Friday, 23 November 2012

तुम खुद को इतना मासूम मत समझो ( व्यंग्य)

उनके नाम 13 लाख रुपए किसी ने यूं ही लिफाफे में रखकर भेज दिए। वह भी दूर देश से। सात समंदर पार से। हमारे पास तो किसी ने आजतक 13 रुपए भी नहीं भेजे। हमारी भोली भाली ऐश्वर्या को यह भी नहीं मालूम कि किसने उसके नाम यह 13 लाख रुपयों का पैकेट भेज दिया। लोग गरीबों को अठन्नी देने से भी कतराते हैं पर अमीरों पर लाखों न्योक्षावर करते हैं। मैं यह नहीं कहता कि उस व्यक्ति ने ऐश्वर्या को 13 लाख रुपए भेजकर कोई गलती की। इन रुपयों को वह दरिद्र नारायण पर भी न्योछावर कर सकता था। जैसा कि विदेशों के कुछ अमीर कर रहे हैं।
एक विदेशी महिला ने बनारस के गरीबों पर धन लुटाना शुरू किया है। उसका कहना है कि छप्पन प्रकार के भोग सिर्फ अमीर लोग ही क्यों खाएं। गरीबों को जूठे पत्तल का खाना ही क्यों नसीब हो। इसलिए वे बनारस दश्वाश्वमेध घाट पर गरीबों के लिए सुस्वादु व्यंजनों का लंगर लगाने जा रही हैं। वे हर साल क्रिसमस पर ऐसा करती हैं।
अब ऐश्वर्या राय को रुपए की थैली भेजने वाला निश्चय ही इतना गरीबों के लिए हमदर्द नहीं होगा। उसने ऐश्वर्या की भोली सी हंसी पर ही रुपए लुटाने की ठान ली होगी। पर आखिर उसने ये रुपए चोरी छुपे क्यों भेजे। वह चाहता तो इसे कानूनी तरीके से डंके चोट पर भेज सकता था। वह चाहता तो रुपए के बदले में कोई गिफ्ट सामग्री आदि भेज सकता था। दुनिया में कई खिलाड़ियों और सितारों के ऐसे गुमनाम प्रशंसक हुए हैं जो अपने चहेते सितारों को इनाम भेजते रहे हैं। पर यह भेजने वाला गुमनाम नहीं है। उसने अपना नाम बताते हुए भेजा है। पर उसने रुपयों को इलेक्ट्रानिक उपकरण में चोरी से छुपाया है। कहतें है वह इवेंट आरगनाइजर है। वह कई सितारों को पहले भी पैसे देता रहा होगा। यह भी कहा जाता है कि कुछ सितारे चोरी चुपके पैसे लेते हैं जिससे टैक्स की बचत हो सके। पर हमारी ऐश्वर्या तो सबसे ज्यादा टैक्स भरने वालों में से हैवह भला चोरी चुपके पैसे क्यों लेगी।
कस्टम अधिकारियों ने ऐश्वर्या से पूछा। पर उसने बड़े भोलेपन से कहा मुझे तो उस रुपए के बारे में कुछ नहीं मालूम। कस्टम वाले भी पूर्व मिस वर्ल्ड की बातों में आ ही गए। अब ऐश्वर्या खुद जानना चाहती हैं कि यह रुपया उनके पास क्यों भेजा गया है। कुछ लोगों का मानना है कि उन्हें बदनाम करने के लिए ही यह रुपया किसी ने भेज दिया है। मैं कहता हूं कि देश के कुछ और लोगो को बदनाम करने के लिए इसी तरह के पैकेट भेजे जाएं विदेशों से। बड़ा अच्छा होगा। इसी बहाने हमारे पास यूरो को बरसात तो होगी न। पर ऐश्वर्या भले ही 33 साल की हो गई हों पर वे बड़ी भोली हैं। उन्हें तो जी भर कर खिलखिलाने के अलावा दुनियादारी की बातें कुछ भी नहीं मालूम है। वे जमकर रुपए कमाती हैं और टैक्स भरती हैं। पर उनको रुपए के लेनदेन के बारे में ज्यादा नहीं मालूम है। एक शायर ने लिखा है -
तुम खुद को इतना मासूम मत समझोतुम पर भी इलजाम बहुत हैं।
भले ही हमारी ऐश्वर्या पर कई तरह के इल्जाम लग गए हों। पहले भी वे रुपए के लेनदेन के मामले में चर्चा में आई हों पर वे फिर भी भोली भाली हैं। वे हमेशा भोली भाली रहेंगी। कोई भी उनकी बातें सुनकर उन्हें क्लीन चीट ही दे देगा। हां हमारी भोली सी ऐश्वर्या ।
- विद्युत प्रकाश 

Saturday, 15 September 2012

दिल्ली का मतलब लाल किला


लालकिला यानी सदियों से इतिहास के पन्नों में कई तरह के उतार चढाव का साक्षी। यमुना नदी के किनारे बना ये किला तभी दिखाई देता है जब आपकी ट्रेन पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन में प्रवेश करने वाली होती है। अगर कोई दिल्ली घूमने आता है तो वह लाल किला जरूर जाता है। दिल्ली का मतलब ही लाल किला है। हमारी आजादी का प्रतीक। तभी तो देश आजाद होने पर लाल किले पर तिरंगा फहराया गया था। आज भी हर 15 अगस्त को लालकिले के प्राचीर से प्रधानमंत्री तिरंगा फहराते हैं। सालों भर हर रोज लाल किले में सैलानियों की भीड़ देखने को मिलती है। लाल किले में प्रवेश के लिए आजकल आठ रुपये का टिकट है। बच्चों के लिए पांच रुपये का। किले के अंदर एक संग्रहालय है उसका टिकट अलग से है।

आप पूरा देश घूम कर लौटे हैं तो भी लालकिले को देखना पूरे देश को देखने जैसा है। लाल किला के अंदर एक छोटा सा मीनाबाजार है। यहां देश के कोने कोने की बनी चीजें मिलती हैं। अंदर जाने पर आपको मुगल बादशाहों की शाही जीवन शैली के बारे में पता चलता है। लालकिले के बगल में सलीमगढ़ का किला भी है जिसे शेरशाह के बेटे शहजादा सलीम ने बनवाया था। लालकिला और किला सलीमगढ़ कभी आजादी के दीवानों के लिए जेल खाना भी बने थे। पर अब ये हमारी आजादी के प्रतीक चिन्ह हैं।  
हर शाम को सात बजे से लालकिला में लाइट एंड साउंड शो होता है जिसमें इतिहास को ध्वनि एवं प्रकाश के माध्यम से सुनाया जाता है। इसमें शामिल होना एक अलग किस्म की अनुभूति है। 

लाल किला के ठीक सामने चांदनी चौक के एक कोने पर है अति प्राचीन गौरी शंकर मंदिर। तो लाल किले के बाहर से आपके दिल्ली से दूर कहीं भी जाने के लिए टूरिस्ट बसें मिल जाएंगी। पूरी दिल्ली भले ही बदल रही हो लेकिन लाल किले के आसपास अभी पुरानी दिल्ली खूशबू आती है।  
-   - विद्युत प्रकाश 

Tuesday, 17 July 2012

कहां है आम आदमी का घर....

बाजार में मंदी है। बड़ी प्रापर्टी के दाम में तेजी से गिरावट आ रही है। मुंबई, गुड़गांव नोयडा जैसे शहरों में महंगी प्रोपर्टी के खरीददार नहीं मिल रहे हैं। फिर नई कंपनियां 80-90 लाख और करोड़ों के अपार्टमेंट और पेंट हाउस बनाने का ऐलान कर रही हैं। आम आदमी के लिए या मध्यम वर्ग के लिए घर का ऐलान को भी बिल्डर नहीं कर रहा है। टाटा जैसा समूह जो एक ओर आम आदमी के लिए कार नैनो को बाजार में लांच कर रहा है, उसने हाउसिंग प्रोजेक्ट के क्षेत्र में भी कदम रख दिया है। पर टाटा ने हाउसिंग के क्षेत्र में आम आदमी के लिए घर का ऐलान नहीं किया है। टाटा ने भी रहेजा समूह के साथ मिलकर उच्च आय वर्ग के लोगों के लिए महंगे और लक्जरी आवास बनाने का ऐलान किया है। खास कर दिल्ली और उसके आसपास के शहरों में देखा जाए तो यहां मध्यम वर्ग और निम्न आय वर्ग के लोगों के लिए घर बहुत कम हैं। एक ओर जहां इसको लेकर सरकार उदासीन है वहीं निजी बिल्डर भी महंगे मकानों को ही प्राथमिकता दे रहे हैं।

 कई साल बाद दिल्ली विकास प्राधिकरण ( डीडीए) ने अपनी आवासीय योजना का ऐलान किया है जिसमें आम आदमी के लिए घर हैं। पर घर हैं सिर्फ पांच हजार और आवेदन होने की उम्मीद है पांच लाख। डीडीए की योजनाएं कई-कई सालों बाद निकलती हैं। डीडीए जितने फ्लैट्स बनाती वह लोगों की जरूरत के हिसाब से देखा जाए तो ऊंट के मुंह में जीरा जैसा साबित होता है। लाखों लोग दिल्ली जैसे महानगर में जिंदगी गुजार देते हैं पर वे अपना फ्लैट नहीं खरीद पाते क्योंकि उनके लिए मिड्ल क्लास प्रोजेक्ट कहीं निकलते ही नही हैं। आम आदमी को कार का सपना दिखाने वाली कंपनी टाटा को चाहिए कि वह आम आदमी के घर का प्रोजेक्ट भी लांच करे। आजकल ज्यादा परिवार छोटे हो रहे हैं। ऐसे में एक कमरे और दो कमरे वाले घरों की जबरदस्त मांग है। अगर निजी ब्लिडर इस तरह के बहुमंजिले अपार्मेंट्स का निर्माण करें तो उसके ग्राहक तेजी से मिलेंगे। जैसी मंदी इन दिनों प्रोपर्टी के बाजार में आई है उसमें महंगे और लक्जरी अपार्टमेंट के ग्राहक बहुत कम मिल रहे हैं, जिससे मजबूर होकर बड़े बिल्डरों को महंगे घरों का दाम कम करना पड़ रहा है। जिस तरह एफएमसीजी गुड्स के मामले में पांच-दस रूपये की चीजें बड़ी तेजी से बिकती हैं उसी तरह अगर पांच दस लाख रुपये के घर बनाए जाएं तो उसके भी ग्राहक बड़ी संख्या में मिलेंगे। इस मामले में सरकार को और सभी प्रमुख बिल्डरों को गंभीरता से सोचना होगा। ऐसी सस्ती परियोजनाओं के आने से आम आदमी के घर का सपना साकार हो सकेगा।
अगर हम दिल्ली, नोयडा, फऱीदाबाद, गुड़गांव, गाजियाबाद की प्रोपर्टी पर नजर डालें तो वहां वन रूम और टू रूम के प्रोजेक्ट बहुत कम हैं। ऐसे में कम आय वाले व्यक्ति के पास लोन लेकर घर खरीदने का विकल्प नहीं रह जाता है। ऐसा नहीं है कि छोटे आवासीय यूनिट बनाने में बिल्डरों को कोई लाभ नहीं होता है, पर मोटे लाभ की उम्मीद में बिल्डर ज्यादातर बड़े घर बनाते हैं। ऐसे मामले में सरकार को पालिसी बनानी चाहिए कि बिल्डर एक ही आवासीय प्रोजेक्ट में हर आय वर्ग के लोगों के लिए घर बनाएं। अगर हम दिल्ली की तुलना में मुंबई को देखें तो वहां छोटे आवासीय अपार्टमेंट बडी़ संख्या में बने हैं, ऐसे में वहां पर एक फ्लैट खरीदना दिल्ली की तुलना में आसान है।



Sunday, 17 June 2012

शॉपिंग मॉल्स भी घाटे में

देश के सबसे बड़े रिटेल नेटवर्क में से एक स्पेंसर को अपने 40 स्टोर बंद करने का निर्णय लेना पड़ा है। स्पेंसर आरपीजी रिटेल द्वारा प्रवर्तित स्टोर का नेटवर्क है। वहीं किशोर बियानी का बिग बाजार भी इससे अछूता नहीं है। यानी की पिछले कुछ सालों में जिस तरह तेजी से बिग बाजार जैसे बड़े रिटेल स्टोर खुले हैं वहां सब कुछ हरा भरा नहीं है। इन बड़े स्टोरों के चेन में खुले कई शहरों स्टोर घाटे में भी जा रहे हैं। जाहिर बड़ी कंपनी के 100 में से कुछ स्टोर घाटे में भी हों तो वह घाटे को एक समय तक बर्दास्त कर सकती है, पर लंबे समय तक ऐसा नहीं कर सकती है। इसलिए अब कई बड़े शापिंग माल्स भी अपने स्टोरों को बंद करने का निर्णय ले रहे हैं। स्टोर को डेकोरेट करने में आई बड़ी लागात और उसके बाद बड़ा बिजली बिल, मंहगा किराया और स्टाफ के वेतन के बाद बिक्री का आंकड़ा कम हो तो घाटा हो सकता है। इस घाटे से उबरने के लिए बड़े स्टोर समय समय पर डिस्काउंट की घोषणा भी करते हैं। 

पर बड़ा से बड़ा व्यापारी भी लंबे समय क घाटे का खेल नहीं खेल सकता है। इसलिए उन्हें स्टोंरों को बंद करने का भी निर्णय लेना पड़ रहा है। हालांकि ऐसी कंपनियों ने अपनी विस्तार योजना को कोई रोक नहीं लगाई है, पर वे अब सोच समझ कर ऐसी जगहों पर ही स्टोर खोलने जा रहे हैं जहां अच्छी बिक्री की उम्मीद हो। बिग बाजार के प्रवर्तक किशोर बियानी ने तो छोटे रिटेलरों को चुनौती देने के लिए गली मुहल्ले और व्यस्त बाजारों के बीच में एक हजार स्क्वायर फीट में केबीज सबका बाजार खोलना शुरू कर दिया है। यह बिल्कुल किसी परंपरागत किराना दुकान की तरह ही है। ऐसे स्टोरों के घाटे में चलने की उम्मीद कम ही है।

आखिर क्या कारण है जिससे माल्स में खुले कई बड़े स्टोर घाटे में जा रहे हैं। दरअसल बड़े स्टोर खोलने में जितनी बड़ी लागत आती है, उसी वाल्यूम में वहां ग्राहक नहीं मिलते हैं, जिसके कारण घाटा उठाना पड़ता है। दूसरी बात यह भी हुई है कि परंपरागत दुकानदार भी इन बड़े स्टोरों से मुकाबले को लेकर सचेत हुए हैं। उन्होंने क्रेडिट कार्ड मशीने लगानी शुरू कर दी हैं। ग्राहकों को लुभाने के लिए डिस्काउंट और उधार देना भी शुरू कर दिया है। कई छोटे दुकानदारों ने भी अपने रेट्स को प्रतिस्पर्धी बनाना शुरू कर दिया है। मतलब कि जिस रेट में राशन आपको किसी बड़े रिटेल स्टोर में मिलता है उससे कम में समान्य किराना की दुकानों में भी मिल रहा है ऐसे में लोग अपने मुहल्ले की दुकान से राशन खरीद लेन अक्लमंदी समझ रहे हैं।
कई छोटे और मझोले शहरों में जितना बड़ा उपभोक्ता वर्ग है उसकी तुलना में शापिंग माल्स ज्यादा संख्या में खुल गए हैं, इस कारण से माल्स में ग्राहकों का टोटा पड़ने लगा है। जैसे पानीपत और हिसार जैसे शहरों में पांच पांच माल्स खुल रहे हैं। कई इसमें चालू भी हो गए हैं। अगर पांच लाख आबादी वाले शहर में पांच बड़े माल्स होंगे तो जाहिर है कि कुछ माल्स की दुकानें दिन भर ग्राहकों का इंतजार करेंगी। हालांकि बिग बाजार जैसे स्टोर अधिकांश शहरों में सफल हो रहे हैं क्योंकि यहां एक ही स्टोर में सब कुछ मिलता है। सब्जी भाजी से लेकर कपड़े तक। पर ज्यादा परेशानी वैसे स्टोरों के साथ है जो किसी एक सिगमेंट पर केंद्रित हैं। जैसे कई रेडीमेड गारमेंट के कंपनी शो रुम बंद होने के कागार पर हैं।
- vidyutp@gmail.com




Sunday, 18 March 2012

सस्ते चीनी मोबाइल...

-आखिर मोबाइल फोन कितना सस्ता हो सकता है। कई साल पहले इंट्री लेवल के हैंडसेट तीन-चार हजार रुपये से कम के नहीं थे। पर अब लगभग सभी ब्रांडेड कंपनियों ने एक हजार रुपये में इंट्री लेवेल के मोबाइल हैंडसेट उतार दिए हैं। कई कंपनियां तो एक हजार रुपये में रंगीन स्क्रीन वाले हैंडसेट आफर कर रही हैं। वहीं ग्राहकों के लुभाने के लिए एक हजार से 1200 रुपये में लाइफ टाइम कनेक्सन के साथ मोबाइल हैंडसेट आफर किए जा रहे हैं। अब हम इंट्री लेवेल के मोबाइल फोन के इससे भी सस्ता होने की बात नहीं सोच सकते। हां अगर कोई सेकेंड हैंड मार्केट में जाए तो उसे 500 रुपये वाले मोबाइल फोन भी मिल सकते हैं बिल्कुल चालू हालत में।


वहीं बाजार दूसरी ओर सस्ते चीनी मोबाइल फोनों से भी पटा पड़ा है। भारतीय बाजार में आपको बड़े आराम से जगह जगह चीनी फोन बिकते हुए मिल जाएंगे। आमतौर पर ये चीनी मोबाइल फोन नान ब्रांडेड होते हैं। पर इनमें उपलब्ध सुविधाओं की बात करें तो ये बड़े बडे दावे के साथ आते हैं। जैसे आपको 1.3 मेगा पिक्सेल कैमरा वाले मोबाइल फोन महज ढाई हजार रुपये तक में मिल जाएंगे। इसमें सांग डाउनलोड मेमोरी जैसी सुविधा तो होगी ही। यही नहीं तीन हजार से 3500 रुपये के रेंज में दो मेगा पिक्सेल के कैमरे वाले मोबाइल फोन मिल जाते हैं। इतनी सुविधा वाला मोबाइल फोन अगर आप किसी ब्रांडेड कंपनी का खरीदने जाएं तो सात हजार रुपये तक देने पड़ सकते हैं। यही चीनी कंपनियों का कमाल है कि वे इतने सस्ते में टेक्नोलाजी उपलब्ध करा रही हैं।
अब आपके जेहन में सवाल उठ सकता है कि आखिर सस्ता है तो कितना टिकाऊ हो सकता है। जाहिर सी बात है सस्ता है तो कोई गांरटी-वारंटी नहीं है। लेकिन शौक पूरा करने वाली नई पीढी गांरटी वारंटी की बात भी नहीं करती। भले गारंटी नहीं है पर ऐसा भी नहीं है कि ये मोबाइल फोन यू एंड थ्रो वाले हैं। देश के सबसे बड़े मोबाइल फोन बाजार यानी दिल्ली के करोलबाग का गफ्फार मार्केट का एक दुकानदार कहता है कि जैसे ब्रांडेड मोबाइल फोन की मरम्मत हो जाती है उसी तरह इन सस्ते मोबाइल फोन की भी मरम्मत हो जाती है। यह अलग बात है कि बहुत जटिल सुविधाओं वाले मोबाइल फोन के मरम्मत करने वाले हर छोटे शहर में नहीं मिलते हैं।
अगर आप शौक पूरा करने के लिए कोई सस्ता और बहुत सारी सुविधाओं से लैस मोबाइल फोन खरीदते हैं तो अपने जोखिम पर खरीदें। ऐसे मोबाइल खरीदने के बाद आपको मरम्मत के लिए परेशान होना पड़ सकता है। कई बार ऐसा भी हो सकता है कि आपका मोबाइल फोन मरम्मत कराते कराते किसी ब्रांडेड कंपनी के मोबाइल फोन के बराबर ही जा बैठे। लेकिन आप मोबाइल फोन में तेजी से आ रही सुविधाओं के लिहाज से देखते हैं और सस्ते में ढेर सुविधाएं भी चाहते हैं तो बेशक कोई चाइनीज मोबाइल फोन आजमा सकते हैं। सिर्फ दिल्ली ही नहीं बल्कि लगभग सभी महानगरों में ऐसे चीनी मोबाइल फोन का बाजार पहुंच चुका है। पर नोकिया जैसे किसी ब्रांडेड कंपनी के मोबाइल की तरह ये फोन सालों साल साथ निभाने वाले नहीं हैं, ये बात आपको अपने दिमाग में पहले से बिठा लेना चाहिए।
विद्युत प्रकाश मौर्य



Saturday, 17 March 2012

खुले बोरवेल बच्चों के लिए खतरा....

पहले कुरुक्षेत्र का प्रिंस और और आगरा की नन्हीं सी जान वंदना कुशवाहा। भले ही इन दोनों को बड़ी कोशिश करके बचा लिया गया। पर बोरवेल में बच्चों का गिर जाना कोई पहला हादसा नहीं है। ऐसे हादसे आए दिन देश के किसी न किसी कोने में हो रहे हैं। इसमें कुछ खुशकिस्मत बच्चे हैं जो समय पर सहायता मिल जाने के कारण बच जा रहे हैं। पर कई ऐसे हादसे में नन्हें मुन्नों को अपनी जान से हाथ धोना भी पड़ा है। ऐसे में जरूरत इस बात की है, हम ऐसे खुले बोरवेल से सावधान रहे हैं। साथ ही जरूरत खत्म होने के बाद ऐसे बोरवेल को तुरंत बंद किया जा जिससे की बोरवेल और नौनिहालों की जान नहीं ले सकें। प्रिंस और वंदना के मामले में सेना का धन्यवाद करना पड़ेगा कि जवानो ने मुस्तैदी दिखाकर इन बच्चों को बचा लिया। पर हमें यह भी देखना पड़ेगा कि ऐसे आपरेशन में कितनी बड़ी राशि खर्च हो जाती है। सेना और प्रशासन के लोगों को कई दिनों तक बाकी के काम छोड़कर इसी में लगे रहना पड़ता है।

अगर हम प्रिंस या वंदना की बात करें तो उनकी जान बच गई इसमें उनकी जीजिविषा और जैसे हालात में वे जीवन गुजारते हैं वह भी खूब जिम्मेवार है। वर्ना बिना कुछ खाए पीए एक दिन से ज्यादा संकरे से बोरवेल में पड़े रहना कितना मुश्किल हो सकता है। कई लोगों की जान तो ऐसी जगह पर पड़े पड़े ही जा सकती है। प्रिंस के बारे में कहा गया कि वह गरीब का बच्चा था इसलिए बच गया। गरीब के बच्चे को कई कई घंटे तक खाना नहीं मिलता तो भी जीते रहते हैं। ऐसी हालात में उनकी भूखे रहने की क्षमता में इजाफा हो जाता है। अगर वे किसी मिड्ल क्लास या अमीर के बच्चे हों तो उनका ऐसे में बच पाना ज्यादा मुश्किल हो जाता है। ऐसे में हमें खुले बोरवेल को लेकर ज्यादा सावधान रहने की जरूरत है। जो लोग कच्चे बोरवेल की खुदाई करते हों उन्हें चाहिए वे काम खत्म होने के बाद इस बोरवेल को अच्छी तरह ढक दें।
अगर हम इस मामले में मीडिया की बात करते हैं तो उन्हें ऐसी किसी खबर के समय लाइव शो करने का अच्छा मौका मिल जाता है। ऐसे लाइव शो दिखाकर अच्छी खासी टीआरपी गेन करने की संभावना बढ़ जाती हैं। जब कुरूक्षेत्र में प्रिंस गड्ढे के नीचे गिरा था तब सभी चैनलों ने अपने ओबी वैन घटनास्थल पर लगा दिए और लाइव शो दिखाना शुरू कर दिया। सारे देश का ध्यान अपनी ओर खींच लिया। ऐसी किसी खबर के समय लोग अन्य चैनल भी देखना छोड़कर समाचार चैनलों की ओर ही स्विच कर लेते हैं। हालांकि प्रिंस या वंदना को गड्ढे से निकाल पाने में इन समाचार चैनलों की कोई भूमिका नहीं होती। पर ऐसा लाइव ड्रामा दिखाने का मौका कोई चूकना नहीं चाहता।
 प्रिंस के समय में भी और आगरा की वंदना कुशवाहा के समय भी सभी चैनलों ने पल पल की लाइव खबर दिखाकर खूब टीआरपी बटोरी। प्रिंस को तो कुछ चैनलों ने बड़ा बहादुर लड़का घोषित किया और उसे मुंबई लेकर गए और बड़े बड़े सितारों से ले जाकर मिलवाया। यह सब कुछ प्रिंस के परिवार वालों के लिए किसी सपने जैसा था। अब प्रिंस की पढ़ाई लिखाई भी अच्छे स्कूल में हो रही है। पर देश में लाखों करोड़ो गरीब परिवारों के बच्चों के साथ ऐसा नहीं होता, जो विपरीत परिस्थितियों में धीरे-धीरे बड़े होते जाते हैं। लोगों की रूचि किसी लाइव ड्रामा में तो जरूर है, पर गरीब के बच्चों से असली संवेदना किसे है....किसी शायर ने लिखा है...
बहुत बेशकिमती है आपके बदन का लिबास, किसी गरीब के बच्चे को प्यार मत करना....

-विद्युत प्रकाश मौर्य vidyutp@gmail.com

Thursday, 15 March 2012

ये ब्रांड का दौर है....हाट बाजार पर खतरा

अब किसी महानगर में जब बाजार को जाएं तो सब कुछ आप किसी ब्रांडेड शाप से खरीद सकते हैं। हो सकता है आने वाले दिनों में महानगरों से हाट बाजार जैसी चीजें विलुप्त हो जाएं। जी हां अब आप आलू प्यार माचिस और चटनी बनाने के लिए धनिया का पत्ता सब कुछ किसी वातानुकूलित मॉल से खरीद सकते हैं।

मजे की बात कि वहां से आप एक रुपये का सामान भी खरीद सकते हैं। यानी की परंपरागत सब्जी बाजार जिसे उत्तर भारत में हाट या दक्षिण में रायतु बाजार बोलते हैं इस पर बड़े उद्योगपतियों का तेजी से कब्जा हो रहा है। इससे बाजार की तस्वीर तेजी से बदल रही है। अब जब आप सब्जी खरीदने जाते हैं तो बाजार की भीड़भाड़ गंदगी से आपको निजात मिलती है।

वातानुकूलित चमचमती रिलायंस की दुकान रिलायंस फ्रेश पर आपका स्वागत किया जाता है और आप हर प्रकार की सब्जियां और फल अपनी मर्जी के वजन से खरीद सकते हैं। यहां परंपरागत हाट की तरह मोलजोल करने की कोई जरूरत नहीं है। अगर आपके पास रुपए नहीं हैं तो आप भुगतान क्रेडिट कार्ड से भी कर सकते हैं। माल का स्टाफ आपका सामान आपकी कार तक ले जाकर रख आएगा। 

रिलायंस फ्रेश की शुरआत हैदराबाद से हुई पर उसने अब देश की राजधानी दिल्ली में दस्तक दे दी है। हैदराबाद शहर में तो सिर्फ रिलायंस ही नहीं कई और ब्रांडेड शाप शहर के हर हिस्से में खुल चुके हैं जो बाजार के लगभग हर हिस्से पर कब्जा जमा चुके हैं। यहां दक्षिण की सबसे पुरानी त्रिनेत्रा डिपार्मेंटल स्टोर की चेन है जो अब आदित्य विक्रम बिड़ला समूह का हिस्सा बन चुकी है।

वहीं शुभिक्षा, फूड लैंड, हेरिटेज, फूड लैंड जैसे स्टोरों की चेन हर जगह खुल चुकी है। यहां दवाएं, घरेलू राशन और सब्जियां तथा क्राकरी आदि सब कुछ उपलब्ध है। बिग बाजार और स्पेंसर की तुलना में इनकी उपस्थिति महानगर के बाहर इलाकों और विकसित हो रही कालोनियों में भी है।

लोगों का एक बड़ा वर्ग इनसे शापिंग कर रहा है। ये दुकानें जहां अपने नियमित ग्राहकों को लायल्टी प्वाइंट प्रदान करती हैं वहीं किसी ने मुफ्त में स्वास्थ्य बीमा देने का आफर भी आरंभ किया है। विभिन्न प्रकार के सामन को कम कीमत पर बेजने के लेकर इनके बीच एक प्रतिस्पर्धा भी देखने को मिल रही है। जाहिर है कि इसका फायदा ग्राहकों को ही मिलता है। परंपरागत किराना के दुकानदारों के लिए इन बड़े ब्रांडेड स्टोरों के सामने टिकपाना मुश्किल हो रहा है। वहीं अब सब्जी के हाट में जाने वाले ग्राहक भी बड़े रिटेल स्टोरों के चेन की ओर ही रुख कर रहे हैं। महानगरों में किराने की दुकान चलाने वाले कई दुकानों की रोजाना की सेल में गिरावट आने लगी है वहीं उनमें से कई अपना शटर गिराने की भी सोचने लगे हैं।

अगर हम किराना के दुकानों के मामले में देखें तो इस तरह की खरीददारी में ग्राहकों को लाभ है क्योंकि उसे कई तरह के सामान पहले की तुलना में सस्ती दरों पर मिल रहे हैं। वहीं बड़े रिटेल स्टोर ग्राहकों को कई बड़े सामान के साथ छोटे सामान मुफ्त का भी आफर मिलता रहता है। फिर भी ग्राहकों को किसी रिटेल चेन से सामान खरीदने से पहले दूसरे रिटेल स्टोर से दरों की तुलना करते रहना चाहिए। वहीं हमेशा किसी एक स्टोर से खरीददारी करने के बजाए कभी कभी दूसरे स्टोर में जाकर वहां के दरों की भी तुलना करते रहना चाहिए। कई बार अलग अलग स्टोरों में एक ही सामान के रेट में अंतर हो सकता है। इसलिए यहां से आंखें बंद करके खरीददारी करना उचित नहीं है।
- विद्युत प्रकाश मौर्य  ( साल 2007 ) 



Wednesday, 14 March 2012

टैक्स बचत की अप्रैल से ही करें प्लानिंग

आमतौर पर फरवरी और मार्च में नौकरी पेशा लोग काफी परेशान दिखाई देते हैं। उन्हें यह परेशानी होती है कि आखिर रुपया कहां लगाएं जिससे की कर बचत की जा सके। कई लोगों की हालत होती है कि मार्च का पूरा वेतन कर देने से बचने के लिए सेविंग में चला जाता है। कई लोगों का तो दो महीने का वेतन भी टैक्स में चला जाता है। अगर नहीं भी जाए तो फरवरी मार्च में उनके परिवार का बजट जरूर खराब हो जाता है। अगर आपने किसी तरह लोन ले रखा है तो उसकी किस्त देने में और भी हालत बुरी हो जाती है। इन सबसे बचा जा सकता है अगर आप थोड़ी अक्लमंदी से काम लें। आप नया वित्तीय वर्ष आरंभ होने के समय ही यह जांच कर लें कि आपका इस साल का सालाना वेतन या कुल आमदनी कितनी बनेगी इस पर टैक्स कितना देना पड़ेगा। इसके साथ ही यह गणना करवाएं कितना रुपया आप अमूमन साल भर में बचत कर सकते हैं। उसके बाद कितना राशि बचती है जिस पर आप सरकार को कर अदा करना चाहते हैं।
कर बचाएं या अदा करें-
कर बचाने के लिए बचत का सीधे अर्थों में यह फंडा है कि आप जितना टैक्स बचाना चाहते हैं उसका पांच गुना रुपया आपको टैक्स सेविंग स्कीम में बचत करनी पड़ती है। यह राशि विभिन्न सरकारी योजनाओं में जाती है। इसमें आमतौर पर आठ से नौ फीसदी तक ब्याज होता है साथ ही इस राशि का लाक इन पीरियड भी होता है। इसलिए आप यह भी देखें की कर के लिए रुपया बचाना अच्छा है यह उस राशि पर कर अदा कर देना ही अच्छा है। आमतौर पर हर व्यक्ति को साल में कुछ राशि कर के रुप में भी अदा करनी चाहिए। कर के लिए आप जो रुपया बचाते हैं वह राशि आपको आठ साल बाद दुगुनी होकर मिलती है। पर महंगाई की दर से देखें तो उस राशि की क्रय शक्ति उस समय कम हो जाती है।
हर महीने करें बचत

टैक्स बचत के लिए आप जो रुपया विभिन्न सेविंग स्कीम में लगाना चाहते हैं उसे आप फरवरी मार्च के महीने में भी न लगाकर हर महीने बचत की योजना पर काम करें। आप अप्रैल से अगले मार्च महीने तक 12 महीने तक कर बचाने के लिए बचत करें। इससे आपके बजट पर बोझ नहीं पड़ेगा। जैसे आपको वेतन के साथ करने वाले ईपीएफ या जीपीएफ से मिलने वाली कर रियायत, मकान किराया, बच्चों की फीस आदि के बाद आपको 40 हजार रुपए साल में टैक्स सेविंग स्कीम में लगाने की जरूरत पड़ती है। इसमें पहला तरीका यह हो सकता है कि फरवरी या मार्च में आप 40 हजार रुपए किसी एक योजना में लगाएं। दूसरा तरीका यह हो सकता है कि आप हर महीने साढ़े तीन हजार रुपए किसी एक योजना में लगाएं।
अगर आपने जीवन बीमा करा रखा है तो उसमें की जाने वाली बचत से मिलने वाले कर लाभ का भी लाभ उठाएं। मकान खऱीदने के लिए मिलने वाले लोन पर भी कर रियायत मिलती है। इस बारे में भी अपने कर सलाहकार से राय लें।
अब महत्वपूर्ण तथ्य की कर बचाने के लिए किन योजनाओं में पैसा लगाएं। अब राष्ट्रीय बचत पत्र (एनएससी) खरीदना अच्छे विकल्पों में नहीं है। आप हर महीने आवर्ती जमा की तरह पीपीएफ में पैसा जमा कर सकते हैं या फिर इक्विटी लिंक्ड सेविंग स्कीम( इएलएसएस) यानी म्युचुअल फंड में भी पैसा लगा सकते हैं।
- विद्युत प्रकाश मौर्य 


Tuesday, 13 March 2012

कैरियर में बने रहें लगातार एक्टिव

कैरियर के बीच में कई बार ऐसा समय आ जाता है जब आपको नौकरी ढूंढने में दिक्कत होती है या वर्तमान स्थान पर खुद को एडजस्ट करने में परेशानी होती है। ऐसी दिक्कतों से थोड़ी कोशिश करके निपटा जा सकता है। आप अपनी नौकरी भी बदल सकते हैं, परेशानी दूर कर सकते हैं और जीवन खुशहाल बना सकते हैं। अक्सर देखा गया है कि कुछ लोग किसी भी पड़ाव पर जॉब बदल लेते हैं, लेकिन कुछ लोग अंतिम विकल्प के रूप में ही अपनी नौकरी बदलते हैं। इसका कारण लीडरशिप क्वालिटी में अंतर का होना है। जो लोग कैरियर में लगातार एक्टिव बने रहते हैं उन्हें ज्यादा दिक्कतों का सामना नहीं करना पड़ता है वहीं जो लोग ज्यादा एक्टिव नहीं रहते हैं उन्हें परेशानी पेश आती है। 


जीवन में सार्थक मिशन बनाएं
अक्सर करियर के मध्यकाल में लोग आपके काम अर्थ को लेकर ज्यादा सवाल उठाते हैं, साथ ही कंपनी के मिशन की वैल्यू, नौकरी में आजादी और अपने योगदान आदि के बारे में ज्यादा सोचा जाता है। कई बार ऐसा भी होता है कि इस स्तर पर आकर खुद को कंपनी के साथ जोड़कर रखना मुश्किल लगने लगता है। 


ऐसे में लोगों का अपनी वर्तमान जगह और नौकरी, दोनों से मोह टूटने लगता है। काम करने में मन नहीं लगता है और व्यक्ति तनावग्रस्त हो जाता है। कई बार ऐसा तब होता है जब आपके जीवन में कोई मिशन नहीं हो। अगर आप जीवन में मिशन लेकर चल रहे हैं तो करियर में बोरियत भरा नहीं होता। 


दीर्घकालिक योजना बनाएं 
कभी भी करियर को एक दो महीनों या साल में नहीं बल्कि लंबी अंतराल के रूप में देखना चाहिए और इसी के हिसाब से योजना बनानी चाहिए। करियर का लक्ष्य तय करते समय लंबी अवधि के विकल्प पर विचार करना चाहिए। इसके साथ ही करियर में हमेशा पारदर्शिता बरतनी चाहिए। इससे एक तरफ जहां कार्य स्थल में आपकी विश्वसनीयता बढ़ेगी वहीं दूसरी तरफ खुद आपका आत्मविश्वास भी बना रहेगा। 




खुद को नया बनाएं
समय कुछ नया करने का है। चाहे कोई भी क्षेत्र हो अगर आगे बढऩा है तो हमेशा कुछ नए की जरूरत होती है। इसलिए हमेशा इस बात की कोशिश करते रहना चाहिए जो कुछ भी नया हो रहा है उसे सीखा जाए और अच्छे से अपनाया जाए। हर प्रोफेशनल क्षेत्र में विशेष रूप से लागू होता है। कुछ लोग करियर के शुरुआत में जो सीखते हैं उससे आगे कुछ नया नहीं सीखना चाहते हैं। 

Monday, 12 March 2012

मैनेजमेंट गुरू से राजनीति का सफर

अभिषेक मिश्रा यूपी में समाजवादी पार्टी के बदलते हुए चेहरे के प्रतीक हैं। लखनऊ उत्तर से चुनाव जीत कर विधान सभा में कदम रखने वाले अभिषेक मिश्रा आईआईएम अहमदाबाद में प्रोफेसर की नौकरी छोड़कर आए हैं। 

भले ही कुछ लोग समाजवादी पार्टी को गुंडों और जेल से चुनाव लड़ने वाले नेताओं की पार्टी मानते हैं लेकिन अब समाजवादी पार्टी तेजी से बदल रही है। मुलायम सिंह यादव के बेटे अखिलेश खुद भी विदेशी विश्वविद्यालयों से ऊंची पढ़ाई पढ़कर राजनीति में आए हैं। 


बताया जा रहा है कि आईआईएम में पढ़ा रहे अभिषेक को अखिलेश यादव ने दो साल पहले समाजवादी पार्टी से जोड़ा। पार्टी की नीतियां बनाने में इस मैनेजमेंट गुरू की बड़ी भूमिका रही है।

 समाजवादी पार्टी के घोषणा पत्र में छात्रों को मुफ्त में लैपटॉप और टैबलेट देने की बात हो या फिर बेरोजगारी भत्ता और शिक्षा को लेकर नई योजनाएं इन सबके पीछे थींक टैंक के रूप में अभिषेक मिश्रा काम कर रहे थे। ये अभिषेक और अखिलेश द्वारा बनाई गई चुनावी रणनीति का एक भाग है, जिसे पार्टी पूरा करने के हर संभव प्रयास करेगी। इतना ही नहीं प्रचार प्रसार के लिए अखिलेश यादव ने वही तरीके अपनाए, जो अभिषेक मिश्रा ने उन्हें  सुझाया। हालांकि अभिषेक पार्टी के थींक टैंक ही बने रहना चाहते थे लेकिन बताया जा रहा है कि अखिलेश यादव ने अभिषेक को चुनाव लड़ने के लिए तैयार किया।

अभिषेक मिश्रा आईआईएम में मैनेजमेंट के छात्रों को बिजनेस पॉलिसी पढ़ाते थे। वे पूर्व आईएएस जेएस मिश्र के बेटे हैं लेकिन अब मैनजमेंट की क्लास छोड़कर राजनीति की रपटीली राहों पर चल पड़े हैं। अभिषेक जैसे चेहरे से उम्मीद की जा सकती है कि यूपी की राजनीति का चेहरा जरूर बदलेगा। साथ ही वे समाजवादी पार्टी की छवि को भी बदलने में सहायक होंगे जिसे आमतौर पर यूपी में लाठी भांजने वालों की पार्टी माना जाता है। उम्मीद है अखिलेश यादव उनका बेहतर उपयोग करेंगे और दोनों युवा मिलकर यूपी में नई इबारत लिखेंगे।

- विद्युत प्रकाश मौर्य

Wednesday, 7 March 2012

छोटे निवेशक बाजार पर रखें नजर....

आप छोटे निवेशक हैं तो भी आपको बाजार पर नजर रखना चाहिए। शेयर बाजार में पैसा लगाना और धन कमाना अच्छी चीज है पर आपके आंख और कान खुले होने चाहिए। आम तौर पर बाजार में दो तरह के निवेशक हैं एक वे जो पैसा लंबे समय के लिए लगाते हैं और एक वे जो पैसा लगाकर तुरंत लाभ कमाना चाहते हैं। जो लोग पैसा लगाकर तुरंत लाभ कमाना चाहते हैं उन्हें और भी सावधान रहना चाहिए। बाजार से तुरंत लाभ कमाना जोखिम भरा है। यह एक तरह का जुआ भी है।


रोज लाभ कमाना जुआ- कुछ लोग शेयर में निवेश करते हैं और रोज लाभ कमाते हैं। सुबह एक लाख रूपया किसी शेयर में निवेश किया और चार घंटे बाद अगर दो रूपये प्रति शेयर का लाभ होता दिखाई दिया तो बेच दिया। इसमें कई बार लाभ होता है तो कई बार घाटा भी हो जाता है। जो लोग पहली बार निवेश करते हैं और उन्हें घाटा हो जाता है तो वे बाजार से बहुत निराश हो जाते हैं। साथ बहुत बड़ी राशि निवेश करने वालों को भी बाजार कई बार बड़ा घाटा देता है। पर ऐसे लोग ये भूल जाते हैं कि इसी बाजार ने उन्हे कई बार बहुत बड़ा फायदा भी कराया है। 

निवेश में संयम बरतें - बाजार के नियमित निवेशकों को बाजार के ऐसे उतार-चढ़ाव के समय संयम बरतना चाहिए। जो लोग बाजार में यह सोच कर आते हैं कि उन्हें अपने धन से तुरंत कोई बड़ा लाभ हो जाएगा तो कई बार उन्हें लाभ हो जाता है पर कई बार उन्हें इसमें बड़ा घाटा भी हो जाता है।

दीर्घकालिक निवेश में फायदा - अगर हम बाजार के लंबे ट्रैक रिकार्ड को देखें तो यह पाएंगे कि जिन लोगों ने अपना धन लंबे समय के लिए निवेश किया है उन्हें बाजार से कोई घाटा नहीं हुआ है। अगर आपका पैसा म्चुअल फंडों में तीन साल या उससे ज्यादा समय के लिए जमा रहा है तो आमतौर पर यह बहुत फायदा देकर गया है। अगर कोई 15 साल से शेयर बाजार में नियमित निवेश करता आ रहा है तो उसे भी बाजार से कोई घाटा नहीं हुआ है। 

अगर हम बाजार में हर्षद मेहता और केतन पारिख जैसे बड़े घोटालों पर भी नजर डालें तो भी बाजार इन सबसे उबर कर फिर से उठ खड़ा हुआ है और लंबे समय से धन का निवेश करने वालों को कोई घाटा नहीं हुआ है। जनवरी 2008 में एक बार फिर बाजार में तेज गिरावट आई है। दुनिया की कई बड़ी कंपनियों के घाटे के कारण भारत के शेयर बाजार अचानक 25 से 30 फीसदी तक नीचे गिरा है। पर इसके आधार पर ऐसा नहीं कहा जा सकता है कि हमें भारतीय शेयर बाजार से निराश होने की जरूर है। दरअसल बांबे स्टाक एक्सचेंज के सेंसेक्स ने एक साल में 13 हजार से 21 हजार तक का सफर तय कर लिया तो लोगों को लगने के लगा कि बाजार में बढ़त इसी गति से हमेशा जारी रहेगी। पर हमेशा ऐसा नहीं होता। अगर बैंक के फिक्स डिपाजिट या अन्य जमा योजनाओं में आपका रूपया आठ फीसदी की गति से बढ़ता है तो शेयर बाजार में आपका रुपया 20 से 25 फीसदी की गति से भी बढ़े तो इसको बहुत अच्छा रिटर्न मानना चाहिए। पर शेयर और म्यूचुअल फंड कई बार साल में 50 से 100 फीसदी तक रिटर्न दे जाते हैं। पर इसमें जब तेजी से गिरावट आती है तो निवेशकों के दिल की धड़कन तेज होने लगती है।

शेयर बाजार में निवेश करने वालों को यह बात अच्छी तरह याद रखनी चाहिए कि बाजार में निवेश में जोखिम है। जनवरी फरवरी में बाजार में बड़ी गिरावट आने के बाद भी जिन लोगों ने आठ दस महीने पहले बाजार में पैसा लगाया है उन्हें कोई नुकसान नहीं हुआ है।
- vidyutp@gmail.com 



Monday, 5 March 2012

छोटे परदे पर ये कैसे कैसे गुरू....

भारतीय संस्कृति में गुरू की तुलना ऐसे कुम्हार से की गई है जो घड़े के अंदर हाथ डालता और बाहर धीरे धीरे चोट मारता है जिससे घड़ा सुंदर आकार ले पाता है। ठीक उसी तरह गुरु भी शिष्य के अंदर की तमाम अच्छाईयों को बाहर लाता है और उसे सुंदर बनाता है, ठीक उसी कुम्हार की तरह जो घड़े को सुंदर बनाता है। पर समय के अनुसार गुरूओं की नई पीढ़ी आ रही है।


आजकल टीवी पर संगीत प्रतियोगिताओं में गुरूओं का नया रुप देखने को मिल रहा है। ये गुरु अपने शिष्यों की अच्छाई और बुराई का मंच पर ही छिद्रान्वेषण करते हैं। इस दौरान अगर तारीफ की जा रही है तो शिष्य बड़े खुश होता हैं उनका सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है, पर अगर गुरू उनकी निंदा करने लगे तो वे आंखों में आंसू ले आते हैं। मजे की बात एक गुरू तारीफ करता है तो दूसरा टांग खींचता है..यह सब कुछ चलता रहता है और देश दुनिया के करोडो लोग इस शो को देख रहे होते हैं। लोगों को यह सब कुछ बड़ा नेचुरल सा लगता है। यह ठीक उसी तरह होता है जैसे किसी बडे मामले पर फैसला करने के लिए अदालत में जूरी बैठती है। ये गुरू भी कुछ कुछ जूरी के मेंबरों की तरह ही तो होते हैं। पर अदालत में जो जूरी बैठती वह बंद कमरे में होती है। पर यहां पर गुरू करोड़ों लोगों को अपने अपने अंतर्विरोध दिखाते हैं। अगर आप संगीत प्रतियोगिताओं में होने वाली वास्तविक मानते हैं तो आप किसी गलतफहमी में जी रहे हैं। दरअसल यह सब कुछ एक हाई प्रोफाइल नाटक की तरह होता है। ऐसा लगता है मंच पर दो संगीत के जानकार किसी बात को लेकर लड़ रहे हैं। पर यह लड़ाई एक दम नाटकीय होती है। लोगों को तो लगता है कि एक शिष्य को लेकर दो गुरू लड़ रहे हैं पर यह लड़ाई महज धारावाहिक को सेलेबल बनाने के लिए होता है। दर्शकों का ध्यान खींचने के लिए होता है। कोई संगीतकार किसी टैलेंट को लेकर कहता है कि तुमने इतना खराब गाया कि उम्मीद ही नहीं थी। तुम बिल्कुल चल नहीं पाओगे....जैसे बिल्कुल हतोत्साहित करने वाले शब्दों का इस्तेमाल ये गुरु करते हैं। यह सब कुछ मंच पर किसी को अपमानित करने के जैसा ही होता है। अगर किसी की गायकी में कमी है तो उसके बारे में सरेआम मंच पर बताने की क्या जरूरत है।

मजे की बात है इन संगीत प्रतियोगिताओं में जज हैं सभी भारतीय शास्त्रीय संगीत की महान परंपराओं से अवगत है। जहां पर गुरू शिष्य़ का इतना सम्मान करता है कि उनका जितनी बार नाम लेता है उतनी बार कान को उंगली लगता है। वहीं पर शिष्य भी अपने गुरू का काफी सम्मान करता है। दोनों कभी किसी की सार्वजनिक रूप से निंदा नहीं करते हैं। रिश्तों को नाटकीय नहीं बनाते हैं। पर यहां चीजों को नेचुरल टच देने के नाम पर एक अजीब सा नाटक किया जा रहा है। मजे की बात है कि ऐसे संगीत प्रतियोगिताओं में जावेद अख्तर, इला अरूण, उदित नारायण, अनु मलिक जैसे लोग जज हैं। पर सभी इन धारावाहिकों को कामर्सियल रुप से सफल बनाने की कोशिश में लगे हुए हैं।

यह जान पाना मुश्किल है कि वे संगीत प्रतियोगिताओं में जज की कुरसी पर बैठ कर जो कुछ एक्सपर्ट कमेंट देते हैं उनमें कितनी असलियत होती है। पर कई बड़े मनोरंजन चैनलों पर नाटक का यह सिलसिला जारी है। चूंकि इन संगीत सितारों की खोज के साथ चल रहा एसएमएस और अन्य तरीके से लोगों को जोड़कर रखने का सिल। इसलिए इन गुरुओं को भी नाटक करने को कहा जाता है...और ये गुरू व्यावसायिकता की होड़ में गुरू जैसी पवित्र संस्था को कलंकित कर रहे हैं।


Sunday, 4 March 2012

डीटीएच कंपनी का फर्जीवाड़ा

मैं कभी अपने डीटीएच पर मूवी बुक करके फिल्में नहीं देखता। लेकिन एक दिन मेरे मोबाइल पर अचानक मैसेज आता है कि आपके डीटीएच पर चैनल नंबर 155 और 156 पर दो मूवी बुक कर दी गई हैं। आपके खाते से सौ रूपये भी काट लिए गए हैं। यही संदेश अगले दिन भी आता है। यानी मेरे खाते में दौ सौ रूपये का डाका। जबकि मैंने फोन या एसएमएस किसी भी तरीके से कोई मूवी बुक ही नहीं कराई थी। मैंने अपने डीटीएच काल सेंटर को फोन लगाकर शिकायत दर्ज कराई। डीटीएच सेवा की काल एडेंट करने वाली बाला का व्यवहार बड़ा ही बदतमीजी भरा था। उसने कहा कि ऐसा हो ही नहीं सकता। आपने जरूर मूवी बुक कराई होगी। मैंने जवाब दिया न तो आनलाइन या फिर मोबाइल या एसएमएस से मैंने कोई मूवी बुक ही नहीं कराई। लेकिन काल सेंटर की एक्जक्यूटिव मेरा तर्क मानने को तैयार नहीं। मैंने कहा मेरे खाते से जो रूपये कटे हैं उसे रिवर्ट कराओ। लेकिन वे इसका रास्ता भी बताने को तैयार नहीं। खैर काफी बकझक के बाद भी मेरी समस्या का समाधान नहीं हुआ। तब मैंने कंपनी के नोडल आफिसर का नंबर मांगा। नोडल आफिसर को काल किया सारी परेशानी फिर से बताई। नोडल आफिसर ने मेरी समस्या को समझा और कंपनी की गलती मानी। मेरे खाते से कटे 200 रूपये अगले 24 घंटे में वापस आ गए। मुझे परेशानी हुई ये एक मुद्दा है। 

लेकिन सबसे बड़ा मुद्दा है कि कई डीटीएच कंपनियां अपनी कमाई बढ़ाने के लिए इस तरह का फर्जीवाड़ा बड़े पैमाने पर कर रही हैं। अगर आपने गंभीरता से अपना एसएमएस नहीं देखा तो आपके खाते से रूपये कटे। इस तरह लाखों कस्टमर के साथ धोखाध़ड़ी करके कंपनी ने करोड़ो कमा लिए। ये है उपभोक्ताओं को लूटने का एक तरीका। ये सब कुछ करने वाली कंपनी है एयरटेल डिजिटल। अगर आपके खाते में भी इस तरह का फर्जीवाड़ा हुआ है तो चुप मत बैठिए आवाज उठाइए...

-    विद्युत प्रकाश मौर्य

Thursday, 23 February 2012

शाबास ललितपुर...बना डाला रिकार्ड

यूपी का ललितपुर जिला। नक्शे में देखें तो तीन तरफ से मध्य प्रदेश से घिरा हुआ। लेकिन विधान सभा चुनाव 2012 के पांचवें चरण में यहां मतदाताओं ने दिखाया है सबसे ज्यादा जोश। ललितपुर में 71 फीसदी लोगों ने वोट डाले। तो कानपुर जैसे यूपी से सबसे बडे शहर में महज 55 फीसदी मतदान हुआ है।  ललितपुर विधान सभा में रिकार्ड 72.16 फीसदी वोट पडे हैं जबकि मेहरोनी में थोड़ा कम। लेकिन ललितपुर के मतदाताओं ने इतिहास रच दिया है। आजादी के बाद कभी इतनी बड़ी संख्या में किसी जिले में वोटर बाहर नहीं निकले। ये चुनाव आयोग के कंपेन का असर है या लोकतंत्र को लेकर गांव  गिरांव के वोटरों की जागरूकता। ये चुनाव का परिणाम आने पर बेहतर समझा जा सकेगा। लेकिन इतना तय है कि इस बार शहरी मतदाता की तुलना में गांव के मतदाता लोकतंत्र के प्रति ज्यादा जागरूकता दिखा रहे हैं। इससे पहले के मतदान मे भी देखें तो गोरखपुर शहर से ज्यादा मतदान उसके आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों में हुआ है। वाराणसी से ज्यादा मतदान नक्सल प्रभावित सोनभद्र, चंदौली और मिर्जापुर जिलों में हुआ। लखनऊ शहर से ज्यादा मतदान उसके आसपास के जिलों में हुआ।
चुनाव आयोग कहता है कि यूपी में वर्ष 2007 में हुए पिछले विधानसभा चुनाव के पांचवें चरण में कुल 47.57 प्रतिशत मतदान हुआ था। इस बार पांचवें चरण में 13 जिलों का मतदान प्रतिशत 59.2 फीसदी है। हिसाब लगाएं तो इस बार अपेक्षाकृत 24.44 प्रतिशत अधिक मतदान हुआ है। यूपी का मतदाता हर चरण में 2007 की तुलना में ज्यादा मतदान कर रहा है। पहले चरण में 8 फरवरी को 62 फीसदी मतदान हुआ था। आजादी के बाद पहली बार मतदान फीसदी में इतना इजाफा देखा गया। दूसरे चरण में भी 59 फीसदी वोट पड़े। तीसरे चरण में 57 फीसदी वोट पड़े तो चौथे चरण में भी 57 फीसदी मतदान हुआ।
बात एक बार फिर ललितपुर की करें तो बुंदेलखण्ड के इस अति पिछड़े जनपद में इस चुनाव में किसी दल विशेष की बयार नहीं दिखाई दे रही थी। जिले में दो विधानसभा क्षेत्र ललितपुर सदर व महरौनी हैं। नए परिसीमन में महरौनी को अनुसूचित वर्ग के लिए आरक्षित किया गया। सदर में 3,84607 कुल मतदाता हैं, जिनमें 1,80163 महिला मतदाता हैं। इसी प्रकार महरौनी में कुल मतदाताओं की संख्या 3,59612 है, यहां महिलाओं की संख्या 1,70069 है। अगर ललितपुर जिले में 72 फीसदी तक मतदान हुआ है तो वह किसके पक्ष में ये आकलन अभी मुश्किल हो सकता है। हांलाकि पिछले चुनाव में जिले की दोनो ही सीटें बीएसपी के पास थीं। पिछले चुनाव में दोनों सीटों पर बीएसपी के उम्मीदवार जीते थे। सदर में बसपा के नाथूराम कुशवाहा ने वीरेन्द्र सिंह बुंदेला को हराया तो महरौनी में उनके चचेरे भाई पूरन सिंह बुंदेला बसपा के ही रामकुमार तिवारी से चुनाव हार गए थे।

--- विद्युत प्रकाश   

कैब सेवा – महानगर के लिए सुविधाजनक


अगर आप को कभी कभी कार से चलने की जरूरत पड़ती हो तो कोई जरूरी नहीं कि आप खरीदें। इसके लिए आप कैब सर्विस की सेवाएं ले सकते हैं। जैसे कि आपको स्टेशन या एयरपोर्ट जाना है तो आप समय से पहले की कैब बुक कर लें। इससे आपकी एन वक्त पर गाड़ी ढूंढने की समस्या भी खत्म हो सकती है। अब महानगरों में 24 घंटे कैब बुक करने की सुविधा उपलब्ध है। जब आप किसी कैब कंपनी को कैब के लिए फोन करते हैं तो ये काल रेडियो फ्रिक्वेंसी से आपके आसपास मौजूद कंपनी के सभी कैब वालों तक जाती है। थोड़ी देर में ही आपके मोबाइल पर संदेश आ जाता है कि आपको कौन सी कैब, उसका नंबर क्या है, ड्राइवर का नंबर क्या है कितनी देर में आपके पास पहुंच जाएगी।
कैब सेवाएं कभी कभी कार का सफर करने वालों से सुरक्षित और सस्ती हैं। आपको अगर हफ्ते में एक दिन ही कार की जरूरत पड़ती है तो आप कार खरीदने के बजाए कैब की सेवा लें तो ये आपके लिए बेहतर विकल्प हो सकता है। आप अगर नई कार खरीदते हैं तो उसके रख रखाव में अच्छा खासा खर्च करना पड़ता है। साथ ही कार की सुरक्षा की चिंता भी रहती है। अगर आपने तीन लाख रूपये एक कार में निवेश किया है तो उसकी कीमत भी घटती रहती है। भले ही कार कम ही क्यों न चलती हो। मान लिजिए किसी काम से आपको कुछ दिनों के लिए दूसरे शहर में जाना हो तो चाह कर भी आप अपनी कार से स्टेशन नहीं जा सकते। क्योंकि आपकी कार को स्टेशन से वापस कौन लाएगा। ऐसी हालत में आप टैक्सी सेवा का ही सहारा लेते हैं। महानगरों में शुरू हुई कैब सर्विस ने परंपरागत टैक्सी स्टैंड की टैक्सी सेवा से बेहतर सेवा देनी शुरू कर दी है। यहां प्रति किलोमीटर रेट फिक्स है। ड्राइवर आपको बिल देता है। बिलिंग में पूरी तरह पारदर्शिता है। कैब सेवाओं के पास छोटी बड़ी हर तरह की टैक्सियां उपलब्ध हैं। अमूमन दिन हो या रात कभी भी कैब बुक कर सकते हैं। दिल्ली जैसे महानगर में कुछ टैक्सी सेवाएं 10 रूपये प्रति किलोमीटर तो कुछ 15 तो कुछ 20 रूपये प्रति किलोमीटर के रेट में सेवाएं उपलब्ध करा रही हैं। रात्रि सेवा और इंतजार के लिए अलग शुल्क है।   
हम आपको दिल्ली की कुछप्रमुख कैब सेवाएं को नंबर बता रहे हैं।  
टैक्सी सिंडिकेट – 011- 6767-6767
मेगा कैब       011-4141-4141
आइरिश        011-44334433
एयर कैब       011-48484848
इजी कैब       011-43434343
क्विक कैब      011-4533-3333
मेरू कैब       011-4422-4422
आरएस कैब     011-4433-4433
वान कैब       011-4800-0000
दिल्ली कैब     011-4433-3222

Tuesday, 7 February 2012

जमाने के साथ बदलती घड़ियां...

अब भला घड़ियां कौन पहनता है। मोबाइल फोन ने घड़ियों की जरूरत को खत्म कर दिया है। अगर सिर्फ समय देखना है तो अलग से घड़ी पहन कर चलने की क्या जरूरत है। मोबाइल फोन ने घड़ी और एड्रेस बुक साथ लेकर चलने की जरूरत को खत्म कर दिया है। ऐसे दौर में लोग आम तौर मोबाइल फोन साथ होने पर घड़ी पहनकर चलना जरूरी नहीं समझते। पर नहीं जनाब अभी भी घड़ियां आउटडेटेड नहीं हुई हैं। घड़ी बनाने वाली कंपनियां अब घड़ियों को भी नया रूप देकर उसे बहुउपयोगी बनाने में लगी हैं। अगर घड़ी में समय देखने के अलावा आपको कुछ और सुविधाएं भी मिलें तो निश्चय ही आप घड़ी पहनना पसंद करेंगे। अगर हम घड़ियों की पिछली पीढ़ी की बात करें तो मेकेनिकल घड़ियों में तारीख और महीना देखने की सुविधा उपलब्ध होती थी। क्वार्टज घड़ियों में भी इस तरह की सुविधा उपलब्ध थी। पर इनमें एक मुश्किल थी की महीना बदलने पर तारीख एडजस्ट करना पड़ता था। उसके बाद डिजिटल घड़ियों का दौर आया। ऐसी घड़ियों में तारीखेंकैलेंडर आदि अपने आप एडजस्ट हो जाता था। पर डिजिटल घड़ियां अपनी ड्यूरेब्लिटी और वाटर रेजिस्टेंस नहीं होने के कारण लोगों की पसंद नहीं बन सकीं।

पर दुनिया की कई जानी मानी कंपनियां घड़ियों में नित नए रिसर्च कर घड़ियों के बाजार को नया आयाम देने की कोशिश में लगी हुई हैं। जिस तरह कार के बाजार में महंगी कारों का सिगमेंट है। उसी तरह महंगी घड़ियों के सिगमेंट में कई तरह की सुविधाओं से सज्जित घड़ियां बाजार में आई हैं। फिनलैंड की जानी-मानी घड़ियों की कंपनी सुनोटो ने एबीसी सीरिज की घड़ियां लांच की है। एबीसी यानी इस घड़ी में समय देखने के अलावा एलमीटर, बैरोमीटर और कंपास जैसी सुविधाएं हैं। यह घड़ी सूर्योदय और सूर्यास्त का समय भी बताती है। घड़ी का मेनू चार भाषाओं में उपलब्ध है।
घड़ी में ड्यूल टाइम, काउंट डाउन टाइमर जैसी सुविधाएं मौजूद हैं। सुनोटो की घड़ियां अक्सर हवाई जहाज की यात्रा करने वालों, पर्वतारोहियों और पूरी दुनिया का भ्रमण करने वाले लोगों को लिए उपयोगी हो सकती हैं। सुनोटो की घड़ी अपने आप में एक वेदर स्टेशन की तरह है। घड़ी में बैरोमीटर है जो हवा दबाव, मौसम का ग्राफिक्स बताता है। मौसम खराब होने के समय आपको चेतावनी भी देता है। जब आप हवाई यात्रा कर रहे होते हैं तो 10 हजार मीटर की ऊंचाई तक घड़ी में मौजूद एलटीमीटर वहां के एलीवेशन की आपको जानकारी देता है।
गोताखोरी से जुड़े लोग, पहाड़ों पर चढ़ाई करने वाले, स्कीईंग और नौका चलाने वाले लोगों गोल्फ के खिलाड़ियों के लिए इस तरह की घड़ी बहुत उपयोगी है जो एक साथ कई तरह के समाधान प्रदान करती है। यानी अगर आप भविष्य में अधिक सुविधायुक्त घड़ी खरीदने की बात सोच रहे हैं तो सुनोटो के छह माडलों के बारे में भी सोच सकते हैं। हम यह भी कह सकते हैं लैपटाप और मोबाइल के जमाने में घड़ियां पूरी तरह आउटडेटेड नहीं हुई हैं।

-विद्युत प्रकाश मौर्य vidyutp@gmail.com

Tuesday, 17 January 2012

जिधर देखो उधर खली नजर आता है...

अगर आप टीवी के किसी भी समाचार चैनल की ओर रिमोट बदलें तो आपको खली की खबर देखने को मिलेगी। कहीं पर खली बीमार है यह खबर प्रमुखता से दिखाई जा रही है तो कहीं पर खली के घर जाकर उससे खास तौर पर बातचीत करके दिखाई जा रही है। इधर कुछ महीने से समाचार चैनलों पर खली सबसे बड़ी खबर है। कई बार खली की खबरें लगातार देखते हुए लगता है कि हम कोई समाचार चैनल न देख रहे हों बल्कि बच्चों का कोई कार्टून देखर रहे हों। जी हां, बच्चों को कार्टून में यही सब कुछ तो होता है। खली के रूप में हिंदी समाचार चैनलों को बड़ा खेवनहार मिल गया है। यह सब कुछ तब से शुरू हुआ जब खली ने अंडरटेकर को चुनौती दी। क्या खली अंडरटेकर को हरा पाएगा।

यह कयास लगाया जाना टीवी चैनलों के लिए सबसे बड़ी खबर थी। हालांकि खली अंडरटेकर को नहीं हरा पाया पर टीवी चैनलों को खली के रूप में एक बड़ा मशाला मिल गया। खली के साथ एक बड़ी बात है कि वह हिंदुस्तान का रहने वाला है। उसका असली नाम दिलीप सिंह राणा है और वह हिमाचल प्रदेश का रहने वाला है। वह डब्लू डब्लू ई में कुश्ती लड़ता है। बच्चे ऐसे कैरेक्टर को देखना खूब पसंद करते हैं। हालांकि खली कई सालों से डब्लू डब्लू ई में लड़ रहा है। पर कई सालों से समाचार चैनलों की नजर उसके उपर नहीं थी। सभी चैनलों की आंखे हाल में खुली हैं कि यह तो हमारे लिए बड़ा ही बिकाउ मशाल हो सकता है। इसलिए सभी बड़े चैनल खली को हर तरीके से भुनाने की कोशिश में लगे हुए हैं। खली लंबा है उसकी कद काठी कार्टून कैरेक्टर फैंटम जैसी है। ऐसे में बच्चों के लिए वह बड़ा ही प्यारा कैरेक्टर है। जाहिर बच्चे खली को देखना पसंद करते हैं। जब वह रिंग में सामने वालों की पिटाई करता है तो बच्चे वाह वाह करते हैं। यह अलग बात है कि डब्लू डब्लू ई के मुकाबले कितने हकीकत होते हैं। मशहूर पहलवान दारा सिंह कहते हैं। अगर देखा जाए तो वह भी कुश्ती ही है। पर वह कुश्ती किसी ओलंपिक या एशियाई खेल में मान्य नहीं होती। क्योंकि इस कुश्ती के नियम कानून अलग हैं। यह फ्री स्टाइल कुश्ती से भी अलग चीज है। अगर हम दूसरे शब्दों में कहें तो यह बच्चों को बेवकूफ बनाने वाली कुश्ती है। इसके रिजल्ट हकीकत से कुछ अलग होते हैं। डब्लू डब्लू ई के मुकाबले में कई बार हारने के लिए भी बड़ी इनाम राशि दी जाती है। अगर आप कभी टीवी पर इन मुकाबलों को देखें तो इसमें मुकाबला से ज्यादा नाटक होता है। इस कुश्ती में एक दूसरे को मारपीट कर घायल कर देने जैसा कुछ होता है। इसका ड्रामा बच्चों को खूब पसंद आता है।
कामेडी के बाद प्राइम टाइम पर चैनलों के लिए खली खबर बड़ा तमाशा है। टीवी चैनलों को इस बात से कुछ खास लेना देना नहीं है कि देश की संसद में किन महत्वपूर्ण मुद्दों पर बहस हो रही है। पर खली अगर हिंदी फिल्मों में काम करेगा इस तरह की कोई खबर आती है तो यह बड़ी बात बन जाती। टीवी चैनल इस बात को बड़ी प्रमुखता से दिखाते हैं कि खली आखिर तनुश्री दत्ता के साथ नाचता गाता कैसा लगेगा। इससे पहले खली हालीवुड के फिल्मों में भी एक्टिंग कर चुका है। पर उसका बालीवुड की फिल्मों में काम करना बड़ी खबर है। हम कह सकते हैं कि समाचार चैनल कुछ कुछ कार्टून और कामिक्स बुक्स की तरह होते जा रहे हैं। जहां कहीं अच्चा ड्रामा मिलता हो उसे लपक लो।
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रिटेल में बड़ी कंपनियों से खतरा....

देश भर में रिलायंस जैसी बड़ी कंपनियों के आने का विरोध शुरू हो चुका है। पर इसमें यह समझने की जरूरत है कि इसका विरोध कौन लोग कर रहे हैं। इन बड़ी कंपनियों के रिटेल सेक्टर में आने से घाटा किसे उठाना पड़ रहा है। छोटे कारोबारियों को यह खतरा नजर आ रहा है कि इन बड़ी कंपनियों के आने से उनका धंधा पूरी तरह बंद हो जाएगा। पर ऐसा बिल्कुल भी नहीं है। रिलायंस ने अपने रिटेल सेक्टर की शुरूआत हैदराबाद से की। पर यहां रेहड़ी पटरी के सब्जी विक्रेताओं ने इनका कोई विरोध नहीं किया। अक्सर रिलायंस ने अपना फ्रेश आउटलेट वहीं खोला है जहां सब्जी बाजार पहले से ही है। वहीं हैदराबाद जैसे शहर में कई और बड़ी कंपनियां ब्रांडेड माल में सब्जी बेचने का कारोबार कर रही हैं। पर इनसे छोटे मोटे सब्जी विक्रेताओं के व्यापार पर कोई बुरा असर नहीं पड़ा है। हाट में सब्जी बेचने वाले प़ड़ोस के गांव से लाकर ताजी सब्जी बड़े स्टोरों से भी सस्ते दरों पर बेच रहे हैं। उपभोक्ताओं को जहां बेहतर लगता है वहां से खरीददारी कर रहे हैं। पर रिलायंस, बिड़ला, आईटीसी, गोदरेज जैसी कंपनियों के सब्जी बाजार में प्रवेश करने से आढ़तियों और कमीशन एजेंटों को जरूर परेशानी हो रही है। ये लोग कई सदी से इस परंपरागत व्यापार को असंगठित तरीके से करते चले आ रहे हैं। आमतौर पर वे अपने खाताबही में हेरफेर करके बिक्री कर और मार्केट फीस में सरकार को बड़ा चूना लगाते हैं।

रिलायंस जैसी कंपनियां जहां रिटेल सेक्टर में आई हैं वहीं देश की कई प्रमुख मंडियों में वे कमीशन एजेंट के रूप में भी प्रवेश कर रही हैं। इससे पुराने आढ़तियों की परेशानी बढ़ गई है। क्योंकि ये ब्रांडेड कंपनियां किसानों से महंगी दरों में सब्जियों की खरीद फरोख्त करती हैं वहीं उपभोक्ताओं को सस्ती दरों पर बेच देती हैं यानी वे मुनाफा कम रखती हैं। इसलिए आढ़ती और कमीशन एजेंट चाहते हैं कि रिलायंस उनके कारोबार में प्रवेश नहीं करे। जबकि सरकार से वैध तरीके से लाइसेंस प्राप्त करके रिलायंस जैसी कंपनियां मंडी में कारोबार के लिए उतरी हैं। ठीक इसी तरह आईटीसी ने देश के कई राज्यों के गांवों में चौपाल सागर की शुरूआत की है। इसमें जहां किसानों को अपने अनाज को बेचने की सुविधा है वहीं यहां खाद बीज व उनके जरूरत की अन्य सभी वस्तुओं के खरीदने के लिए स्टोर भी है। यह एक ग्रामीण डिपार्टमेंटल स्टोर का नमूना है जहां किसानों के लिए जाना एक अच्छा अनुभव तो है ही साथ ही ऐसी मंडियां किसानों को परंपरागत व्यापारियों की तुलना में उपज का बेहतर मूल्य भी प्रदान करती हैं। परंपरागत मंडियों की तुलना में यहां तौल की प्रक्रिया में होने वाले खर्चों को भी कम किया गया है। पर पुराने परंपरागत व्यापारी अपने व्यापार करने के तरीके को बदलने के बजाय विरोध पर उतरना चाहते हैं।
विरोध की वास्तविक तस्वीर भी दूसरी है जिन शहरों में इस तरह के बड़े व्यापारियों का संगठित होकर विरोध हो रहा है उससे इन बड़ी कंपनियों को थोड़ी बहुत हानि अवश्य उठानी पड़ रही है। पर इस विरोध के बीच ही उन्हें व्यापक तौर पर प्रचार भी मिल रहा है। इस निगेटिव पब्लिसटी की सकारात्मक फायदा इन कंपनियों को मिल रहा है। कुछ लोगों को भविष्य में इनको मोनोपोली का डर जरूर सता रहा है पर चूंकि हर क्षेत्र में कई बड़ी कंपनियों का प्रवेश हो रहा है इसलिए मोनोपोली का संकट नहीं होगा, हर जगह प्रतियोगिता होगी जिसका लाभ उपभोक्ताओं को ही मिलेगा।


Monday, 16 January 2012

तीसरी पीढ़ी के मोबाइल...

-विद्युत प्रकाश मौर्य
बाजार में तीसरी पीढ़ी के मोबाइल फोन दस्तक दे चुके हैं। लंबे इंतजार के बाद सरकार ने भी थर्ड जेनरेशन मोबाइल फोन को अपनी सेवाएं शुरू करने की इजाजत दे दी है। सरकारी दूरसंचार कंपनियां एमटीएनएल और बीएसएनएल ने तो साफ कर दिया है कि वे अगले छह महीनों में थ्रीजी सेवाएं शुरू कर देंगी। यह मोबाइल के कम्युनिकेशन के क्षेत्र में एक नए युग की शुरूआत होगी। भारत में 12 सालों में मोबाइल फोन ने बहुत तेजी से विस्तार का सफर तय किया है।

अभी तक हम मोबाइल फोन का इस्तेमाल सिर्फ बातें करने के लिए करते थे। पर मोबाइल ने धीरे धीरे कई तरह की जरूररतें खत्म कर डाली हैं। बातें होने के साथ एसएमएस ने सबसे पहले टेलीग्राम जैसी चीजों की जरूरत खत्म की। उसके बाद मोबाइल फोन पर आए एफएम रेडियो ने अलग से रेडियो लेकर चलने की जरूरतें खत्म की। यानी बातें करते रहिए, जब बातें नहीं करनी हो तो गाने सुनने का आनंद उठाइए। इसलिए बसों में और सार्वजनिक स्थलों पर लोग मोबाइल फोन का इयरफोन कान में लगाए गाने सुनने का आनंद उठाते जर आते हैं। इसके बाद मोबाइल फोन में कैमरा आया। शुरूआती दौर में मोबाइल फोन के साथ मिलने वाला कैमरा बहुत सस्ती किस्म का था। वीजीए कैमरे में उपलब्ध क्वालिटी का कोई उच्च गुणवत्ता में इस्तेमाल संभव नहीं था। पर अब मोबाइल फोन के साथ दो मेगा पिक्सेल तक के कैमरे आ रहे हैं। इन कैमरों से खींची गई तस्वीरों का इस्तेमाल आप कहीं भी कर सकते हैं। इसका बढि़या इनलार्जमेंट करवाया जा सकता है और कहीं भी छपवाया भी जा सकता है। अब शौकिया मोबाइल कैमरे से खींचे गए फोटो कई बार बहुत अच्छे व्यवासायिक इस्तेमाल में आते हैं। कैमरे के साथ नई पीढ़ी के मोबाइन फोन में आईपोड ( गाना सुनने के लिए सांग बैंक) तो गेमिंग पैड भी आने लगे हैं।
अब थ्री जी मोबाइल आने के बाद मोबाइल युग में क्रांति आने वाली है। क्योंकि इस पीढी के मोबाइल फोन में आपको फोन पर ही मिलेगा हाई स्पीड इंटरनेट। यानी ब्राड बैंड जैसी नेट सर्फिंग अब मोबाइल फोन पर की जा सकेगी। इसके साथ ही बहुत ही तेज गति से हाई स्पीड डाटा ट्रांसफर किए जा सकेंगे। यानी कोई तस्वीरों का समूह या वीडियो भी मोबाइल के जरिए दुनिया के किसी भी कोने में भेजा जा सकेगा। यानी मोबाइल फोन आपका चलता फिरता दफ्तर हो सकता है। आप चाहें तो अपने फोन से ही किसी घटना का वीडियो बनाएं और उसे कहीं भी ट्रांसफर कर दें। तीसरी पीढ़ी के मोबाइल टीवी और अखबार में खबरों के संकलन में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। भारत जैसे देश में जहां मोबाइल फोन के कई श्रेणी के उपयोक्ता हैं, तीसरी पीढ़ी के मोबाइल का एक बड़ा ग्राहक वर्ग तैयार है इसके स्वागत के लिए। कारपोरेट यूजर और ए क्लास के लोग इस तरह की सेवाओं का उपयोग करना चाहते हैं। बाजार भी पहले से ही थर्ड जेनरेशन के मोबाइल हैंडसेट से पटा पड़ा है। एयरटेल और वोडाफोन ने थ्री जी सेवाओं से लैस मोबाइल फोन को लांच करने की पहले से ही तैयारी कर रखी थी। एप्पल अपना आईफोन इन कंपनियों के साथ बेचना शुरू कर रही है। यह आईफोन लैपटाप में उपलब्ध सुविधाओं से लैस होगा।




Tuesday, 10 January 2012

नई सड़कें तो बनानी पड़ेगी....

-विद्युत प्रकाश मौर्य
दिल्ली में आजकल बीआरटी कारीडोर को लेकर हंगामा मचा हुआ है। तेज गति से बसें चलाने के लिए खास कारीडोर सरकार ने बनवा तो दिया है पर लोग हंगामा कर रहे हैं कि यह कारीडोर लोगों के लिए परेशानी का सबब बन रहा है। यह सही है परेशानी तो हो रही है। पर सरकार भी क्या करे वह मजबूर है। बढ़ती आबादी के बोझ के मुताबिक उसे नए इंतजाम करने पड़ते हैं। दिल्ली में आबादी का बोझ जितना बढ़ गया है, उसके के हिसाब से तेज गति से सफर करने वाली सड़कों का निर्माण जरूरी होता जा रहा है। अब अगर आप दिल्ली में रहते हैं और आपका घर उत्तरी दिल्ली के किसी मुहल्ले में है और आपकी नौकरी या बिजनेस दक्षिणी दिल्ली के किसी बाजार में है तो आपका रोज आने जाने में ही छह सात घंटे खत्म हो जाते हैं।

बढ़ती आबादी का बोझ - दिल्ली की आबादी सवा करोड़ को पार कर चुकी है। अगर इसमें आसपास के महानगरों को भी शामिल कर लें तो यह आबादी डेढ़ करोड़ के भी उपर जा चुकी है। अब परिवहन और अन्य जरूरतें आने वाले 20 साल की योजना के अनुरूप जुटानी पड़ती है। ऐसे में दिल्ली को तेज गति वाली सड़कें और रेलगाड़ियां चाहिए। तभी रोज करोड़ों को लोगों को मंजिल तक पहुंचाया जा सकेगा। मेट्रो रेल के चल जाने से लोगों की सुविधाएं बढ़ी हैं। अब मेट्रो से 25 से 30 किलोमीटर की दूरी 30 से 40 मिनट में तय की जा सकती है। पहले बसों से यही सफर करने में तीन घंटे तक लग जाते थे। अब सरकार कुछ प्रमुख सड़कों पर भी तेज गति से चलने वाली बसें चलाना चाहती है। इसमें व्यवहार में कोई बुराई नहीं दिखाई देती। पर बीआरटी कारीडोर के ट्राएल में सरकार को असफलता मिली है। पर उम्मीद है कि उसकी समस्या दूर कर ली जाएंगी और लोगों को मेट्रो के बाद बसों में भी तेज गति से सफर करने का मौका मिल सकेगा।
ब्लूलाइन का दुखद सफर- अगर हम दिल्ली के बसों सफर पर नजर डालें तो दिल्ली की ब्लू लाइन बसों में चलना किसी दुखद सपने जैसा है कि वह भी गरमी के दिनों में। अब सरकार इस प्रयास में लगी है कि दिल्ली में बसों के सफर को भी आरामदेह बनाया जाए। इसी क्रम में लो फ्लोर बसें चलाई गई हैं। जिन रूट पर नई लो फ्लोर बसें चल रही हैं। उनमें चलने वाले लोगों का अनुभव बड़ा अच्छा है। अभी तक दिल्ली में मुंबई या हैदराबाद की तरह लोकल ट्रांसपोर्ट के लिए लक्जरी बसें या फिर एसी बसें नहीं चलाई गई हैं।
आरामदेह बसें चाहिए- अब दिल्ली सरकार एसी बसें लाने की बात कर रही है। सिर्फ एसी बसें ही नहीं बल्कि लंबी दूरी के लिए सुपर फास्ट सेवाएँ भी चलानी चाहिए। जैसे दिल्ली में जो प्वाइंट 20 किलोमीटर या उससे ज्यादा की दूरी पर हैं उनके बीच तेज गति वाली बसें चलनी चाहिए। इस क्रम में ग्रीन लाइन और ह्वाइट लाइन बसें चलाई गई थीं। पर उनमें समान्य बसों से कुछ खास अंतर नहीं था।
लंबी यात्रा करने वालों को वातानुकूलित (एसी) और आरामदेह बसें मिलनी चाहिए। इससे कार में सफर करने के बजाए लोगों बसों में सफर करना पसंद करेंगे। भीड़भाड़ वाले इलाकों में छोटी बसें भी चलाई जा सकती हैं जिसस लोगों को हर थोड़ी देर पर बसें मिल सकें। साथ ही लंबे दूरी की यात्रा में लगने वाले समय में भी कमी आएगी। इससे महानगरों में तेजी से बढ़ रही चार पहिया वाहनों की संख्या पर भी रोक लगाई जा सकेगी।