Tuesday, 18 November 2014

अच्छे दिन आए दिन आलू के ( व्यंग्य)

चुनाव से पहले उन्होंने कहा था - अच्छे दिन...आने वाले हैं। तो सबने इसका मतलब अलग अलग निकाला। अब आपने मतलब गलत निकालना तो इसमें गलती किसकी। हमारी एक सीनियर ने फेसबुक पर चिंता जताई। लगातार महंगाई के आंकडे धड़ाम हो रहे हैं। पेट्रोल सस्ता हो रहा है। सोना सस्ता हो रहा है। पर ये कमख्त आलू....आलू कई महीने से ऊंचाई पर खड़ा सबको चिढ़ा रहा है।

पर सच्चाई है कि आलू के अच्छे दिन आ गए हैं। आलू ने सबको अपनी औकात बात दी है। जैसे कभी बहु भी सास बनती है। उसी तरह सब्जियों में आलू को भी कभी तो जाकर राज सिंहसान पर बैठना ही था। तो आलू इन दिनों इतरा रहा है। गा रहा है – आए दिन बहार के। इसी दिन का तो इंतजार था। चार महीने से 40 रूपये किलो से कम होने का नाम ही नहीं ले रहा है आलू। चाहो तो आलू से सस्ते में सेब खरीद लो लेकर आलू टस से मस नहीं होगा। आपकी औकात नहीं है तो मत खाइए आलू। भिंडी या बैगन से काम चलाइए। जिस भोज में आलू की सब्जी बनी हो समझो कि वो अमीर का भोज है। जिस घर में आलू बन रहा हो तो समझो वहां अभी पैसे की गरमी बरकरार है।
आलू तो कई दशक से सब्जियों का राजा था। पर हम उसे हिकारत भरी नजरों से देखते थे। आलू मटर, आलू बैंगन, आलू-गोभी, आलू दम, हर रूप रंग में आलू थाली की शोभा बढ़ाता था। चाहे भरता बना लो चाहे भूजिया बना लो। बड़ी बड़ी कंपनियां आलू के चिप्स बनाकर मालामाल हो रही हैं। फिर भी हम आलू का महत्व कम करके आंकते थे। पर अच्छे दिन आने वाले थे। और अब आ गए। शायद आगे भी बने रहेंगे।
आपको पता है आलू विदेशी मूल की फसल है। तभी तो ये गोरा होता है। आलू पेरू से चलकर भारत पहुंचा। पर हमने इस विदेशी तने की कदर नहीं जानी। आलू प्रोटीन और खनिज से भरपूर होता है। आलू में स्टॉर्च, पोटाश और विटामिन ए व डी होता है। पर हम उसकी कदर नहीं करते। आलू के छिलके के नीचे विटामिन होता है। पर हम उसके छिलके को उतार कर फेंक देते हैं। आलू हमारी मूर्खता पर हंसता है। इसलिए अब आलू अपनी कीमत का अहसास करा रहा है। जब से आलू महंगा हुआ है लोगों ने छिलका उतारना छोड़ दिया है। हार्टिकल्चर प्रोड्यूस मैनेंजमेंट इंस्टीट्यूट (एचपीएमआई) लखनउ ने अपने रिसर्च में पाया है कि आलू संपूर्ण आहार है। इसमें वसा की मात्रा कम है और लो कैलोरी फूड है। यानी आलू के बारे में सदियों से दुष्प्रचार जारी था। तो अब भुगतिए आलू ने ने थोड़ा गुस्सा दिखा दिया है। आलू इतरा रहा है। वह पंचम सुर में गा रहा है। वह गरीबों की थाली की सब्जी नहीं रहा अब। सिर्फ कश्मीर के लोग आलू को इज्जत से देखते थे जो बड़े सम्मान से कश्मीरी दम आलू बनाते हैं वह भी बिना लहसुन प्याज के। अब पूरे देश के लोगों को आलू का सम्मान करना सीख लेना चाहिए। आलू अब सिंहासन से नीचे नहीं उतरने वाला...जय हो आ गए अच्छे दिन....
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---- विद्युत प्रकाश मौर्य



Sunday, 16 November 2014

दिल्ली की दिल्लगी ( व्यंग्य)

अल्ल सुबह सूटकेस और बैग लिए नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर उतरा। ये पता लगाना कठिन था कि मेरी अपेक्षित बस पहाड़गंज इलाके से मिलेगी या फिर अजमेरी गेट साइड से। लिहाजा मैं अजमेरी गेट की तरफ ही आ गया। लंबी यात्रा करके आया था सो भूख लगी थी। 

एक फुटपाथ के होटल को सस्ता समझकर उसमें खाने बैठ गया। दो पराठे खाए..बिल आया महज 44 रूपये। जब मैंने दुकानदार से पूछा तो उसने कहा 4 रूपये तो पराठे के 40 रूपये भुर्जी के। दुकानदार ने पराठे के साथ बिना पूछे जो भुर्जी डाल थी वह 40 रूपये की हो सकती है। तब जीवन में शिक्षा मिली बिना होटल वाले साफ साफ मीनू पूछे दिल्ली में कहीं कुछ भी खाना मत। क्या पता खाने के बाद वहीं प्लेटें साफ करने की भी नौबत आ जाए।


खैर घंटे पर कई लोगों से पूछने के बाद अपनी सही बस से टकरा सका। चाणक्यापुरी में एंबेसियों की आलीशान अट्टालिकाओं के बीच किसी तरह अपने यूथ हास्टल पहुंच सका। वहां अच्छा व्यवहार और रहने की सुविधा दोनो मिल गई। दो दिन के भोजन का खर्च सिर्फ सुबह के नास्ते में गवां चुकने के बाद मैंने दिन भर उपवास करने की निश्चय किया। क्या हुआ गांधी जी भी अक्सर उपवास किया करते थे। धौलाकुआं पहुंच कर दिल्ली विश्वविद्यालय दक्षिणी परिसर का पता पूछता रहा लेकिन कोई बता नहीं पा रहा था. वहां के दुकानदारों को भी अपने पास के महत्वपूर्ण संस्थान के बारे में पता नहीं था। खैर किसी तरह विश्वविद्यालय पहुंच पाया। वहां हिंदी विभाग के लोगों ने नितांत आत्मीय व्यवहार किया।


अब मैंने दिल्ली में अपने कुछ आत्मीय मित्रों से मिलने की सोची। दिल्ली की रेड लाइन बस का सफर तो अविस्मरणीय होता है। एक बस में चलते हुए मैं जैसे ही लालकिले के सामने उतरा, मेरी जेब से मेरा बटुआ गायब था। कुल सात सौ रूपये थे सफर की कुल जमा पूंजी। अब मात्र एक सिक्का बच रहा था जेब में। अभी तीन दिन और रहना और वापसी का टिकट भी बनवाना था। हमारे बुझे मन और बुझे चेहरे का अंदाजा आप बखूबी लगा सकते हैं। दिल्ली इससे पहले भी तीन बार आ चुका था लेकिन पहली बार चांदनी चौक की शाम उदास लगी। सारे मुस्कुराते चेहरे मजाक उड़ाते लगे। अतीव खूबसूरत, मांसल, कोमलांगी नव यौवनाएं धक्का देती निकल गईं। कोई और वक्त होता तो उस खुशबू को थोड़ी देर याद करते। परंतु अभी वे सब विष कन्याएं प्रतीत हो रही थीं। मां पिताजी की याद आई। लोकप्रिय शायर का शेर याद आया—

मैं रोया परदेस में,  भींगा मां का प्यार
दुख ने दुख से बात की बिन चिट्ठी बिन तार

अचानक भारतीय साथी संगठन के हमारे साथी सतीश भारती की याद आई। वे चांदनी चौक में ही रहते है। संयोग से दिमाग पर जोर डाला तो संकट काल में उनका पता याद आ गया। 2590 गली पीपल पानदरीबा, चांदनी चौक। मैं चलता हुआ उनके घर पहुंच गया। ये महज इत्तिफाक था कि हमेशा अति व्यस्त और भ्रमणशील जीवन जीने वाले सतीश भाई घर में ही मिल गए। शायद हमारी मदद के लिए उसी दिन वे बाहर से दिल्ली लौटे थे। मेरी रामकहानी सुनकर उन्होने तसल्ली दिलाने की कोशिश की और मेरी पर्याप्त आर्थिक सहायता की। वहां से निकल कर वाराणसी के लिए वापसी की टिकट बनवाया। लेकिन दिल्ली ये दिल्लगी हमेशा याद रहेगी।


 - विद्युत प्रकाश मौर्य 

( जेवीजी टाइम्स में प्रकाशित , 1996 ) 

नए जमाने का ड्रेस कोड ( व्यंग्य)

जब कभी आप दिल्ली की मेट्रो में चलें या फिर दिल्ली विश्वविद्यालय सड़कों पर तब आप बखूबी महसूस कर सकते हैं कि नए जमाने का ड्रेस कोड क्या है। जी हां, नए जमाने का ड्रेस कोड है शार्ट्स और टी शर्ट। या इसे आम बोलचाल की भाषा में कहें तो नेकर और बनियान है। अगर आप बाबा आदम की फिल्में देखें तो लड़कियां साड़ी पहन कर कालेज जाती दिखाई देती थीं तो लड़के धोती...उसके बाद का दौर आया सलवार सूट का..जमाना बदला बेलबाटम आया..उसके जींस...फिर कालेजों में दिखाई देने लगा...स्कर्ट-टॉप। लेकिन अब जमाना और आगे निकल चुका है। अब बारी है शार्टस और बनियान की। अगर हम किसी फिल्म में कॉलेज का दृश्य देखते हैं तो ये लगता है कि वे अंग प्रदर्शन करते हुए कपड़े फिल्म को ग्लैमरस बनाने के लिए दिखाते हैं। लेकिन फिल्म बनाने वाले अगर आकर दिल्ली यूनीवर्सिटी का कैंपस या मेट्रो ट्रेन देखें तो उन्हें लगेगा कि इस नए जमाने के ड्रेस कोड से उन्हें ही कुछ सीखने की जरूरत है।

मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि अब कालेज में पढने वाली बालाओं ने गांधीवाद से प्रेरणा ली है। गांधी जी भी कम कपडे पहनते थे। वे एक धोती को ही लपेट लेते थे। अब एक मिनी स्कर्ट या शार्ट और बनियान भी उतने ही कपड़े में तैयार हो जाता है। यानी गांधी जी से प्रेरणा लेकर कपड़े की बचत...ये अलग बात है कि गांधी जी की ये सीख देर से पल्ले पड़ी। चलो कुछ तो अच्छी चीज सीखी। इन कपड़ों के कई फायदे हैं। ये इको फ्रेंडली हैं। कपड़ों की बचत होती है...तो पेड़ पौधे कम काटे जाएंगे। तो हुई न पर्यावरण की रक्षा। शऱीर को भी ज्यादा भारी भरकम कपड़ों को ढोना नहीं पड़ता है। इसके साथ ही दूसरा बडा फायदा है कि कम कपड़ों में शरीर की सुंदरता बेहतर ढंग से उभर कर आती है। अब कोई देखता है तो देखता रहे....वैसे भी हर सुंदर चीज तो देखने दिखाने के ले ही होती है। भला छुपने छुपाने की क्या बात है। जाने माने प्रकृतिक चिकित्सक एडोल्फ जस्ट ने कहा था कि आदमी को ज्यादा से ज्यादा समय प्राकृतिक अवस्था में रहना चाहिए। जैसे जंगल में ऋषि मुनि और उनके आश्रम में शिक्षा ग्रहण करने वाले लोग कम कपड़ों में रहा करते थे।नई उम्र को नवजवानों ने भी इसी कथन से प्रेरणा ली है। इसलिए अब कपडों का आकार भी छोटा होता जा रहा है। नए जमाने के फैशन डिजाइनर भी कम कपड़ो वाले ही डिजाइन तैयार कर रहे हैं। अब फैशन डिजाइनर भी गांधी से प्रेरणा लेकर कम कपड़ों में अच्छे ड्रेस डिजाइन करना सीख गए हैं।

अब कॉलेज जाने वाले नई उम्र के लोग क्या करें पूरी तरह से प्राकृतिक अवस्था में रह नहीं सकते ना...इसलिए कपड़ों का आकार और छोटा करते जा रहे हैं। लेकिन जीवन की ये रीत भी प्राकृति के करीब है। कई लोगों को ट्रेन बस में घूरने की आदत होती है। लेकिन अब कम कपड़ों में फुदकती इन परियों को घूरने वालों से कोई परेशानी नहीं होती....आखिर कोई कब तक घूरेगा...अंत में घूरने वाले को शर्म आ जाएगी। वैसे आपकी नजर फिसलती है तो फिसले मेरी बला से...क्या फर्क पड़ता है। -    --


-----विद्युत प्रकाश मौर्य

गरीबी पर पेबंद ( व्यंग्य)

हमें गरीबी छुपाने की कला बेहतर आती है। आए भला क्यों नहीं हम बहुत पहले से इस कला में माहिर हैं। अब कॉमनवेल्थ खेलों के समय दुनिया भर से मेहमान आ रहे हैं तो भला हम कैसे नहीं अपनी गरीबीं छुपाएं। अब तो हम दुनिया में सुपर पावर बनने की दौड़ में शामिल हैं तो भला कैसे हम अपनी गरीबी का मुजाहरा कर सकते हैं। इसलिए हमने कोशिश की है अपनी राजधानी दिल्ली को ज्यादा से ज्यादा खूबसूरत दिखाने की। इसलिए हमने दिल्ली की गरीब के चेहरे को छुपाने की हर संभव कोशिश की है।सबसे पहले हमने दिल्ली के सारे भिखारियों को सभी मंदिरों और दूसरे धार्मिक स्थलों के पास से हटा दिया। ताकि हमारे विदेशी मेहमानों को भीख मांगने वाले लोग नहीं दिखाई दें। उन्हे 20दिनों के लिए गुप्त स्थल पर सरकारी मेहमान बना कर रखा है। हालांकि इन लोगों को विदेशी मेहमानों के आने पर अपनी आमदनी में इजाफा होने की पूरी उम्मीद थी।

 लेकिन फिलहाल सरकार इन भगवान के नाम पर देदे अल्लाह के नाम पर देदे...कहने वालों के खाने पीने का इंतजाम करने में लगी है। इसके बाद हमने पूरी दिल्ली में जगह जगह बड़े बडे व्यू कटर्स लगवाए हैं। खास तौर पर उन जगहों पर जहां जहां कूड़े के ढेर लगे थे। उन कूड़े के ढेर और गंदगी को छिपा कर विदेशी मेहमानों के स्वागत में बड़े बड़े होर्डिंग लगा दी गई है। दिल्ली आपका स्वागत करती है...भला भोले भाले विदेशी मेहमानों को क्या पता चल पाएगा कि इन कूड़े के ढेर के पीछे बदबू का अंबार है। ठीक उसी तरह जब किसी गरीब आदमी के घर की दीवारों की पपड़ियां गिरने लगती हैं तो उन्हें कैलेंडर या पोस्टर चिपका कर छिपा दिया जाता है। इसी तरह हमने भी शहर बदरंग दिखाने वाली गंदगी को छिपा दिया है। इतना ही नहीं हमने उन ब्लू लाइन बसों को भी 20 दिन नहीं चलने का आदेश दे दिया है। जो हमारे शहर की खूबसूरती में बदनुमा धब्बा थी। 


अगर चलना ही है तो खूबसूरत एसी बसों में चलो। अगर जो जेब में पैसे नहीं हैं तो घर में रहो। हमने अपने प्यारे नागरिकों को आग्रह किया है कि वे दफ्तर जाने के लिए बसें नहीं मिलती तो अगले 20 दिन सहयोग करें। हो सके तो घर से ही नहीं निकलें। दफ्तर नहीं जाएं तो अच्छा है। घर में बैठकर टीवी पर कामनवेल्थ खेलों के मजे लें। भला देश के लिए इतना तो कर ही सकते हैं। हमें भीष्म साहनी की लोकप्रिय कहानी चीफ की दावत की याद आती है। जिसमें अपने बॉस को पार्टी में घर बुलाने के समय बाबू अपनी बूढ़ी मां को जो बार बार खांसती है स्टोर में छिपा देता है। सो गरीबी पर पेबंद लगाने की हमारी आदत पुरानी रही है। कई गरीब लोग अपनी गरीबी छुपाने के लिए घर के दरवाजे पर रंगीन परदे लगवा देते हैं। जब कोई मेहमान घर में आए तो पहले परदे के पास दस्तक दे। लेकिन तब क्यो हो जब बकौल शायर...


आधी-आधी रात को जब चुपके से कोई मेरे घर में आ जाता है...
तब कसम गरीबी कीअपने गरीबखाने पर बड़ा तरस आता है।
-    विद्युत प्रकाश मौर्य

अावारा नहीं होते कुत्ते ( व्यंग्य)

मुझे उन लोगों से सख्त शिकायत है जो कुत्तों को आवारा कहते हैं। दरअसलकुत्तों को आवारा कहना बिल्कुल ठीक नहीं है। वास्तव में आवारा तो आदमी हुआ करते हैं। कुत्ता तो स्वच्छंद रहना पसंद कर सकता है पर आवारा कहलाना बिल्कुल उसे पसंद नहीं। एक खबर के मुताबिक बीकानेर में सबसे ज्यादा आवारा कुत्ते हैं। हमें बीकानेर वासियों का शुक्रगुजार होना चाहिए तो कुत्तों को बांध कर रखना पसंद नहीं करते। उन्होंने कुत्तों को आजादी बख्शी है। उनका इंसानों जैसा ही सम्मान किया है। ठीक उसी तरह जैसे अमेरिका के राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार जान केरी एडवर्ड्स ने अपना चुनाव चिन्ह गधा बना कर गधे को सम्मान बख्शा है। गधे को इतना सम्मान मिलने से प्रख्यात लेखक कृश्न चंदर की आत्मा तृप्त हुई होगीजिन्होंने गधे पर कई किताबें लिखी हैं। वे गधे की मन की बातें भी समझ लेते थे। ठीक इसी तरह हमें कुत्ते के मन की बातें भी समझने की कोशिश करनी चाहिए। अगर हम बहुत गंभीरता से सोचें तो इस सृष्टि में कुत्ता आदमी का सबसे बड़ा और सबसे करीबी दोस्त जीव है। एक ऐसा दोस्त जो हर कदम पर साथ निभाता हैफिर भी हम उसे दुत्कारते हैं।

जीवन में बार बार आदमी धोखा दे जाए पर कुत्ते कभी धोखा नहीं देते। उनकी डिक्शनरी में धोखेबाज जैसा शब्द ही नहीं है। वे रिश्ते को निभाना जानते हैं। साथ ही कुत्ते चरित्रवान भी होते हैं। आदमी एक बीबी के रहने इधर उधर मुंह मारने की कोशिश में लगा रहता है। पर कुत्ता तो हमेशा ही फ्री लांसर होता है। वह किसी एक के साथ बंधकर रहने में आस्था ही नहीं रखता। बिल्कुल उस पत्रकार की तरह जो कहीं नौकरी नहीं करता। बल्कि एसाइनमेंट लेकर एक ही समय में अलग अलग संस्थानों को अपनी सेवाएं देता है।

मेरी समझ से कुत्ते को आवारा कहना एक तरह से संपूर्ण कुत्ता कौम को गाली देना है। जैसे किसी संतान के अवैध होने के लिए पूरी तरह से उसके मां और बाप ही दोषी होते हैं इसी तरह कुत्ते के आवारा होने में आदमी ही दोषी होता है। आप कुत्ते को बांध कर न रखें पर उसके साथ आदमी जैसा बरताव करेंफिर देंखे वह आपकी हर बात मानेगा।

हम कुत्ते की तारीफ में न जाने कितने ही सफे लिख सकते हैं। शास्त्रों में लिखा है कि छात्रों को कुत्ते की तरह नींद लेनी चाहिए। यानी की हमेशा सजग और चौकस रहना चाहिए। कुत्ता आदमी से ज्यादा वफादार चौकीदार होता है। वह आपके घर की रखवाली बिना वेतन के करता है। उन सुंदरियों से हाले दिल पूछिए जिनको प्यार में धोखा मिलता है। वे अपना सारा प्रेम पालतू कुत्तों पर न्योछावर कर देती हैं। कार में कुत्ते लेकर घूमती हैं। फाइव स्टार की महंगी पार्टियों में भी उनका कुत्ता हमेशा उनके साथ ही रहता है। कुत्ते को हमेशा आगोश में लिए रहती हैं। क्योंकि उन्हें भले पुराना प्रेमी धोखा दे चुका हो लेकिन कुत्ते से धोखा मिलने की कोई गुंजाइस नहीं रहती।

इसलिए आप एक बारगी कुत्ते को दुत्कार दें यहां तक तो ठीक है। पर आप किसी कुत्ते को आवारा हरगिज न कहें। खासकर जानवर प्रेमी संस्थाओं को इस मामले में अभियान चलाना चाहिए। कुत्तों के आत्मसम्मान की रक्षा के लिए संघर्ष करना चाहिए। हर घर में हर आदमी को कुत्ता पालने का अभियान चलाना चाहिए। इससे समाज में विचरण करने वाले तथाकथित आवारा कुत्ते खत्म हो जाएंगे। साथी ही आदमी और कुत्ते की दोस्ती और मजबूत हो जाएगी।
- विद्युत प्रकाश मौर्य
( DOG, SATIRE ) 


काश.. मैं कुत्ता होता.... ( व्यंग्य)

हर किसी की अपनी अपनी किस्मत होती है। आजकल मैं कुत्ते की किस्मत पर रस्क कर रहा हूं। वह भी अगर आपको विश्व सुंदरी या विश्व के सबसे ताकतवर आदमी का पालतू कुत्ता होने का मौका मिल जाए तो फिर कहना ही क्या। सुना है जानी-मानी अभिनेत्री ऐश्वर्य राय ने कुत्ता पाल रखा है। यह कुत्ता उनके पुराने प्रेमी विवेक ओबराय ने गिफ्ट किया था।

उन्होंने कपड़े की तरह प्रेमी तो बदल लिया पर कुत्ता नहीं बदला। वे अपने प्यारे कुत्ते के बीमार होने पर परेशान हो उठती हैं। इतना परेशान कोई अपने बच्चे के बीमार होने पर नहीं होता। वैसे लोग करें भी क्या जिनके आधे दर्जन बच्चे होते हैं। हमेशा कोई न कोई बीमार तो पड़ा ही रहता है। बहरहाल ऐश्वर्य तो फिल्मी पार्टियों अन्य स्टारों से मिलने पर उनका हाल पूछने से पहले उनके कुत्तों का ही हाल पूछती हैं। उसके बाद बड़ी खुशी से अपने कुत्ते की शरारतपूर्ण हरकतें सुनाती हैं। और भी कई अभिनेत्रियों को कुत्ता पालने का शौक है। क्योंकि उनके प्रेमी तो अक्सर धोखा दे जाते हैं पर कुत्ते स्वामीभक्त होते हैं। साथ निभाते हैं। पूरी निष्ठा के साथ।

मैं उनके जानवर प्रेम को नमस्कार करता हूं। बस उनके यह आग्रह करना चाहता हूं कि वे जरा उन कुत्तों की भी फिक्र करें जो सड़कों पर घूमते हैं। आवारा होते हैं। मेनका गांधी की तरह वे भी कुत्तों को पकड़ कर उन्हें पालतू बनाएं। वैसे अपने जार्ज बुश साहब भी कुत्तों के बहुत बड़े प्रेमी हैं। उन्हें अपनी फौज पर उतना भरोसा नहीं है। सो उन्होंने अपने फौज में भी कुत्तों की भरती कर रखी है। इतना ही नहीं अपने कुत्तों को उन्होंने एसपी, डीएसपी और इंस्पेक्टर जैसे रैंक भी दे रखे हैं।

जब जार्ज बुश साहब भारत आए तो उनके साथ 70 कुत्तों का एक दल भी आया था। उनके रहने के लिए दिल्ली के फाइव स्टार डिलक्स होटल में व्यवस्था की गई थी। जाहिर है कि उनके लिए खाने-पीने की भी शानदार व्यवस्था की गई होगी। अब उन कुत्तों की किस्मत देखिए। हमारे देश की 90 फीसदी आबादी बिना फाइव स्टार होटल देखे ही मर जाती है। आधे लोग तो बेचारे दिल्ली भी नहीं देख पाते हैं।

खैर हमारे देश के गली के कुत्तों को जार्ज बुश के साथ आए कुत्तों के बारे में देर से खबर मिली नहीं तो उन्होंने दिल्ली के उस फाइव स्टार होटल के बाहर प्रदर्शन जरूर किया होता। तुम लोग हमारी बिरादरी के हो तो इतने बड़े होटल में क्यों ठहरे हो। आओ हमारे साथ सड़क पर भूंको। 

खैर फिलहाल तो मुझे उन कुत्तों की किस्मत पर ईर्श्या हो रही है। मैं भगवान से ही पुरजोर मांग करूंगा कि अगले जन्म में मुझे कुत्ता ही बना दे। बस कुत्ता या तो ऐश्वर्य राय के घर का बनूं या फिर जार्ज बुश की सेना में शामिल हो जाऊं बस गली का अवारा कुत्ता मत बनाना। मैं वादा करता हूं जिसका भी कुत्ता बनूंगा एहसान फरामोस नहीं बनूंगा। साथ निभाउंगा। हे, ईश्वर मेरी सुन लेना।
- vidyutp@gmail.com 

स्वामीभक्त जापानी कुत्ता हाचिको

यह दिल को छूने वाली सच्ची कहानी है एक जापानी कुत्ते की।  उस कुत्ते का नाम था हाचिको।  इस  जापानी सच्ची कहानी का कई भाषाओं में रुपांतर भी किया गया है। एक वफादार कुत्ते का नाम हाचिको हुआ करता था। आकिता प्रिफ़ैक्चर का ओदाते शहर जापानी कुत्तों की एक नस्ल आकिता-इनु के लिए जाना जाता है।इसी नस्ल का कुत्ता हुआ करता था हाचिको।


जापान की राजधानी तोक्यो के शिबुया स्टेशन के पास जिस वफ़ादार कुत्ते हाचिको की कांसे की मूर्ति स्थापित की गई है। आखिर ऐसा क्या था कि रेलवे स्टेशन पर एक कुत्ते की प्रतिमा लगी है। 

10 नवंबर, 1923 को अकिता प्रान्त में हाचिको इस दुनिया में आया। हाचिको सफेद रंग का, कई अन्य कुत्तों की ही तरह एक प्यारा पिल्ला था। उसके स्वामी यूएनो टोक्यो विश्वविद्यालय के इंपीरियल कृषि विभाग में एक प्रोफेसर थे। वे हाचिको के साथ शिबुया में अपने नए घर में रहते थे। हर सुबह प्रोफेसर, अपनी नौकरी पर ट्रेन से विश्वविद्यालय के लिए जाते थे। रोज सुबह उन्हें छोड़ने के लिए हाचिको रेलवे स्टेशन तक जाता था। हर रात उनके लौटने पर स्थानीय स्टेशन पर हाचिको उनका इंतजार करता था। फिर साथ साथ घर आता। यह सिलसिला सालों से चल रहा था। पर एक दिन हाचिको के स्वामी नहीं लौटे। वास्तव मेंवह हमेशा के लिए इस दुनिया से जा चुके थे।

पर हाचिको को यह कहां मालूम था। वह तो हर शाम उनका शिबुया रेलवे स्टेशन पर इंतजार करता रहता। बाकी लोग दुखी हाचिको को देखते रहते। कुछ सालों बाद इंतजार करते हुए रेलवे स्टेशन पर ही हाचिको ने दम तोड़ दिया। इसके बाद स्थानीय लोगों ने रेलवे स्टेशन पर हाचिको की प्रतिमा स्थापित करवा दी। 1934 में मूर्तिकार टेरू एंडो ने हाचिका की प्रतिमा बनाई जो रेलवे स्टेशन पर स्थापित है। जापान के लोगों के लिए तो हाचिको वफादारी का प्रतीक है। 
( प्रस्तुति- विद्युत प्रकाश मौर्य ) 

बैंक में डाका डालकर धन जुटा रहे हैं आतंकी संगठन

पटना के गांधी मैदान, यूपी के बिजनौर और पश्चिम बंगाल के बर्दवान में हुए धमाके के बाद गिरफ्तार आतंकियों से हुए खुलासे ने जांच एजेंसियों के कान खड़े कर दिए हैं। इंडियन मुजाहिदीन जैसे संगठन बड़े वारदातों के लिए ऑपरेशन संबंधी खर्च के लिए बैंक डकैती कर धन जुटा रहे हैं।
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बैंक में डाका डालना और उससे लूटे गए धन का इस्तेमाल आतंकवादी वारदातों को अंजाम देने के लिए करना। ये हाल के दिन में सबसे खतरनाक आतंकी माड्यूल बनकर उभरा है। हाल में पश्चिम बंगाल के बर्दवान और उत्तर प्रदेश के बिजनौर में हुए धमाकों के बाद जांच में आतंकियों के इस माड्यूल का खुलासा हुआ है। खुफिया एजेंसियों की जांच में पता चला है कि आतंकी संगठन स्टूडेंट्स इस्लामिक मूवमेंट इन इंडिया (सिमी) से जुड़े लोगों तेलंगाना के बैंक में डकैती डाली और उससे लूटी गई रकम से बिजनौर और पश्चिम बंगाल के बर्दवान में बम बनाने का साजो-सामान जुटाया।

राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) ने अपनी जांच में पाया है कि खंडवा  जेल से 1 अक्तूबर 2013 की रात में गश्ती दल पर हमला कर फरार हुए आतंकियों ने तेलंगाना के करीमनगर में फरवरी 2014 में स्टेट बैंक में डकैती डाली। इस डकैती की रकम का इस्तेमाल बिजनौर और बर्दवान में बम बनाने के लिए किया गया। इससे पहले बिजनौर में 12 सितंबर को एक घर में हुए धमाके के बाद बरामद किए गए 6.5 लाख की नकदी के स्टेट बैंक से लूटी गई होने के सुबूत हाथ लगे हैं। यूपी पुलिस के मुताबिक बिजनौर के जाटान मोहल्ले में चार महीने से खूंखार आतंकवादी नाम बदलकर रह रहे थे।
आतंकी संगठन अब धन जुटाने के लिए अपराध के रास्ते का इस्तेमाल पिछले कई सालों से करने में लगे हैं। धन जुटाने की इस मुहिम को उन्होंने माल-ए-गनीमतका नाम दिया है। बड़े वारदातों को अंजाम देने के लिए धन जुटाने के लिए सिमी  और इंडियन मुजाहिदीन जैसे आतंकी संगठनों ने बैंक डकैती के अलावा नशीले पदार्थो की तस्करी जैसे कार्यों को अंजाम दे रहे हैं।
एनआइए को हाल के दिनों में सिमीऔर इंडियन मुजाहिद्दीन जैसे आतंकी संगठनों के कई आतंकियों को इस मामले में चिह्न्ति कर उन्हें दबोचने में भी सफलता मिली है, लेकिन माल-ए-गनीमतको जुटाने में लगे कई आतंकी अभी भी सुरक्षा और जांच एजेंसियों की पकड़ से बाहर हैं।

मध्य प्रदेश में भी पांच बैंक लूटे थे
पटना धमाके की जांच के दौरान ही एनआइए ने मध्य प्रदेश के खंडवा जेल से फरार होने वाले सिमी के आतंकी डॉक्टर अबु फैजल को दिसंबर 2013 में गिरफ्तार किया था। पूछताछ में पता चला कि फैजल ने ही पटना में नरेंद्र मोदी की हुंकार रैली के दौरान उन्हें निशाना बनाने के लिए हैदर अली उर्फ ब्लैक ब्यूटी को पांच लाख रुपये दिए थे। एनआइए की पूछताछ में अबू फैजल ने माना है कि पैसे उसने मध्य प्रदेश में बैंक लूट की पांच वारदातों से जुटाए थे। इनमें भोपाल के मणप्पुरम गोल्ड नामक एक वित्तीय संस्था में वर्ष 2010 में डाका डाल कर करीब ढाई करोड़ रुपये के स्वर्णाभूषण उड़ाने का मामला भी शामिल है।
आतंकियों ने की थी इंदौर में बैंक डकैती
मध्य प्रदेश के इंदौर के कुछ बैंकों में वर्ष 2008 और 2010 के दौरान हुई बैंक डकैतियां में भी मध्य प्रदेश पुलिस ने आतंकी संगठन इंडियन मुजाहिदीन का हाथ पाया गया। अहमदाबाद की जेल में बंद आईएम आतंकी अमीन भी इन बैंक डकैतियों में शामिल था।
थोड़ा और पीछे चलें तो 2008-09 में दिल्ली एनसीआर में हुई बैंक लूट में खालिस्तान समर्थक आतंकियों का हाथ सामने आया था। 2 जुलाई 2008 गुड़गांव का ओरिएंटल बैंक ऑफ कामर्स से करीब 1 करोड़ 48 लाख रूपये लूट हुई थी। पुलिस को जांच में पता चला कि इन लूटपाट का सरगना सतनाम सिंह खलिस्तान कमांडो फोर्स का सरगना और मोस्ट वांटेट आतंकी परमजीत सिंह पंजवार का साथी था।
बर्दवान में हुए 2 अक्तूबर 2014 को हुए धमाके में बांग्लादेश के आतंकी संगठन जमात उल मुजाहिदीन बांग्लादेश (जेएमबी) का लिंक मिलने के कारण बंगलादेश भी इस मामले को लेकर गंभीर हो गया है। इस धमाके की जांच की प्रगति एनआईए प्रमुख शरद कुमार खुद देख रहे हैं। वहीं जांच में नेशनल सिक्यूरिटी गार्ड (एनएसजी) और रिसर्च एंड एनालिसिस विंग (रॉ) की भी मदद ली जा रही है। एनआईए प्रमुख द्वारा दी गई रिपोर्ट में पश्‍चिम बंगाल के पांच जिलों में आतंकी संगठनों के सक्रिय होने का जिक्र है। गृह मंत्रालय की मिली रिपोर्ट के मुताबिक बर्दवान में हुए धमाके की साजिशें काफी गहरी हैं।


-         विद्युत प्रकाश मौर्य
( हिन्दुस्तान हिंदी दैनिक - 6 नवंबर 2014 को प्रकाशित

Friday, 14 November 2014

प्याज नहीं टमाटर के आंसू ( व्यंग्य )

रोने के लिए कोई बहाना होना चाहिए। बदलते दौर में लोग रोना और हंसना भूलते जा रहे हैं। इसलिए रुलाने व हंसाने का जिम्मा किचेन ने लिया है। पिछले साल प्याज ने रुलाया था तो इस बार रुलाने का जिम्मा टमाटर ने ले लिया है। वैसे प्याज के रुलाने के किस्सा बहुत पुराना है। प्याज काटते समय को अनायास ही आंसू निकल आते हैं। पर पिछले साल प्याज की महंगी कीमतों ने रुला दिया था। एक प्याद खरीदने जाओ को पांच रुपए का। अब लोगों को आदत पड़ गई है तो बिना प्याज की सब्जी कैसे बनाएं। हालांकि अभी शुद्ध सात्विक हिंदू परिवारों में बिना प्याज बिना लहसून के सब्जी बनती है। इतिहास में कभी क्षत्रिय प्याज नहीं खाते थे। अब बिना प्याज के छौंक बात नहीं बनती है।


 खैर इस साल प्याज रहम दिल है। वह सस्ते में ही बिक रहा है। पर इस बार कभी नींबू तो कभी टमाटर ने तेवर दिखा दिए। हालांकि मुझे टमाटर बहुत पंसद हैं। देखने में भी खाने में भी। हरे भी लाल लाल भी। पर इस बार टमाटरों ने तरसाया बहुत। सब्जी बाजार में गया तो टमाटर का भाव पूछा। बोला 10 रुपए। मैंने कहा तौल दो। उसने तौल दिया। ये क्या 10 रुपए में तीन टमाटर। जी हां टमाटर 10 रुपए का एक पाव है यानी 40 रुपए किलो। मैंने तीन टमाटर खरीदकर फ्रीज में रख दिया है। फिलहाल उन्हें रोज निकाल कर देख लेता हूं। फिर फ्रीज में वापस रख देता हूं। मैं अपनी किस्मत पर रस्क करता हूं। इस महंगाई में भी मैं टमाटर खरीदने की हिम्मत रखता हूं। यही क्या कम है।
हमारी दिल्ली सरकार की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित जी पब्लिक का दर्द बखूबी समझती हैं। उन्हों ने कहा लोगों को सस्ता टमाटर मिले इसके लिए सरकार जगह जगह काउंटर खोलेगी जहां 20 रुपए किलो ही टमाटर मिल सकेगा। पर शीला जी पूरी दिल्ली को कहां मिल पाया 20 रुपए किलो टमाटर। और रही बात तो 20 रुपए किलो ही कौन सा सस्ता है। इस समय टहक लखनवी दशहरी आम महज 18 रुपए किलो मिल रहे हैं। लखनउ में तो सुन है कि पांच से 10 रुपए किलो की बहार आई हुई है। और फिर शीला जी दिल्ली के कुछ लोगों ने सस्ता टमाटर खरीद भी लिया तो इससे देश के अन्य कोने में बसे लोगों को दिल्ली वासियों से ईष्या होने लगेगी।
सुना है कि मुआ मौसम ही इस बार खराब है। इसलिए हिमाचल में टमाटर की फसल अच्छी नहीं हुईटमाटर मजबूरी में ही महंगा हो गया। नासिक में बाढ़ आ गई थी तो प्याज महंगा हो गया था। इस बार टमाटर गुस्से में है। उसका गुस्सा जल्दी शांत होता हुआ दिखाई नहीं दे रहा है। इस बीच लोगों को मौका मिल गया है टमाटर को लेकर व्यंग्य करने का। हमारे जसपाल भट्टी साहब ने तो अपनी पत्नी को टमाटरों की माला ही गिफ्ट कर डाली।
अब अगर आप किसी के घर जाएं और खाने की मेज पर टमाटरों का सलाद दिखाई तो समझ लिजिए की आदमी स्टेट वाला है। वरना तो यू हीं। यानी की टमाटर खरीदने की क्षमता से किसी की औकात का पता चल जाता है। कवियों साहित्यकारों को भी चाहिए कि अब किसी सुंदर स्त्री के गालों की ललाई की तुलना सेब आदि से न करके टमाटर से ही करें। इससे उन स्त्रियों को काफी खुशी होगी क्योंकि हर किचेन में जाने वाली स्त्री को टमाटर की अहमियत का पता चल चुका है। जब आप किसी को अच्छी गिफ्ट भेजना चाहते हैं तो फलों के बजाए टमाटरों का ही टोकरा भिजवाएं।
- विद्युत प्रकाश मौर्य



Saturday, 8 November 2014

भैंस को सताना बंद करो... ( व्यंग्य)


जिसने ये कहावत बनाई अकल बड़ी है या भैंस वह जरूर भैंस का सताया हुआ रहा होगा। कदाचित उसे किसी गुस्साई भैंस ने पटखनी मार दी होगी। पर सदियों पुरानी इस कहावत के कारण भोली भाली भैंसों को बार-बार गुस्सा आता है। और वह कई बार ऐसी हरकतें करती है जिसमें वह ये सिद्ध कर देती है मैं वाकइ अकल से बड़ी हूं।
ताजा मामला सूरत का है जहां भैंस ने भारी भरकम विमान को रोककर दिखा दिया कि हवा में उडऩे वाले कैसे पल में जमीन पर आ जाते हैं। नाम है शहर का सूरत और काम करते हैं बदसूरत। करते हैं भैंस का अपमान और कहते हैं मेरा भारत महान। आपको पता है सारा देश भैंस का दूध पीता है। अगर भैंस नाराज हो जाए तो अमूल की डेयरियां बंद हो जाए। यह सिद्ध हो चुका है कि  भैंस का दूध गाय के दूध से हर मामले में ज्यादा पौष्टिक है। फिर भी हम भैंस की पूजा नहीं करते क्यों. भैंस अपमान सहती है फिर दूध घी की नदिया बहाती है।


साल 2013 की बात है हरियाणा के हिसार के एक गांव में एक भैंस बिकी 25 लाख में। यानी भैंस की कीमत मर्सडीस से भी ज्यादा। तो फिर कहावत क्या होना चाहिए भैंस बड़ी या मर्सडीज तो जवाब होगा- भैंस।

काला अक्षर भैंस बराबर ये मुहावरा भी किसी निपट मूरख ने ही रचा होगा। उसको पता नहीं रहा होगा कि रात काली होती है। कान्हा जी भी काले ही थे। प्रेयसी की जुल्फें भी तो काली होती हैं जिसकी छांव में हमें घंटों बैठे रहना चाहते हैं। भला उसमें और भैंस की पूंछ में क्या अंतर है। और जो सबसे बेहतरीन और सुरक्षित धन होता है वह भी काला ही होता है यानी काला धन। दुनिया में ऊर्जा का बड़ा स्रोत कोयला भी काला होता है जिसे पूरे देश के उद्योगपति लूट लेना चाहते हैं। भला भैंस काली है तो उसमें उसका क्या कसूर है अब बताइए तो जरा।
एकऔर मूर्खतापूर्ण कहावत है – भैंस के आगे बिन बजाय भैंस रही पगुराय। अरे भैंस क्या नागिन है जो बिन पर डांस करने लग जाए। डांस तो नागिन भी नहीं करती है सिर्फ आप हमें भरमा रहे हो। अब बिन की हकीकत तो भैंस जानती है इसलिए वह चुपचाप पागुर करती रहती है। भला पागुर नहीं करेगी तो थोड़ी देर बाद बच्चों के लिए दूध कौन देगा।
भारत सरकार के इंडियन काउंसिल ऑफ एग्रीकल्चर रिसर्च ने भैंसों का महत्व समझते हुए इंटरनेट पर बुफैलोपीडिया बनाया है। ( http://www.buffalopedia.cirb.res.in/) हमें भी समय रहते चेत जाना चाहिए। हमें देश में निवास करने वाली 9.8 करोड़ भैंसो का अपमान तुरंत बंद कर देना चाहिए।
अभी वक्त ज्यादा नहीं गुजरा है। हमें भैंस को अपमानित करने वाले मुहावरे गढ़ना बंद कर देना चाहिए और सही मायने में राष्ट्रीय पशु भैंसों से सामूहिक माफी मांगनी चाहिए। पाठ्यक्रम से भैंस को अपमानित करने वाले सारे चुटकुलों को निकाल कर फेंक देना चाहिए। नई पीढ़ी को गलत शिक्षा देना बंद कर देना चाहिए। नही तो अभी गुजरात का सूरत शहर का एक एयरपोर्ट है। कल को ये भैंस संसद मार्ग पर आकर रास्ता रोक सकती है। दिल्ली मुंबई के एयरपोर्ट पर भी सामूहिक विरोध दर्ज करा सकती है।
-          विद्युत प्रकाश मौर्य


Thursday, 6 November 2014

गांवों की सूरत बदहाल

देश की 68 फीसदी आबादी गांव में रहती है, पर देश के लाखों गांव आज भी सड़क, बिजली, पेयजल जैसी आधारभूत सुविधाओं का इंतजार कर रहे हैं। केंद्र और राज्य सरकारें गांवों की सूरत बदलने के लिए कई तरह की योजनाएं चला रही हैं पर उनका अपेक्षित परिणाम देखने को नहीं मिला है।

भारत के गांव 

- 6,38,365 कुल गांव हैं भारत में
- 68.84 फीसदी देश की आबादी गांव में रहती है
- 2,36,004 गांवों में 500 से ज्यादा लोग रहते हैं
- 3976 गांवों की आबादी 10,000 से अधिक है
1,07,753 गांव हैं सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में
40,000 से ज्यादा गांव हैं पश्चिम बंगाल, बिहार, ओडिशा, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान में

यूनिक कोड नंबर
2011 के जनगणना में देश के हर गांव के लिए एक यूनिक कोड नंबर प्रदान किया गया है। छह अंकों वाले इस कोड नंबर के इस्तेमाल से गांवों के लिए लागू की जाने वाली तमाम विकास योजनाओं और ई-गवर्नेंस में आसानी के लिए किया गया है।


देश के बड़े गांव
बनगांव : 30,061 की आबादी वाला बनगांव बिहार ही नहीं, भारत का सबसे बड़ा गांव माना जाता है। सहरसा जिले के इस गांव में तीन पंचायतें कार्यरत हैं।
गहमर : 26250 की आबादी वाला यूपी के गाजीपुर जिले का गहमर देश के बड़े गांवों में से एक है।

पहले भी चली ग्राम विकास योजनाएं
अंबेडकर ग्राम विकास योजना : 2007 में यूपी में मायावती सरकार ने अंबेडकर ग्राम विकास योजना की शुरुआत की। 2011 में इसका नाम बदलकर अखिलेश सरकार ने लोहिया ग्राम विकास योजना कर दिया है। इसके तहत चयनित गांवों का 36 बिंदुओं के तहत विकास किया जाता है। इसके तहत संपर्क मार्ग, विद्युतीकरण, सबको आवास, शौचालय, पेयजल, तालाब, आंगनबाड़ी केंद्र, स्कूल, स्वास्थ्य केंद्र की स्थापना की जाती है। तमाम सरकारी योजनाओं के कार्यान्यवयन आदि पर ध्यान दिया जाता है।

गांवों का हाल

बिजली

25752 गांवों में अभी तक नहीं पहुंचाई जा सकी है बिजली
1,08,408 गांवों में बिजली पहुंची राजीव गांधी ग्रामीण विद्युतीकरण योजना के तहत
95 फीसदी गांव विद्युतीकृत हो चुके हैं सरकारी आंकड़ों के मुताबिक (कुल गांव 5,97,464 हैं विद्युत मंत्रालय के मुताबिक)

सड़क 
- 50 फीसदी गांव अभी भी देशभर में सड़क से नहीं जोड़े जा सके हैं
- 40 फीसदी गांव सड़कों से जुड़ी थीं साल 2000 में
- 2000 में प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना शुरू की गई
1.80 लाख बसावटों को सड़क से जोड़ा गया पीएमजीएसवाई से 3.72 लाख किलोमीटर नई सड़कें बनीं (विश्व बैंक की रिपोर्ट)

पेयजल-स्वच्छता
89 फीसदी ग्रामीण आबादी के पास पेयजल की सुविधा है
24 फीसदी ग्रामीण आबादी ही शौचालय का इस्तेमाल करती है
62 करोड़ देश की ग्रामीण आबादी खुले में शौच जाती है

बापू का ग्राम स्वराज्य का सपना
मेरा विश्वास है कि भारत चंद शहरों में नहीं, बल्कि सात लाख गांवों में बसा है। लेकिन हम शहरवासियों का ख्याल है कि भारत शहरों में ही है। हमने कभी यह सोचने की तकलीफ ही नहीं उठाई कि उन गरीबों को पेट भरने जितना अन्न और शरीर ढकने जितना कपड़ा मिलता है या नहीं और धूप और वर्षा से बचने के लिए उनके सिर पर छप्पर है या नहीं। (मेरे सपनों का भारत में महात्मा गांधी)
( प्रस्तुति - विद्युत प्रकाश )