक समलैंगिक संबंधों को एक मानसिक विकृति ही मानते हैं। जबकि समलैंगिक संबंधों के पैरोकार इसे एक समान्य तौर पर लेना चाहते हैं।
इधर मुंबई की फिल्म इंडस्ट्री में इस विषय पर कई फिल्में भी बनने लगी हैं। पिछले साल की हिट फिल्म पेज 3 में इस तरह के संबंधों को दिखाया गया है। इसमें फिल्मी हीरो तथा समाज के रईस लोगों को इस तरह के संबंध में लिप्त दिखाया गया है। वहीं अमोल पालेकर ने इस पर एक फिल्म बनाई है क्वेस्ट। इस फिल्म में भी हीरो के अपनी पत्नी के अलावा अपने एक दोस्त से समलैंगिक संबंध दिखाए गए हैं। एक ऐसा विषय जिस पर लोग बात नहीं करना चाहते उस पर अब कहानियां भी लिखी जाने लगी है और फिल्में भी बनने लगी हैं। हिंदी के प्रख्यात साहित्यकार दूधनाथ सिंह की लंबी कहानी नमो अंधकारम में समलैंगकता के तत्व थे तो उससे काफी पहले पांडेय बेचन शर्मा उग्र के उपन्यास चाकलेट में भी इस विषय को उठाया गया था।

समलैंगिकता के पैरोकार इंडियन पीनल कोड की धारा 377 को हटाने की बात कर रहे हैं जिसके तहत समलैंगिक संबंधों को अपराध माना गया है। पर इसी धारा के तहत अगर कोई व्यक्ति किसी बच्चे के साथ कुकर्म करता है तो उसे सजा देने का प्रावधान है। अब अगर दो व्यक्ति अपनी मर्जी से इस तरह का संबंध बनाते हैं तो उन्हें सजा मिलनी चाहिए या नहीं यह चर्चा का विषय हो सकता है। पर इस तरह के रिश्तों को अगर कोई सार्वजनिक करता है तो उसका समाज पर कतई अच्छा प्रभाव नहीं पड़ता है। इसलिए ऐसे संबंधों पर परदा रखना ही उचित है।
-विद्युत प्रकाश vidyutp@gmail.com