Saturday, 9 October 2010

कर्ज है हम सबके ऊपर

कई साल के संघर्ष के बाद मैंने बैंक से कर्ज लेकर एक छोटा सा फ्लैट खरीद लिया। अब फ्लैट खरीद लिया तो इसकी खुशी भी है कि अब मेरा अपना पता है जिसे मैं अपना कह सकता हूं। साथ ही इस बात का गम भी साथ चलता रहता है, कि फ्लैट अपना होकर भी पूरी तरह अपना नहीं है। भला क्यों अपना नहीं है। अपना इसलिए नहीं है कि मैं इसकी इएमआई चुका रहा हूं। जब तक इएमआई पूरी नहीं हो जाती, मकान पूरी तरह अपना नहीं हो पाएगा।

अब ये इएमआई तो 20 साल बाद पूरी होगी। बीस साल बादतो मैं बुढापे के करीब आ जाउंगा, रिटायरमेंट के करीब आ जाउंगा। इस बीस साल में जीवन में कई उतार चढ़ाव भी आ सकते हैं। पूरी दुनिया मंदी के दौर से गुजर रही है। किसी भी नौकरी पर कभी भी खतरा मंडरा सकता है। ऐसे हाल में इएमआई का क्या होगा। सचमुच ये चिंता की बात है। कर्ज लेकर फ्लैट खऱीदने की खुशी पूरी खुशी नहीं है। ये अधूरी खुशी है। ऐसी खुशी जिसमें कर्ज का बोझ मंडराता रहता है। किराये के मकान में हमेशा इस बात को लेकर तनाव रहता था कि कहीं वेतन मिलने से पहले ही खड़ूस मकान मालकिन किराया मांगने के लिए नहीं टपक पड़े। अब इस बात का बोझ मन पर रहता है कि बैंक वाले ने इएमआई निकाली की नहीं। इसलिए मकान खरीदने के बाद जब भी दोस्तों को यह बताता हूं कि अपने मकान में आ गया हूं तो यह खुशी पूरी खुशी नहीं होती है। एक पुराना शेर है..गौर फरमाएं-
हजार गम है दिल में, खुशी मगर एक है...
हमारे होठों पर किसी की मांगी हुई हंसी तो नहीं।


लेकिन ईएमआई का मकान तो मांगी हुई हंसी की तरह है, ये हंसी हमारे होठों की हंसी नहीं है। ये वैसी प्रेमिका की तरह है जिसके साथ मंगनी तो हो गई है लेकिन अभी ब्याह नहीं हुआ। ब्याह तो तब होगा जब बैंक वाला मकान के पेपर आपको वापस देगा। इसी दुख में मैं दुबला हुआ जा रहा हूं कि कर्ज में ली हुई चीज को कैसे अपना कहूं। इसलिए जब भी दोस्तों से अपने नए पते की चर्चा करता हूं कुछ न कुछ मलाल रह ही जाता है।

खैर मेरी एक बहुत पुरानी दोस्त हैं, कुलप्रीत कौर जो चलाती तो पीआर एजेंसी हैं लेकिन विचारों से आध्यात्मिक हैं। जब उनको कर्ज में लिए फ्लैट की दास्तां सुनाई तो उन्होंने मुझे प्रत्युत्तर में दिव्य ज्ञान दिया है। बकौल कुलप्रीत दुनिया का हर आदमी कर्ज में डूबा है। भारत देश कर्ज में डूबा है। हर साल घाटे का बजट पेश करता है। सबसे धनी देश अमेरिका पर भी बहुत से लोगों का कर्ज है। हर भारतीय कर्ज के बोझ में पैदा होता है और कर्ज चुकाते चुकाते इस दुनिया से कूच कर जाता है। हमारी हर सांस पर किसी न किसी का कर्ज है। ये जिंदगी जिस माता पिता कि दी हुई है उसका कर्ज हम जीवन भर नहीं चुका पाते हैं। हमारी हर सांस पर ईश्वर का कर्ज है, क्योंकि हम सबकी जिंदगी उसकी की दी हुई है। फिर कर्ज से कैसा घबराना...इसी कर्ज के बोझ में हमें मुस्कुराना सीख लेना चाहिए। इस दिव्य ज्ञान से मुझे थोड़ी तसल्ली मिली है। आपका क्या ख्याल है...

-विद्युत प्रकाश मौर्य, ई मेल vidyutp@gmail.com 




लो फ्लोर बसों ने बदला सफर का अंदाज

याद किजिए दिल्ली की ब्लूलाइन बसों की भीड़ में बदबूदार सफर को...लेकिन डीटीसी की नई लो फ्लोर बसों ने सफर का मजा बदल दिया है। जितना आरामदायक सफर आप मारूति 800 मॉडल की कार में करते हैं कुछ उतना ही आरामदेह सफर है डीटीसी की नई लो फ्लोर बसों का। परंपरागत बसों की तुलना में ऊंचाई कम होने के कारण बच्चे बड़े और बुजुर्ग सबके लिए बसों में चढ़ पाना भी आसान हो गया है। जिन रूट पर लो फ्लोर बसें चलने लगीं हैं वहां लोगों को सफर पहले की तुलना में बहुत अरामदेह हो गया है। बसों के दरवाजे हमेशा बंद रहने के कारण गेट पर लटक कर सफर करने की भी कोई संभावना नहीं रह गई है। इससे कई तरह की दुर्घटनाओं भी निजात मिली है। दिल्ली की सड़कों पर दौड़ रही कुछ सौ बसों ने शहर का नजारा बदलने में मदद की है। अब दिल्ली सरकार 1600 से अधिक लो फ्लोर बसें और लाने जा रही है। इसके बाद दिल्ली वासियों को और आरामदेह सफर का मजा मिल सकेगा। कामनवेल्थ गेम्स से पहले दिल्ली को अंतराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप शहर बनाने की दिशा में ये प्रयास भर है। लेकिन जब दिल्ली की सड़कों से ब्लू लाइन बसें और डीटीसी की पुरानी खटारा बसें पूरी तरह अलविदा हो जाएंगी तब दिल्ली का नजारा बदल चुका है और दिल्ली का आम आदमी राहत का सफर कर सकेगा। लो फ्लोर बसों के आरामदेह सफर के बाद लोग अपनी कार या टैक्सी आटो रिक्सा से चलना छोड़कर बसों में सफर करना पसंद करेंगे। इससे दिल्ली की सड़कों पर ट्रैफिक का बोझ कम हो सकेगा। दिल्ली सड़कों पर वाहनों की बढ़ती अंधाधुंध भीड़ से निजात के लिए यह जरूरी है कि ज्यादा से ज्यादा लोग बसों में सफर करें। न सिर्फ आम आदमी बल्कि वीआईपी कहे जाने वाले और अमीर लोग भी बसों में सफर करें। इसके लिए बसों के सफर को और आरामदायक बनाना होगा। इसमें एसी बसों के परिचालन भी बढ़ाना होगा। डीटीसी ने लो फ्लोर वाले एसी बस भी सड़कों पर उतार दिए हैं। इन बसों की आवाजाही भी लोकप्रिय रूट पर ज्यादा से ज्यादा बढ़ानी चाहिए। इससे आटो रिक्सा में बैठकर जल्दी पहुंचने वाला लोग इन बसों का सहारा ले सकते हैं। एसी बसों में सफर करना आटो रिक्सा या टैक्सी में सफर करने से सस्ता है। मुंबई में जैसे शहरों के लिए एसी बसें कोई नई बात नहीं है पर दिल्ली में यह शुरूआत काफी देर से हुई है। साथ ही जो कम लोकप्रिय रूट हैं वहां मिनी बसें चलानी चाहिए। मेट्रो स्टेशनों से चलने वाली फीडर बसें जो छोटे आकार की हैं उनका जाल भी ज्यादा रूट पर बढ़ाना जरूरी है।

बसों का सफर आरामदेह होने से यह भी उम्मीद की जा सकती है कि दिल्ली के वातावरण में प्रदूषण की मात्रा भी कम होती जाएगी। क्योंकि सीएनजी से चलने वाली लो फ्लोर बसों संख्या बढ़ने से सड़कों पर डीजल पेट्रोल चलित निजी वाहनों का शोर थमता नजर आएगा। अगर हम चाहते हैं कि नई पीढ़ी के लिए राष्ट्रीय राजधानी रहने लायक सांस लेने लायक शहर हो तो हमें प्रदूषण करने की हर कवायद के साथ खड़ा होना पड़ेगा।
-विद्युत प्रकाश मौर्य, ई मेल vidyutp@gmail.com

जमाना आया ई बाइक्स का...

बिना पेट्रोल को गाड़ी चली फुर्र। जी हां अब महानगरों में लोग तेजी से ई बाइक्स को अपना रहे हैं। ई बाइक मतलब बिजली से चार्ज होकर चलने वाली बाइक। यानी पेट्रोल डालने का कोई चक्कर नहीं है। ऐसी बाइक जहां प्रति किलोमीटर माइलेज में सस्ती पड़ती है तो पर्यावरण के प्रति अनुकूल भी है, यानी कि यह हवा में धुआं नहीं छोड़ती है। देश की साइकिल बनाने वाली दो प्रमुख कंपनियां हीरो और एवन ई बाइक्स बना रही हैं। अब घड़ी बनाने वाली कंपनी अजंता भी ई बाइक्स लेकर आ रही है। पहले तो ई बाइक्स को लोगों का ठंडा रेस्पांस मिला था पर अब लोग इसके प्रति सजग हो रहे हैं।
जेब पर हल्की
ई बाइक्स जेब पर हल्की पड़ती है। अक्सर महिलाएं जिस तरह का स्कूटर खरीदती हैं वह 30 से 35 हजार में आता है और 40 से 45 किलोमीटर प्रति लीटर से ज्यादा माइलेज नहीं देता। इस सिगमेंट के लिए ई बाइक बहुत अच्छा विकल्प है। ई बाइक महज 15 पैसे प्रति किलोमीटर के खर्च में चलती है। शहरों में 50 से 100 किलोमीटर का सफर करने के लिए ई बाइक बहुत अच्छा विकल्प है। एक बार चार्जिंग में आमतौर पर ई बाइक 70 किलोमीटर तक चलती है। यह बाइक की तरह लांग ड्राइव में जाने के लिए ठीक नहीं है। पर शहरी स्थितियों के लिए यह बहुत शानदार है, इसलिए यह लोगों की पसंद बनती जा रही है। ई बाइक के शुरूआती माडल 20 हजार में भी उपलब्ध हैं पर ये दो वजनी लोगों को नहीं ढो पाते। पर 30 हजार तक में आने वाले इ बाइक की क्षमता ठीक है।
आजकल महानगरों की बड़ी समस्या बढ़ते पर्यावरण प्रदूषण की है। पेट्रोल और डीजल वाहनों की बढ़ती भीड़ वातावरण में लगातार कार्बन की मात्रा बढ़ा रहे हैं, जो बेहतर भविष्य के लिए बड़ा खतरा हैं। ऐसे में ई बाइक्स का ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल कई स्तरों पर लाभकारी हो सकता है। आपकी जेब के लिए भी और आने वाली पीढ़ी के लिए भी। सरकारें भी ई बाइक्स की जरूरत को समझकर इस पर सब्सिडी दे रही हैं। दिल्ली सरकार ई बाइक्स पर पांच हजार रुपये तक सब्सिडी दे रही है। बाकी सरकारें भी इसी तरह का कदम उठा रही हैं। ई बाइक के साथ थोडी़ सी समस्या चार्जिंग की है। अगर बिजली नहीं रहे तो आप इसे चार्च नहीं कर सकते हैं। अगर आप घर से बाहर निकल चुके हैं तो चार्जिंग नहीं हो सकती। अब ई बाइक्स के लिए सार्वजनिक स्थलों पर पार्किंग आदि में चार्जिंग प्वाइंट बनाने पर भी विचार चल रहा है।
अब ई कार भी
ई बाइक के बाद बाजार में ई कार भी दस्तक दे चुकी है। बिजली से चार्ज होकर चलने वाली कार रेव-3 ने बंगलोर के बाद दिल्ली में वितरण शुरू कर दिया है। कंपनी जल्द ही चंडीगढ़ में भी इलेक्ट्रिक कार बेचना शुरू करेगी। ई कार पर भी सरकार 30 हजार तक सब्सिडी दे रही है। दिल्ली में तीन लाख रुपये में उपलब्ध रेव चार सौ रुपये खर्च में 1200 किलोमीटर का सफर तय करती है। यानी 33 पैसे प्रति किलोमीटर का खर्चा। यह पेट्रोल चलित बाइक से भी सस्ती है।   

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अपने दम पर खड़ी होगी खादी

हर साल की तरह इस साल गांधी जयंती पर देश भर में खादी वस्त्रों पर छूट नहीं मिलने जा रही है। यानी अब खादी के वस्त्र सालों भर एक ही दाम पर मिलेंगे। आमतौर पर खादी के कद्रदान दो अक्टूबर का इंतजार करते हैं। सरकार 30 से 40 फीसदीतक छूट की घोषणा करेगी और हम खादी के कुरते या दूसरे कपड़े खरीदेंगें। लेकिन इस साल से सरकार ने खादी पर छूट को पूरी तरह से खत्म करने का फैसला लिया है। हो सकता है कि खादी के कद्रदानों को ये बात कहीं से कचोटे लेकिन सरकार का ये फैसला खादी के हक में अच्छा है। इससे खादी अपने पैरों पर खड़ी हो सकेगी।

वास्तव में छूट की व्यवस्था खादी को लाचार बना रही थी। और इस छूट के पीछे खादी संस्थानों में हो रहा था बड़ा घोटाला और कमीशनबाजी का खेल। सरकार से जो छूट के लिए सब्सिडी की रकम जारी होती थी उसको पाने के लिए कई खादी संस्थाएं भ्रष्ट तरीके का भी इस्तेमाल कर रही थीं। इस छूट का सीधा लाभ उन लोगों तक तो बिल्कुल नहीं पहुंच पा रहा था जो लोग खादी के धागे बनाकर दैनिक आमदनी कर रहे थे लेकिन कुछ खादी संस्थाओं से जुडे लोग मालामाल जरूर हो रहे थे। लेकिन खादी पर छूट खत्म कर दिए जाने के बाद अब तमाम खादी संस्थाएं अपने उत्पादों लेकर बाजार में प्रतिस्पर्धा के लिए तैयार होंगी। जब बाजार में प्रतिस्पर्धा की बात आएगी तो उत्पाद की गुणवत्ता को लेकर भी निर्माता सजग होंगे। इससे उपभोक्ताओं को बेहतर उत्पाद मिल सकेगा। सरकारी अनुदान प्राप्त संस्थाएं खादी में टेक्सचर और रंगों को लेकर  लापरवाही बरती थीं। इसका नतीजा होता था कि कई बार खादी के उत्पादों के रंग बहुत जल्दी गिरने लगते थे तो वहीं कपड़ों को लेकर भी ग्राहकों में संतोष नहीं होता था।
इसके उलट हम खादी में के व्यवसाय से जुडे निजी ब्रांडों की बात करें तो फेब इंडिया जैसे ब्रांड चार दशकों से खादी के कारोबार में हैं। लेकिन वे अपने शो रूम में खादी के उत्पाद अपेक्षाकृत ऊंचे दामों में बेचते हैं और उच्च वर्ग और मध्यम उच्च वर्ग के परिवारों के लोग संतुष्ट होकर यहां के उत्पादों को खरीदते हैं। लेकिन इसके उलट खादी की सरकारी सहायता पाने वाली संस्थाएं अपने उत्पादों का बाजार में वह ब्रांड वेल्यू नहीं बना सकी हैं जो निजी उत्पादों ने बनाए। खादी के और ग्रामोद्योग से कई सालों से जुड़े लोग भी ये मानते हैं सरकारी छूट के इस कारोबार ने खादी संस्थाओं को भ्रष्ट बनाया। लेकिन अब हालात बदल भी रहे हैं कि कई खादी संस्थाओं के उत्पाद अच्छी गुणवत्ता वाले आ रहे हैं। ये उत्पाद बिना किसी छूट के भी बाजार मूल्य में के हिसाब से मध्यमवर्ग के उपभोक्ताओं के जेब के करीब हैं वहीं इनकी टेक्सचर और रंग भी अच्छी गुणवत्ता का है। 

इधर खादी में रेडीमेड के कारोबार ने भी अच्छा बाजार पकड़ा है। अगर आप खादी के किसी शो रूम से एक हाफ शर्ट खरीदते हैं तो ये 200 से 300 रूपये के बीच में बिना किसी सरकारी छूट के मिल जाता है। जबकि किसी भी ब्रांडेड कपड़ों के शो रूम में भी इससे सस्ते में एक शर्ट नहीं खरीदा जा सकता है। वहीं अगर खादी के कपड़े की गुणवत्ता की बात करें तो ये पूरी तरह से सूती धागे का होने के कारण किसी भी दूसरे तरह के कपड़े की तुलना में ज्यादा इको फ्रेंडली भी है। साथ ही जब आप एक खादी का उत्पाद खऱीदते हैं तो इससे सीधे कुटीर उद्योग से जुड़े मजदूर का पेट भरता है। जबकि आप एक ब्रांडेड उत्पाद खऱीदते हैं तो आपके रूपये एक बड़ा हिस्सा एक बड़े औद्योगिक घऱाने के मुनाफे में जाता है। हालांकि बिना इस मुद्दे पर विचार किए खादी इसलिए भी पहना जा सकता है कि ये शरीर के लिए पॉलीएस्टर, टेरीकॉट या रेयान जैसे वस्त्रों की तुलना में ज्यादा हितकारी है। आज जरूरत इस बात की है कि सरकार और खादी संस्थाएं लोगों की बीच खादी के फायदे को सही ढंग से पहुंचाएं, न कि सरकारी छूट का का रोना रोएं। 

सरकारी अनुदान के खत्म होने के बाद हो सकता है कि कई खादी संस्थाओं को इससे शिकायत हो लेकिन आने वाले कुछ सालों में हो सकता है कि इससे खादी का बड़ा भला हो। सरकार की सहयता से खादी उत्पादों की मार्केटिंग के लिए जगह जगह शो रूम खोले गए हैं। जन जन तक खादी के उत्पादों को पहुंचाने के लिए जरूरी है कि इसके नेटवर्क को और मजबूत किया जाए। लोगों तक पहुंच और सही जानकारी होने के बाद खादी अपने आप लोगों अपना सही स्थान बनाने में कामयाब हो जाएगी।
-    विद्युत प्रकाश